Tuesday, January 17, 2017

छत्तीसगढ़ी अनुवाद

                 1 हिजडा
चैबीस-पचीस बरस उमर के एक झिन मइनखे ह ट्रेन मं बइठ के रइपुर ले बेलासपुर जात रहिथे। भाटापारा टेसन मं आठ-दस झिन हिजडा मन टेªन मं चघथे अउ ताली बजात-बजात लोगन ले पईसा मंगना सुरू कर देथे । मइनखे के नजीक मं आके ओखर ले कहिथे- हाय- हाय चिकने, हमन ला पइसा दे दे अउ हमर मन से आसीस ले लेे। हमन जउन कहिथन, वो ह सच हो जाथे। तोला हिरवइन सही खपसूरत घरवाली मिलही अउ तैं ह ओला अपन रानी बनाके रखबे ।
मोला तो हिरवइन सही खपसूरत घरवाली मिल गे रिहिस हे अउ मैं ह ओला रानी बनाके घलो राखे रेहंेव, लेकिन वो ह मोला छोड के दूसर संग भगा गे। मइनखे ह ओमन ला बताथे।
त तैं ह इहां बइठ के का करत हस ? चल तहुं हमर मन संग ताली बजा। हिजडा मन कहिथें
2 बजार-1
ये मौसम मं पताल ह इतना सस्ता हो गे हे के एक रूपिया किलो या रूपिया मं दू किलो घलो मिलत हे, अउ तैं ह ये सौ ग्राम टमाटर के सूप के पैकेट ला पचास रूपिया म खरीद डारेस। निचट मूर्ख हरस तंै ह। एक झिन दाई ह अपन बेटा ला खिसिया के कहिथे
एमा मूर्खता वाले का बात हरे? ये सूप ला मैं ह तभे पीहंू जब बजार मं पताल के भाव 80 रूपिया किलो हो जाही। बजार के प्रभाव मे फंसे हुये ओखर बेटा ह सफाइ देथे।
3 बजार-2
पापा मोला ये नूडल्स के पैकेट खरीद दे ना गा। शाॅपिंग माॅल म एक झिन बेटा ह अपन ददा ले कहिथे।
नइ बेटा ये ह जंक फूड हरे । एला खाये ले तबीयत खराब हो जाथे । ददा ह ओला समझाये के कोसिस करथे।
  मम्मी तैं खरीद देना वो । बेटा हा अपन दाइ ले कहिथे ।
बंेटा तोर पापा ह सही बोलत हे। एला खाये ले सिरतोेन म तबीयत खराब हो जथे। दाइ ह घलो ओला समझाये के कोसिस करथे।
ैलेकिन मम्मी, टी.वी., रेडियो अउ पेपर मं घलो एला पौष्टिक बताये जाथे। बजार के प्रभाव मं फंसे हुए बेटा ह तर्क करथे।
बेटा अपन बनाये सामान ला बेचे बर कंपनी मन झूठ बोलथें। दाई ह ओला असलियत बताये के कोसिस करथे
नइ मम्मी ये नइ हो सके। मोला तो लगथे के तुमन अपन पइसा बचाये खातिर झूठ बोलत हवव। बजार के कब्जा मं पूरी तरह फंसे हुए बेटा ह अपन दाइ ददा मन ला झूठा बता देथे।
4 क्रांति
     अपन घर के बाल्कनी  मे बइठ के पेपर पढे के मोर आदत हे।मोर घर के नजीक मं एक ठिन घुरवा हरे ।मै हमेशा देखंव के हमर पारा के सब्बो कुकर मन घुरवा म सकलाय रहिथेें अउ खाये बर कुछु मिल जाये कहिके घुरवा ला खोदियात रहिथे गरवा मन दूरिहा मे खडे होके कुकर मन ला निहारत रहिथे एक दिन मै देखेंव के उही घुरवा मं एक बडे जान गोल्लार के कब्जा होंगे हे कुकर मन भंूक भंूक के ओला खेदारा के कोसिस करत हे लेकिन गोल्लर ला कुछु फरक नइ पडत हे बल्कुन वो ह कुकुर मन ला हुमेलत हे कुकर मनअपन पूछी ला पीछू कोती दबा के एती ओती दउडत हावे ।वो दिन के बाद ले मै रोजे देखवं के घुरवा मं गोल्लर अउ गाय गरवा मन के कब्जा रहिथे अउ कुुुकर मन दूरिहा मं खडे होके ओमन ला निहारथे
5 लोकत्रंत
चंमपक वन नाम के जंगल मां चुनाव होत रहिथे बघवा अउ चितवा मन मुख्य उम्मीदवार रहिथे भलुवा तीसर मोर्चा के उम्मीदवार रहिथे ।हुड.रा मन अपन अलग क्षेत्रीय पारी बनाये रहिथे कोलिहा मन दलित पारटी के उम्मीवार रहिथे अउ जंगली कुकर मन निर्दलिय रहिथे कोटरी चीतर अउ हिरन मन मतदाता रहिथे मतदाता मन ला इही उम्मीदवार मन ले चुने के अधिकार रहिथंे ।जम्मो उम्मीदवार मन मतदाता मन ला धमकाये कस निवेदन करथे अउ मताधिकार के महत्तव ला बताथे दूसर जंगल के जानवर मन इही जाने के चंपकवन मं लोकतंत्र है।
6 परेम
तै ह कइसे कहि सकथस के तै अपन घर वाली से बिकट परेम करथस साहे्रब मै अपन घरवाली ला मारव नही एखरे से साबित हो जाये के मै हा अपन घरवाली ले बिकट परेम करथव
7 साधु
हमर साहब ह निचट शरीफ हरे वोह मोर संग बेटी बेटी कहि के गोठियात रिहिस हे निचट साधू मन सही हरे नवा नवा नौकरी मं लगे हुये एक लडकी ह अपन सीनियर मैडम कर गोठिया थे
अरे नोनी तै कुछु नइ जानस वो ये डोकरा हा एक नंबर के फिटियाल रिहिस हे अपने खोये हुये ताकत अउ जवानी लहुट के आ जाये कहि के दवाइ लिसे अउ रियेक्शन ले नंपुशक होगे  तब ले ये डोकरा ह जम्मो माइ लोगन मन ला बेटी बंेटी कहिथे अरे कइ ठिन थाना मे ये डोकरा के छेडकानी वाले मामला दर्ज होय हे सीनियर मैडम ह वो साधु के असलियत बताथे
8 धंधा करइया
महाराज आप मन मोर बेटी के बिहाव ला अच्छा ले निपटा देहव त मोर डहर ले पांच सौ एक रूपिया दक्षिणा के रख लेव एक झिान लडकी के ददा ह पण्डित ला कहिथे
तै मोला का चव्वनी छाप पण्डित समझ ले हस का  तै ह मेाला जादा पइसा दे पण्डित ह रिसा के कहिथे अच्छा पण्डित जी  ये छ सौ एक रूपया रख लेव लडकी के ददा ह कहिथे
मै अतेक दूरिहा ले छ सौ रूप्या मं ऐसी के तैसी कराये बर नइ आये हव पण्डित अउ जादा रिसा जाथे अच्छा महाराज अइसे करव आप मन खुदे अपन रेट बता दव लडिकी के ददा हा पण्डित ले पूछ थे
तै ही मोला का धंधा करिइयया समझ ले हस का बे जउन तै ह मोर से मोर रेट पूछत हस पण्डित भडक के कहिथे
अब महाराज मै ह त कुछु नइ कहाहत हो तिही अपन आप ला धंधा करइयया बतावत हस लडकी के ददा जवाब देथे
9 सिस्टम(वेवस्था)
बडे कुकुर ला देख के एक ठिन पिला ह गुर्राये के कोसिस करथे त बडे कुकुर ह भडक जाथे अउ पिला के चेथी मं अपन दांत गडिया के ओला खतम कर देथे बहुत पहिली ये घटना ह मोर आघू म घटे रिीिहस हे तब ले मोर पीछु कोती एक ठिन पूछी जाग गे हे जउन हमंेशा हालत रहय ।
10.गियानी
एक उन कुतन्निन के पीछे पांच कुकर मन लगे पीछु पांच कुकर मन लगे राहे हय । ओमा से एक कुकर ल ये लत समझ मं आगे के ओला कुछ मिलही नही त वो ह एक ठिन बड करव के खेाली म जाके बइठ जाये उसी समय एक झिन दूसर कुकूर ह कहिथे कइसे बे साले झोला गे हस का बे तोर मर्दानगी  ह खियागे हे का जउन ते ह इहा बइठ गे हस तै तो साले हमर कुकुर जात ला बदनाम कर देबे
ओखर बात ला सुन के वो ह जवाब देथे यार भाइ वो कुतन्निन के पीछू जब मै घूमत रेहेव तभे मोला अचानक तले आत्मज्ञान मिले गे के वासना ठीक नही हे उखर से मइनखे मन चरित्र हो जाये ।आत्मज्ञा मिले के बाद मै ह बड रूख के खाल्हे म बइठ गे हव
साले ये तै नही बर रूख ह बोलत हे कहि के वो दुसर कुकूर ह रेग दिया
11हल
एक झिन राजा अपन मंत्री ले कहिथे यार वो फलाना विचारक ह लोगन ला बड जल्दी प्रभावित कर लेथे वो साले ह परजा ला मोर खिलाफ भडकावत हावे दिनो दिन बड खतारनाक होवत जा थे ओला रोके के कोनो उपाय सोचे ल पडही महाराज तै चिन्ता झन कर अउ निशफिकर हो जा बस एक काम  करे बर पडही के ओखर बहुत अकन मूर्ति बनवा के हर चकउ मं स्थाफित कर देबो अउ परजा के बीच म ये फैलाये ला पडही के वो ह भगवान के अवतार हे बस तै देखबे लोगन  ओला भूल जाही अउ ओखर मूर्ति ह हमर कुछु नही उखाड पाही
12 हे भगवान
एक दिन मोला अचानक लगिस के मोर जइसे हे मइनखे के कोनो पुछइय्या नइ हे महु ल आस्तिक हो जाना चाही त मै हंु अपन एक झिन संगवारी कर अपन मन के बात गोठियाहंव वो ह मोला गारी दिस साले तोर जइसे नास्तििक मन दुनिया ला  बरबाद करत हे खैर अब तै मोर से सलाह हस तो मै तोला बतावत हव के तै मंदिर मं तै मंदिर मं जाके भगवान के सरत म चल दे सबले पहिली मै मंदिर पहंचवे त उहा के पुजारी ह मोला अउ करवा दिस के तोर जैसे नास्तिक मइनखे मन नरक म जाये ।उहा गरम तेल मे भजिया कस तरही मै उहा ले चर्च पहुचेव त ओमन कहिथे तोला अपन धरम करम ला बदल के इसाइ बनेला पडही नइ ते शैतान तोला  जियन खान नइ दिही ओखर मन के बात ल सुन के मै अउ जादा डर्रा गेव अउ हपरत हपरत मस्जिद पहंचेव । उहा मोला बताइस के तै जब तक ले दू चार झिन ला मारबे नइ तोला सरग नइ मिले । तोला जेहाद करे ला पडिही ओखर मन के बात ला सुन के मोर कपकपासी छुट गे अउ मै आटो पकड के एक मनोचिकित्सक कर पहुचेव वो ह मोला समझाइस तै आस्तिक बने के विचार ला त्याग दे ।तोर बर नास्तिक रहना ही ठीक हे ।आज मोर जिनगी आराम करत हावे
13 हे भगवान
कइसे बेटा तेै हा ये रसीद बुक ल धर के कहा किंजरत हस मै एक झिन लडका ले पुछेव ।
अंकल हमन गनेस बिठाये बर बरार सकेलथन वो जवाब दीस
तै एकेल्ला हस तोर दूसर संगवारी मन कहां हे  मै फिर पुछेव ।
अंकल हमन दस झिन हन अउ अलग अलग बरार सकेलथन लइका बताइस अरे बेटा तंुमन अलग अलग जादू तै तुमन ला कोइ चंदा नइ दिही तुमन ला पक्के संगरा भीड जइसे जाये बर पडही लोगन अपन श्रध्दा स ेचंदा नइ दे भीड ले डर्रा क ेचंदा  देथे समझ गेव ।
हव अंकल हमन अब ले चंदा मांगे बर एक संगरा जाबो
14 मेरा भारत महान
हमर देस महान मै एक झिन विदेशी ला बताये वोह किहिस अइसे का ।
मैं हा आगे अउ केहेव हमर धरम अउ संस्कृति ला दुनिया के दूसर देस टक्कर नइ दे सके वो ह फेर किहिस अइसे का मै अउ जोस मंे  आके के हेव हमर इंहा परखना केा घलो पूजा करे जाते ।तुम्हर इहा सिस्फि परखना के बर पूजा होथे इंसान मन के जिनगी झंटहोगे हे वो ह किहिस ।
आगे मै ओला कुछु नइ कहि पायेेन ।
15 खाली दिमाग
हमन अलग अलग धरम मानने वाला चार झिन दोस्त रेहेन ।एक घांव हमन विचार करने के लोगन घूमे फिरे फिरे बर जाये लो किन हमन अपन अपन भगवान के  परसन करे के उपाय करबो ।हमन नाम धान ला छाडने अउ हमन अपन अपन धरम के रीति रिवाज के हिसाब से पूजा पाठ सुरू कर देन।हयता दस दिन बाद हमर अपन अपन  भगवान मन परसन हो के बोलिन बेटा खाली दिमाग या तो शैतान के घर होथे  
या फेर भगवान के।
ओखर बाद हमन अपन अपन काम म लग गेेंन
16 संदेस
एक दिन मोर शहर मं पंगा होगे अउ दूसर धरम वाले मोर मर्डर कर दिस ।मरे के बाद मै जब उपर पहंुचेव तो मोर जिनगी क ेलेखा खोल के देखे के बाद उंहा निर्णय लिन के तै जिनगी भर नास्तिक रेहेस त तोला नरक मं जाये नरक मं पंहुच के मै देखेव के उहां दंगा मे मरे वाले मइनखे मन के बइठका सकलाय हे महंू बइठका मे सामिल हो गंेव ।बइठका मं निर्णय होगे ये धरम लडाये के काम करथे धरती मं धरम के कोनो जरूर नइ हे बइठका मं जम्मो झिन के सहमति ले प्रस्ताव पारित करे गिस के धरतीवासी मन ल संदेस पढाये जाये के वो मन धरम ला छोड के अधर्मी हो जाये
17.साधु संत
हमर साहब ह निचट शरीफ हे । वो ह मोला हमेशा बेटी बेटी कहिथे ।साधु मन सही हे ओर नवा नवा नौकरी म लगे एक लडकी ह अपन सीनियर मैडम ला बताइस ।
अरं नोनी तै ह कुछु नइ जानस वो ये डोकरा ह एक नंबर के फिटियाल रिहिस हे अपन खोये जवानी ला वापस पाये खातिर ये दवाइ लिखा दवाइ लिख दवाइ रियेक्सन कर दिस तो ये ह नंपुसक हो गे तब ले ये डोकरा ह जम्मो माइ लोगन मन ला बेटा बेटा कहिथे अरे ते नइ जानस वो कइ ठन थाना मे ये डोकरा के छेडखानी वाले मामला दर्ज हे ।सीनियर मैडम साधु के असलियत बताथे ।
18 का्रंति
अपन घर के बाल्कनी म बइठ के पेपर पढे के मोर आदत हे मोर घर के नजीके म एक घुरवा हे मै हमेशा देखंव के हमर पारा के सब्बो कुकुर मन वो घुघवा हा सकलाय रहिथे अउ खाये पीये के सामान बर ओला खोदियाथे गाय गोरू मन इहा खडंे होके कुकुर मन ला देखत रहिथे ।
एक दिन मै देखेव के घुरवा मं एक ठन बडे जान गोल्लर के कब्जा हो गे हे।
क्ुकुर मन भंूक भंूक के ओला खेदारे के कोसिस करत हे पर गोल्लर ला कुछु फरक नइ पडत हे बल्कुन वो ह कुकुर मन ला हुमेलथे ।
कुकर मन अब अपन पुछी ला पीछू डहर के दबा के एती ओती भागथे ।
वो दिन के बाद ले मै देखथंव के घुघवा म गोल्लर अउ गाय गरवा मन के कब्जा होगे हे अउ कुकुर मन दूरिहा खडे होके ओमन ला देखत रहिथे ।
19 पिण्डदान
प्ण्डिताइन हमर बेटी रेखा ह मोर मेर कहत रिहिस हे के वो ह राकेश संग बिहाव करना चाहत हे ।
प्ण्डित अरे का बात करत हसच ।बिहाव करे बर ओला उही दलित जात के लडका मिलिस हे ।
प्ण्डिताइन अरे जात पात के बात ल छोड लडका ह सरकारी नौकरी म हे । वो ह हमर बेटी के बिहाव बर चार पांच लाख रूपया जोडे हन वो बांच जाहि अउ हमर बेटा छोटु के मेडिकल कालेज म एडमिशन बर काम आही
प्ण्डित लेकिन हमर जात समाज के मन का  बोलही हमर तो नाक कट जाही
प्ण्डिताइन अरे जात समाज ला छोड ।जात समाज के लोगन मन ल देखाये बर हमन अपन बेटी से तोड लेबो अउ बोल देबो के ओह अपन मन से दिलित संग बिहाव कर लीस त हमन ओकर संग नाता तोड ले हन अउ वो ह हमर बर मर गे हे ।जादा होही त ओखर पिण्ड दान घलो कर देबो ।
हमर बेटी तो सुखी राहय ये कर ले जादा हमर बर का हे ।
20 वर्गभेद
मै सुरता करथव हमन जब छोटे रेहेन त हमर पारा म एके झिन टुरा कर क्रिकेट के किट रहाय । वह अपन किट ला एक शर्त म निकाले के वो ह जब तक ले चाही लेकिन बैटिग करत रही आउट नइ होही बालिग अउ फील्डीगं करत करत हमन हफर जान वो जब बैटिग करत करत बोरिया जाये तभे हमन ला बैटिग करे के चांस मिले ।अपन जिन्दगी मे हर कदम म मोला अपन बचपन याद आये ।
21 ब्रम्हहत्या
जल्लाद कालि तोला एक झिन अपराधी ला फांसी चघाना हे ।जेलर जल्लादले कहिथे
साहब वो ह का गुनाह करे हे ।जल्लाद पूछते
वो ह नान नान लडकी मन के रैप करे के बाद ओखर ला जान के मार देत रिहिस ते पाये के ओला फांसी के सजा होय हे अइसन कमीना मनखे ला फांसी मं चघाय मं मोला खुसी होही साहेब ।मोर बस चलतीस त मै कालि के जगा आजेच ओला ओला फांसी मं चघा देतेव ।वइसे साहेब वो ह कौन जात के हरे जल्लाद पूछथे
अपराधी मन के कोनो जात धरम नइ होय अपराधी ह सिरिफ अपराधी होथ
े जेलर ह पूछथे
जल्लाद ह पूछथे तभो ले कोइ कोइ ना कोइ कोइ जात हे तो कोइ जात हे तो हो ही च वो हर
हां बंाभन हरे पर तोला का मतलब हे ओखर जात ले
तब तो साहेब मोला माफ कर दे मै ओला फांसी मं चघा के बहाहत्या के पाप नइ कर सकंव ।मै जल्लाद हवं लेकिन मोरो तो धरम हे महु ला उपर जाके मुंह देखाय।
22 गियानी
सहर के एक पारा मं प्रवचन चलत रहिथे ।प्रवचनकर्ता स्वामीजी बड भारी गियानी लगत राहय प्रवचन के बीच मं स्वामीजी कहिथे जइसे तिरभुज के तीन उन कोनो होथे वइसने आतमा अउ परमात्मा के मिलन हो जाये आस्था से भरे हुए सुनैयया मन कहिथे वाह ।
स्वामीजी फंेर कहिथे जइसे चंदा सूरज अउ हमर धरती माता गोल हे डिक्टो बइसने परभ ह धरती म अवतार ले थे
लोगन कहिथे  वाह वाह ।
आस्था से भरे हुए श्रोता मन के वाह वाह ल सुन के स्वामीजी ला जोश आ जाथे अउ वो ह नाचत नाचत कहिथ्ेा जइसे कम्पूयटर के मे मेमोरी होथे वइसने हमर आत्मा ह टेलीविजन जइसे दिखथे ।
श्रोता मन घलो ओखर संगम नाचना शुरू कर देथे ।
तभे पागलखाना के एक ठिन एम्बुलेंस आ जाये ।एम्बुलेस से डाक्टर अउ कम्पाउडर मन उतरथे अउ लोगन ला बताये के ये स्वामी वामी नो हे हमर पागलखाना से भागे हुये एक बिकट खतरनाक पागल हरे ।
हमर स्वामीजी पागल कहिथैा कहिके लोगन मन डाक्टर अउ कम्पाउण्डर मन के ठुकाइ शुरू कर देथ्ेा
23 गांॅंधी जयन्ती
नगर निगम के आफिस म गांधी जयन्ती मनाये बर शासन से आर्डर होय रिहिस हे जेखर उपर चर्चा करे बर पार्षद मन के बइठका होवत रिहिस हे ।एक झिप् एंग्लो इंडियन पार्षद कहिथे हमन ला ये दारी गांधी बबा के जंयती ला धूम धाम से मनाना हे ओखर ये बात ला सुन के एक दूसर पार्षद बियंग कसथे हां हां भाइ तै तो धूम धाम से मनाये बर बोलबेच कार के गांधी ह तो  अंगरेज मन के दोस्त रिहिस हे ।
 इतिहास के पुस्तक मं लिखाय हे के वो ह कुकर के सेफ्टी वो ला जइसे काम एक उद्योगपति पार्षद कहिथे महात्मा गांधी ह एक महान पूरूष हे ओखर विषय मं अइसन टीका टिप्पण्ी ठीक नइ हे । ओखर बात ला सुन के एक  झिन पार्षद खडा हेा जाये अउ कहिथे तै तो बोलबेच कार के गांधी जी ह पंूजीवादी रिहिस हे। एक झिन बडे उद्योगपति ह ओखर करीबी रहिस हे ।धीरे धीरे बइठका ह मच्छीबाजार सही हो जाथे । जम्मो पाषर््ाद मन कांय कांय शुरू कर देथे मुस्लिम पार्षद मन गांधीजी के वैषण्व जन तो तेने कहिये गीत अउ हे राम म आब्जेक्शन उठात कहिथे वो ह साम्प्रदायिक रिहिस हे। और ओखरे सेती बंटवारा होइस।
दलित पार्षद मन कहाय गांधी ह अछूत मन के उद्वार करे के नाटक करे आखर मं सभापति ला हस्तक्षेप करता पड. जाये अउ वो ह कहिथे तुमन हल्ला गुल्ला बंद करव हमन ला गांधी जयन्ती मनाये के कोनो शौक नइ हावे । वो तो शासन से आर्डर मिले हे त मनाना जरूरी होगे हे । ओखर बाद जम्मो पार्षद मन शांत हो जाये अउ बैठक विसर्जित हो जाये ।
24 हिसाब किताब
मैं तोर बर सब करथंव लेकिन तै मोर बर एको कनी ख्याल नही रखस पत्नी कहिथे अच्छा ले तो बता के तै ह मोर बर का का करस
पति पूछथे मै तोर कपडा धोथव पत्नी कहिथे
ये काम तो पांच सौ रूपया महीना वाले बाइ ह घलोक कर ले थे पति कहिथे मै तोला राधं के खवाथंव पत्नि आगे कहिथे ।
 कपडा धोये के अउ रांध के खाय के दूनो काम ला हजार रूपिया महीना वाले बाइ कर लेथ।
मैं तोर पत्नि हरव रात मं तोर संग सोेथंव ेपत्नि हा भडक के कहिथे ।
कपडो धोवाइ रंधाइ अउ सोवइ ये तीनो काम महीना मे तीन हजार रूपिया वाले बाइ कर लेथे मै हर महीना तोर हाथ मं बीस हजार रूपिया लाके देथव मतलब मै हर सत्रह हजार रूपियाा के नुकसान मं चलत हव।
25 कुण्डली
ज्योतिसी मोर लइका के तबीयत हमेशा खराब रहिथे थोरिक एखर कुण्डलि  ल  देखके कोनो उपाय तो बता । एक झिन मइनखे ज्योतिसी ले पूछथे
ल्इका के कुण्डली देख के पता चलथे के ओखर दाइ ह ओखर तबीयत बर कोनो व्रत उपवास नइ करय । ज्योतिस ह बताथे ।
महु ल धंधा मं नुकसान होवत हे मइनखे हे आगे बताथे
तोर भाग्य ला तोर पत्नि हा रोक के रखे हे । वो हा तोरो भलाइ बर उपवास नइ करे ।ज्योतिष बताये
महाराज हमर घर मं हमेशा कलह मचे रहिथे । मोर बेटी हे पच्चीस बरस के हो गेहे अउ अभी ले सगा नइ उतरे हे । मइनखे ह बताथे
कलह के कारण तोर बेटी खुद हरे वो ह मंगली हे ज्योतिष बताथे
महाराज जतेक अपशकुन होथे ओखर बर ये माइलोगन ही जिम्मेदार रहिथे का मइनखे पूछते
अब मै का बोलव जजमान मइनखे ह तो झूठ बोल सकथे पर कुण्डली ह कभी झूठ नइ बोलय
26 पियार
जज तै कइसे कहि सकथस के तै अपन घरवाली से बिकट प्यार  करथस
बाकी साहब मै अपन घरवाली ला मारंव नही एखर से साबित हो जाथे के मै ह अपन घरवाली से बिकट परेम करथव ।
27 रेखा
सर आप मन बिकट स्मार्ट लगथव फिल्मी हीरो कस अइसे का मोर घरवाली ह घलो अइसने कहिथे अरे भइया आप मन के बिहाव होगे हे
हां मोर तो तीन साल के लइका घलो हवे
अच्छा अंकलजी मोर जाये के बेरा होगे हे टाटा बाय बाय
28 पूजा
वो ह पार्टी ले आधी रात के घर पहुंचथे । सुबह ओखर घरवाली करवा चैथा व्रत के पूजा बर सामान के लिस्ट दे रहिय अउ हर हाल मे लाना च हे कहिके चेताये घलो रहिथे ।आॅफिस मं काम ज्यादा होय के सेती वो ह पूजा के सामान नई लान सकिस ।वह डर्रात डरार्त बेडरूम मं पहुंचिस ओखर बाई बिस्तर मं लेटे रहिस वह ओखर नजीक म जाके कहिथे -साॅरि डार्लिगं आज मै तोर बताये पूजा के सामान ल नइ लात सकेंव ।तहूं का ले के बइठ हे हस ये टेम फालतू बात करे के नो हे कहिथे ओखर बाई एक हाथ ले ओला घर के बिस्तर मं खींच लेथे अउ दूसर हाथ ले बत्ती बुझा देथे ।
29 समागम
नदी मं पूरा आये रहिथे।प्रभावित ग्रामिण मन बर सरकार ह जगा जगा राहत कैम्प के बेवस्था करे रहिथे कैम्प मं खाये पीये के अउ साबुन सोडा के पूरा इंतजाम रहिथे ।कैम्प के अधिकारी मन ला निर्देश मिले रहिथे के कैम्प से कोइ मइनखे पलायन झन का पाये कार के सरकार ला अपन बदनामी होय के डर रहिथे तभो ले  एक दिन एक पति पत्नी ह उहां ले भागत धरा जाये ।अधिकारी मन ओमन ला चमकाये अउ पूछते तुमन ला का कमी हो गे हे सरकार ह खाये -पीये के पूरा बेवस्था करे हे तभो ले तुमन इहां ले भागत रेहेव आखिर बात का हरे ।
साहेब पेट के भूख तो मिट जाये जाथे लेकिन हमन पति पत्नि हरन हमन ला समागम के भूख घलो लगथे पति ह जवाब देथे ।
30 उपदेस
एक झिन मोरियारी महिला जेखर जवान लड.की ह पडोस के लइका संग भा जाये रहिथे -अपन पडेास म नवा नवा शिफट होय एक लडका ले कहिथे मैं ह सुने हंव के तै ह एक झिन जवान टरी ला झाडू पोछा अउ बर्तन बर रखे हस देख भाइ  इंहा जरा संमल के रहिथे इहां के टुरी मन थोरिकन चालू टाइप के हरे ।लडका ह स्वाभाविक रूप से कहिथे हांॅं महूं अइसने सुने हंव अउ ओखर बाद वो महिला के उपदेश बंद हो जाये ।
31 दत्तक पुत्री
तैं ये फारम मं साइन कर दे सरकारी आॅफिस के बडे बाबू ह नवा -नवा नियुक्त छोटे बाबू ला कहिथे ।कइसनहा फारम हरे ये ह छोटे बाबू पूछथे ।सरकार ह चाहथे के लोगन गरीब लडकी मन ला गोद ल ेले अउ ओमन ला अपन दत्तक पुत्री जइसे मान के ओखर मन के पढे. -लिखे के खचीला उठाले ।हमन सरकारी कर्मचारी हस तो हमरो मन के फर्ज बनथे  के गरीब लडकी मन ला गोद ले लन वस्ताद तोर कुर्सी तो आवक वाले हरे ।तोला बहुत अकन झटका पानी मिलत रहिथे ।तैं तो हमर जिला के सब्बो गरीब लडकी मन ला अकेला गोद ले सकथस अउ ओखर मन के पढाई लिखाई के खर्चा ला उठा सकथस मोला तो चाय -पानी के खर्चा तको नइ मिलय छोटे बाबू कहिथे
मै तोला एक ठिन बात बताना चाहत रेहेव  ये बात कान मे बताये के लइक हरे ।बडे बाबू कहिथे ।
लेन बता का बात हरे ।छोटे बाबू ह ओखर नजीक चल देथ्ेा ।गरीब लडकी मन के सूची मं दू -चार जवान लडकी मन घलो हरे ।बडे बाबू ओला धीरे बताये ।
अच्छा अइसे हे का । त ये बात तैं ह मोला पहिली कार नइ बताये हस ला मै सूची ला देख के सब्बो जवान लडकी मन ला अपन दत्तक पुत्री बना लंहू।
32 सुभीता
मैं ह सुने हंव के बिहाव के पहिली तोर बहुत झिन टुरी मन संग दोस्ती रिहिस ओमन तोला चिटठी -पत्री लिखे ।एक झिन पत्नि अपन पति ले नइ वो म ैलेखक एवं त मोर पाठिका मन के चिटठी आये लेकिन हमर मन के सम्बन्ध चिटठी -पत्री तक बस रिहिस हे।लेखक पति ह स्पष्टीकरण देथे ।
तब तो ठीक हे नइ ते मै ह तोला जिनगीभर माफ नइ करे रहितेव
पत्नि कहिथे ।
(महीना -दू महीना बाद )सरकारी नौकरी वाले
सुनना तोर एक झिन इंजीनियर दोस्त हे ना मोर नान्हे बहिनी संग ओखर बिहाव हो जाये अइसे कोइ चक्कर चला ना ।उही पत्नी ह अपन  पति ला जोजियाये सही कहिथे ।अरे नइ ओ लडका ठीक नइ हे ।वो ह तो एक नंबर के फिटियाल हरे निचट लूज करेक्टर हरे ओखर तो बहुत झिन गर्लफै्रण्ड संग ओखर चक्कर  चलत रहिथे ।वो ह ठीक नइ हे।पति अपन पत्नि ला समझाये ।
अब तै ह बहाना बनाना शुरू कर दे हस तै चाहिबे नइ करस के मोर बहिनी के बिहाव अच्छा घर मे हो जाय अउ वो ह सुखी राहय जब ले बेचारा ला फिटयाल अउ लूज करेक्टर बोलत हस ।अरे भइ बिहाव क पहिली तो सब चलथे ।पत्निी ह सुभीता के हिसाब से पलट जाथे ।
33 अमेरिका
मोर घर के आगू मं कुकुर मन खेलत हे । नर मादा पिला जम्मो कुकुर मन खेलत हे । खेलत खेलत एक दूसर ला पटकत हे ।एक दूसर के गोड ला झिकत हे ।एक दूसर ला चाटत हे ।मुंह मं कमची दबाये दउडथे लहुटथे फेर दउडथे हंे। मै ओमन ला खेलत देखत हंव एक टक देखत हंव।अचानक मै ह उठथंव अउ रंधनी खोली मं जाके बसियाये रोटी ला ला के ओखर मन के आगू मं डाल देथंव ।
अब मै देखत हवं जम्मो कुकुर मन बसियाये रोटी बर भंयकर तरीका से झगरत हें अउ मे हा मुसुर -मुसुर हांसत हवं
34 दाई
हमर पारा मं ठिन कुतनिन पेट से रिहिस हे ।हमन ओला कभू -कभार रात के बाचे खाना दे देत रेहेन ।हफ्ता दू हफ्ता बाद वो ह पिला जन दिस ।अपन पिला मन ला दूध पिलाये बर जरूरी रिहिस हे के ओला अच्छा से खाये बर मिले वो कुतनिन ह बड आस लगा के हमर दुआरी मं आ जाय ।खाना बाचे राहय त हमन ओला दे देन नइ ते वो ह अइसने लहुट जाये ।हफ्ता -दू हफ्ता बाद वो ह अपन पिला मन संग हमर दुआरी मं आये ।ओखर पिला मन ला देखके हमर गया जाग जाये अउ हमन कुछु खाये के दे दन । आज ओखर पिला मन बडे. बाड गे हे ।हमर अंगना मं खाये -पिये बर ओमन झगरत  रहिथे अउ अपन दाइ ल हमर अंगना मं आन नई दे झगडा.करके ओला खेद देथे ।
35 बजार  
वो शहर के गोल बाजार मं जडी -बूटी के एक नामी दुकान राहय ।दुकान के नाम राहय अग्रवाल जी के दुकान । दू -चार बरस बाद वो दूकान के अगल -बगल मं चार ठिन जडी बूटी के दुकान अउ खुले जाये सब्बो दुकान मंे बोर्ड लागे राहय -अग्रवालजी के दुकान ।अपन  अलग पहचान बताये वो नामी दुकानदार बोर्ड मं लिखवाथे -असली अग्रवाल जी के दुकान  त दूसर दुकानदार मन घलो अपन -अपन बोर्ड मं लिखवा लेथे -असली अग्रवाल जी के दुकान ।असली दुकानदार ह कंझा जाथे अउ वो ह लिखवाथे रघुनंदनलाल अग्रवाल के दुकान त दूसर दुकानदार मन एक कदम आगु बढ. जाये अउ ओमन लिखवा देथे -असली रघुनंदनलाल जी के दुकान ।
36 बाजार-3
ग्राहक -भइय्या मोला एक -दू रूपिया वाले लिखो -फेको पेन देबे।
दुकानदार ये ले ये ह बहुत अच्छा पेन हे ये ह एक नामी कम्पनी के पेन हरे एखर जइसे फ्री चलने वाले पेन तोला कहू नई मिलही अउ कीमत भी ज्यादा नई हे सिरिफ दस रूपिया के हरे
ग्राहक -अरे भइय्या मोला लिखो फेको पेन चाही एक दू रूपिया वाले ।दुकानदार -ये ले यहू एक ब्राण्डेड कम्पनी के पेन हरे ।सिरिफ पांच रूपिया कीमत हे एखर ।
ग्राहक -अरे यार मै जब ले तोला बोलत हंव के मोला एके दू रूपिया वाले लिखो -फेको पेन चाही तभो ले तै ह मोला दूसर -दूसर मंहगा वाले पेन देखात हस ।
दुकानदार -तं तै ह ये बात ला जान ले के हमन एक -दू रूपिया वाले सडियल पेन अपन दुकान मं नइ रखन ।
ग्राहक -एखर मतलब ये हरे के मोर हैसियत तोर दुकान के लायक नइ हे ।
दुकानदार -ये तो तिही सिध्द करत हस
37 अपन-अपन दुकानदारी
वो देस मं बात -बात मं बंद के आयोजन हो जाये ।दुकान ला बरपेली बन्द कराये लेकिन पेपर मं छपे के दुकानदार मन अपन स्वेच्छा से बंद रिहिन हे ।वो देस मं कभु सत्ता पक्ष तो कभु विपक्षी पार्टी ह बंद के आयोजन करे ।अइसने एक दिन शहर मं बंद के आयेजन होय रहिस ।पार्टी के कार्यकर्ता मन जबरन बंद करात राहय तभे एक झिन दुकानदार अउ उहां खडे मजदूर मन एक कार्यकर्ता ले पूछथे -अइसने बंद के आयोजन ले का फायदा होथे उलटा बाजार बंद रहे से नुकसान हो जाथे। ओखर मन के प्रश्न के उत्तर मं कार्यकर्ता ह मुसकाये अउ कहिथे -बाजार बंद कराये से हमर राजनीति के दुकान खुल जाये अब हमु मन का करन अपन -अपन दुकानदारी हे भाई।
38 बाजारीकरण
का यार तहूं आजादी के दिन घलो मंुह ला अरो के किंजरत हस ।कम से कम आज के दिन तो देशभक्ति के भावना से भरे होना चाही ।अब तै ह मोला च देख ले मै हर बरस 15 अगस्त आये चार दिन पहिली ले तैय्यारी शुरू कर देथंव सबसे पहिली मै ह बाजार जाके खादी के कपडा. खरीदथंव ।आजकल तो बाजार मं खादी ह घलोक फैशन मं शामिल हो गे हे ।कपडा खरादे के बाद मै झण्डा खरीदथंव ।घर के हर सदस्य बर एक -एक झण्डा खरीदथंव ।ये बछर तो मै हा अपन लइका मन बर तिरंगा वाले कमीज खरीदथंव ।सिरतोन यार तिरंगा के ओपन इस्तेमाल के छूट मिले के बाद बाजार मं हर जगा तिरंगा दिखाये ।एक दोस्त ह दूसर ले कहिथे मोला माफ करबे दोस्त मोला ना तो देशभक्ति के बजारीकरण करना हे अउ न तो बजार के देशभक्तिकरण
39 गुलामी
तै ह मोर ले निवेदन करे रेहे त मै ह तोर उपर तरस खाके तोला अपन गुलामी ले आजाद करे दे रेहेव  लेकिन तै ह लहुट के मोरे कर फेर आ गे हस अउ कहात हस के मोला फेर अपन गुलाम बना ले आखिर येखर का कारण आय ।मालिक ह अपन गुलाम ले पूछथे मालिक मै ह तोर ले आजाद हो गे रेहेव लेकिन मै ह अपन गुलामी वाले मानसिकता ले आजाद नइ होय सकेव ते पाय के मैें लहुट के तोरे दुआरी मं आ गंेव फेर गुलाम बने बर गुलाम ह उत्तर देथे।
 40 कुनैन
यार आजकल शराफत के जमाना नइ ये।लोगन शरीफ मन ला कमजोर समझथें एक झिन दोस्त ह दूसर ले कहिथे ।यार भाइ आजकल के जमाना मं जउन मइनखे कमजोर हरे उही ह शरीफ हे ।
 41 श्रेय
वो डोकरा ह कौन रिहिस हे जेखर संग तै ह गोठियात रेहे।एक झिन पति अपन पत्नि ले पूछथे ।बिहावपारी
मैं ह पहिली जेन स्कूल मं टीचर रेहेव उही स्कूल के वो ह प्रिसियल हरे ।पत्नि बताये मोला अनुशासन कर्तव्यनिष्ठा अउ सिध्दांतवादिता के पाठ उही पढा.ये हे ।एखर मतलब ये हरे के तोर बिगडे के पूरा क्रेडिट उही डोकरा जा जाये ।पति बोलय
42 इकलौता
 लइका के जमानत कराये के बेवस्था कर जब लइका छोटे रहिथे)
पति -कइसे तै पन्दरा ला देख -देख कार होय के बावजूद लइका बर अउ एक ठिन कार खरीद डारेस
पत्नि खेलौना ला देख देख के वो ह ललचात रिहिस हे त मै ह खरीद डारेन मै ह लइका ला ललचात कइसे देख सकत रेहेव।
हमर एक झिन तो लइका हे।
पति -अरे भई पहिली ले पन्दरा बीस कार घर मां पडे हे तभो ले तैं ह पइसा खरचा कर डारेस ।पइसा खर्चा करे के पीछू कोई कारण तो होना चाही ।पत्नि -कारण -फारण ला छोड. हमर लइका के खुसी मां हमर खुसी मां हमर खुसी हे।हमर एके लइका एके झिन तो लइका हे ।च
तीन -चार (बछर बाद )
पति -तैं ह लइका ला का फालतू के खाउ खवाथस ।तोला मालूम नइ ये का के बाहर के चीज खाये से तबीयत खराब हो जाये ।मैगी वाले बात ला तै ह सुने होबे ।
पत्नि -लइका ह जिद करत रिहिस हे त खवात हवं दू चार पैकेट खाउ खजाना खाये ले काकरे तबीयत खराब नई होय ।लइका के इच्छा हमर इच्छा लइका के उमर 14-15 साल के हो जाये ।
पति -मै ह सुने हंव हमर बेटा हे स्कूल मं दादागिरी करत रहिथे ।पढाई -लिखाई मं एको कनी घियान नई दे अउ दूसर लइका मन ला मा-बहिनी के गारी देथे मारथे घलो ।
पत्नि -आज के जमाना मं दादागिरी जरूरी हे नई ते लोगन ह सिधवा समझ के हावी होय के कोसिस करथे ।मै ह अपन बेटा ला तोर सही जोजवा नई बताना चाहंव ।(लइका के बालिग होय के बाद )
पति -ले तोर इकलौता लइका ह मार -पीट के आरोप मं अन्दर होगे।
पत्नि -हाय -हाय मोर किस्मत फूट गे रिहिस हे जो तोर संग मोर बिहाव होगे। तोर जइसे गैर जिम्मेदार आदमी के लइका तो अन्दर होबे करहि ।
तै ह लइका डहर एको कनी घियान नइ देते रेहे त वो ह बिगड.वेच करही अब इंहा खडे कार हस जा हमर एके झिन झिन तो लइका हे ।
43 विरोध
जेठ के महीना रिहिस हे।एक दिन मै ह मंझनिया कुन घर ले बाहर कोनो काम ले निकले व तभे मोर कान मं लाउडस्पीकर के आवाज सुनाई परिस
दारू के दलालो को जूते मारो सालो को
अभी तो ये अंगडाई है आगे और लडाई है
हमने मन में ठाना है दाउ भटठी हटाना है ।
हम इस बीच बस्ती से दारू भटठी हटाकर रहेंगे हटाकर रहेंगे।
इंकबाल जिन्दाबाद
जोश मं भरे हुए नारा ला सुन के मंहु जोशियागेंव ।
समाज कल्याण के  भावना ले प्रेरित होके मैं आंदोलन वाले जगा मं पहंचेव त देखेव के उहां एक ठिन टेण्ट गडे हुए हे अउ एको झिन आंदोलनकारी नइ ये ।भाषण के सिरिफ टेप बस चलत हे ।मैं ह कंझाके उहां ले लहुट गेंव तभे मोर करन मं आवाज सुनाई परिस
हर करम अपना करेगे  ऐ वतन तेरे लिये
दिल दिया है जां भी देगें ऐ वतन तेरे लिये
44 दउड.
मै ह कालि तुम्हर मन के दउड. ला देखेव ।तुमन अपन मालिक बर जी-जान लगा देखव ।तुम्हर ये गुन तो हमर वफादारी के गुन ले भी बडे हे।एक ठिन कुकुर हे रेसिंग वाले घेाडा ले कहिथे ।
नइ भइय्या इसन कोनो बा तनइ  हे।जीव -जान लगाये वाले बात नई हे ।हार के बाद हमन ला जो दण्ड भुगते ला पडथे ओखरे विचार करके हमन मरे जिये ले दउडथन ।घोडा. ह कुकर ला असलियत बताथे।
।हमर एके झिन तो लइका हे। तीन-चार बछर बाद
पति तै ह लइका ला का फालतू के खाउ खवाथस ।तोला मालूम नई ये का के बाहर के चीज खाये से तबीयत खराब हो जाये मैगी वाले बात ला तै हसुनेप होबे ।
पत्नि लइका ह जिद करत रिहिस त खवात हंव दू चार पैकट खाउ खजाना खाये ले काकारे तबीयत खराब नइ होय ।लइका के इच्छा होना चाही आखिर हमर एके झिन तो लइका के इच्छा हमर इच्छा होना चाही आखिर हमर एके  झिन तो लइका हे।लइका के उमर 14-15 साल के हो जाये ।
पति मै ह सुने हंव हमर बेटा ह स्कूल मं दादागिरी करत रहिथे ।पढाइ -लिखाइ मं एको कनी घियान नइ दे अउ दूसर लइका मन ला मां -बहिनी के गारी देथे मारथे घलो ।
पत्नी आज के जमाना मं दादागिरी जरूरी हे नइ ते लोगन ह सिधवा समझ के होवी होये के कोसिस करथे ।मै ह अपन बेटा ला तोर सही जोजवा नइ बनाना चाहव ।
(लइका के बालिग होये के बाद)
पति -ले तोर इकलौता लइका ह मार पीट के आरोप मे अंदर होगे ।
पत्नी -हाय -हाय मोर किस्मत फूट गे रिहिस हे जो तोर संग मोरे बिहाव होगे ।तोर जइसे गैर जिम्मदार आदमी के लइका तो अन्दर होबे करहि ।तै ह लइका डहर एको कनी घियान नइ देत रेहे त वो ह बिगडवेच करहि।अब इंहा खडे कार हस जा लइका के जमानत कराये के बेवस्था कर हमर एके झिन तो लइका हे।













रेषम का कीड़ा- कहानी संग्रह

                             1. रेशम का कीडा़
हमारे पिता का स्वप्न एक बंगलेनुमा घर में रहने का था, सो उन्होंने शहर के बीच में 7000 स्क्वेयर फीट जगह में बंगलेनुमा घर बनवाया था । हमारे पिताजी ने घर की चारांे तरफ़ जगह छोड़ रखी थी। सामने की तरफ तो एक छोटा सा मैदान ही सा था। वे अपने घर में बाउण्ड्रीवाॅल बनाने के पक्ष में नहीं थे । उन्हें चारोें ओर का खुला वातावरण अच्छा लगता था। उन्हे खेलते हुए बच्चों का शोर बडा़ सुहाना लगता था। हमारे घर के सामने छोटे से मैदान पर बच्चे कुछ न कुछ खेलते ही रहते थे । मेरे भी सारे दोस्त वहीं आकर खेलते।  रेस-टीप हमारा प्रिय खेल होता था । हमारे मुहल्ले के मेरी उम्र के तमाम बच्चे मेरे दोस्त बन गये थे । हम साथ -साथ ही खेलते । यूं तो मेरे बहुत से दोस्त थे, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता था कमल। वह मेरे साथ प्रायमरी स्कूल से था। कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक वह मेरे साथ में मेरे ही क्लास में था। वह हमारे घर के करीब ही रहता था। कमल यूं तो सब बच्चों जैसा ही था, पर वह खेलते-खेलते अचानक न जाने कहाँ खो सा जाता था। उसे यह भी याद नहीं रहता था कि वह कोई खेल खेल भी रहा है। क्रिकेट खेलते हुए बैटिंग करते-करते अचानक वह बल्ला ही उठाना भूल जाता और आऊट हो जाता। फील्ंिडग करते हुए कैच लेना ही भूल जाता था। कबड्डी खेलते हुए और छू,-छुआउल खेलते हुए भी वह आराम से आउट हो जाता था। हमारे सभी साथी उसे पागल कहते थे।
    उसकी खुद में गुम हो जाने की यह आदत ही मुझे बेहद आकर्षित करती थी। हमारे दूसरे साथी उसे छत्तीसगढ़ी मे सुधभूलहा कहकर चिढाते थे। मेरा सबसे करीबी दोस्त होने के बावजूद मुझे भी कई सालों तक पता ही नहीं चल पाया कि आखिर वह अचानक खो कहाँ जाता है। थोडी़ समझ विकसित होने पर एक दिन मंैने उसे कुरेदा तो उसने मुझे बताया कि तेरे घर के सामने जो लड़की रहती है न, मैं उसे देखकर सुध-बुध खो जाता हूँ। हमारे घर के सामने एक आम्रपाली नाम की लडकी रहा करती थी। वह वाकई में बड़ी खूबसूरत थी। बार्बी डाॅल के जैसे ही उसके बाल सुनहरे और आँखें नीली थीं। उसके पिता दिल्ली से ट्रांसफर होकर आये थे। सेण्ट्रल गवर्मेन्ट की नौकरी मे थे। बस हमें इतनी ही जानकारी थी, उनके बारे में। उसके घर के सामने एक बडी़ सी खिड़की थी, जिसके पीछे वह लड़की अक्सर बैठी हुई दिखती। वह अपने मां-बाप की इकलौती सन्तान थी। वे लोग मुहल्ले में सदा अजनबी से रहे।
  इधर हम सभी बच्चे बडे़ होते-होते हाॅयर-सेकण्डरी स्कूल पहुँच गये, फिर काॅलेज भी। सैर-सपाटा, मौज-मस्ती करते हुए मेरा काॅलेज जीवन बीतने लगा था। कमल बारहवीं में फेल हो चुका था, और अब वह धीरे-धीरे हम दोस्तों से कटने लगा था। चूंकि मेरे घर से उस लड़की के घर की खिड़की स्पष्ट दिखालाई पड़ती थी, सो वह नियमित रूप से मेरे पास आता और घण्टांे उस खिडकी को निहारा करता था। मैंने कई बार उससे कहा कि किसी दिन उनके घर चलते हैं और उस लड़की से मिल आते हैं, पर वह मना कर देता। वह सिर्फ़ एक लाइन मेें उत्तर देता कि उसे उस लड़की को देखना और सिर्फ़ देखना ही अच्छा लगता है।  धीरे-धीरे वह उस लडकी से बेइन्तेहा मोहब्बत करने लगा था। अजीब तरह की मोहब्बत थी, देखना और सिर्फ़ देखना भर। न मिलने की उत्सुकता, न बात करने की उत्कण्ठा। बस देखते ही रहना। हालांकि मैं भी कमल की ख़ातिर उस लड़की से मिलना चाहता था। क्योंकि कमल की उसके प्रति दीवानगी बढती जा रही थी। वह पढ़ने के नाम पर घर से क़िताब लेकर आता और मेरे घर की छत पर घण्टांे बैठकर लगातार खिड़की की तरफ़ ही निहारता रहता।
  एक दिन हिम्मत करके मैंने उस लड़की के घर की कुण्डी खड़खड़ाई। मंै उनके घर दीपावली की शुभकामना देने के बहाने गया था। उसके पिता ने दरवाज़ा खोला और बडे़ ही रूखे स्वरों मे मेरे आने का प्रयोजन पूछकर मुझे दरवाज़े से ही चलता कर दिया। उसके बाप के ऐसे व्यवहार से मैं तिलमिला उठा था। हमारा परिवार हमारे मोहल्ले का सबसे प्रतिष्ठित परिवार माना जाता था। ऐसे में उसका ऐसा व्यवहार मुझे बेहद खल गया। मंैने कमल से स्पष्ट कह दिया कि यार, आज तेरे चक्कर में मुझे बेहद अपमानित होना पडा़ है। तू घण्टांे छत पर रहता है, तो उससे ग़लत मैसेज़ जाता है।
अच्छा ठीक है मंै अब नहीं आऊंगा कहकर कमल गया, तो फिर मेरे घर नहीं आया । उसके बाद भी मैं अकसर उसे सड़क पर खडा़ होकर खिडकी की तरफ निहारते हुए ही पाता। अब मुझे भी कमल एक पागल लड़का लगाने लगा था। धीरे-धीरे मैंने काॅलेज़ की पढा़ई पूरी कर ली। कुछ दिनों बाद मुझे अपने शहर से बहुत दूर एक सरकारी नौकरी मिल गइर्, और फिर मैं अपनी उस नौकरी में मस्त हो गया। ग्रामीण एरिया में काम करने से संबंधित नौकरी थी मेरी । धीरे-धीरे उस क्षेत्र के सारे मैदानी कर्मचारी मेरे दोस्त बन गये और मैं पूरी तरह उनमें रम गया। कमल को तो मै पूरी तरह भूला ही चुका था। बस इतना पता चल पाया था कि वह बडी़ ही मुश्किल से हाॅयर सेकेण्डरी परीक्षा पास कर पाया था, और किसी प्रेस में काम करने लगा था। उधर मेरा काम बडा़ ही मजे़दार था। रोज नये-नये लोगों से मिलना-जुलना और नये-नये गाँव में जाना लगा रहता था। गाँव की अल्हड़ लड़कियों से नयन-मटक्का आदि सभी बातें मुझे स्वार्गिक आनंद की अनुभूति कराती थीं। मुझे रोज लगता कि मैं साथी कर्मचारियों के साथ पिकनिक पर निकला हूं। खूब मौज-मस्ती में दिन बीत रहे थे ।
इधर कमल ने प्रेस में ही काम करने वाली किसी लड़की से शादी कर ली थी। इधर मेरी भी शादी हो गई थी। अब मैं अपने परिवार में व्यस्त हो गया था। हमारा वह पुश्तैनी मकान अब बिक चुका था, सो उधर जाना ही नहीं हो पाता था। धीरे-धीरे मैं अब युवावस्था से अधेडा़वस्था की ओर बढ़ रहा था। मेरी सोच का दायरा खुद और परिवार तक ही सिमटकर रह गया था। कुल मिलाकर खुदर्गज ही हो गया था मैं। ़एक दिन मैं किसी सरकारी काम से अपने शहर आया था। बस से उतरते ही मुझे कमल नज़र आया। वह एक गुमटी पर बैठा चाय पी रहा था। उसकी दाढी़ बढी़ हुई थी। उसके बाल भी बडे़ ही बेतरबी तरीके से बढे़ हुए थे। उसने पैरों में स्लीपर पहन रखी हुई थी। उसके शर्ट की बटन्स टूटी हुई थी। पेण्ट को उसने एक तरफ से मोड़ रखा था, जबकि उसकी पैण्ट दूसरी तरफ़ से बिल्कुल भी मुडी़ हुई नहीं थी। कुल मिलाकर मैले-कुचले से कपडे़ पहन रखा था उसने। मेरे आवाज़ देने उसने मेरी तरफ़ नज़रंे उर्ठाइं। उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान उभरी और कंपकंपाने लगी। थोड़ा सहज होकर उसने लगभग मरी सी आवाज़ में मुझसे पूछा कैसे हो? मैंने कहा बढ़िया हूँ । कमल की इस तरह फटेहाल हालत की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। मैंने कहा तुमने यह क्या हाल बना रखा है। इस पर वह खामोश नज़रों से मुझे देखता रहा फिर कुछ बोलने लगा
  कमल से बातें करते हुए मुझे समझ में आने लगा था कि उस के साथ सब कुछ ठीक नहीं है। कमल मेरा लंगोटिया यार था। मेरी यह नैतिक जिम्मेदारी थी कि मैं उसे व्यावहारिक तौर पर सान्त्वना दूँ। केवल जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलने वाला था, सो मंैने झूठ-मूठ ही उससे कह दिया कि मैं सिर्फ़ उसी से मिलने आया हूँ । हालाँकि मंै सरकारी दौरे पर आया था। मंैने उसे बाल कटवाने और शेविंग कराने के लिये राजी कर लिया। मैंने अपने बाॅस को मैसेज़ कर दिया कि मुझे अचानक पारिवारिक काम आना पड़ा है सो मुझे दो दिनांे की छुट्टी चाहिये। कमल से बातें करते हुए मुझे यह अहसास हो चुका था कि फ़िलहाल उसके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं है। मेरे कुरेदने पर उसने बताया कि वह कई-कई दिन प्रेस क्लब में ही रात गुजार लेता है। कई बार पे्रस में ही सो जाता है। मैंने कमल से कहा- यार चल हम दोनों भाई होटल में रहते हैं, जहां सिर्फ मंै और तुम ही रहेंगे। वहाँ हमें डिस्टर्ब करने वाला कोई भी ना होगा। हमें अपना बचपन फिर से जीने का मौका मिला है। बचपन का जिक्र सुनते ही उसकी आँखों में चमक सी आ गई। निश्चित तौर पर यह चमक उस खिड़की वाली लडकी को याद करके आई थी ।
हमने वहीं नज़दीक में एक औसत दर्जे के होटल का कमरा किराये से लिया, और उसमें शिफ्ट हो गए। हम दिनभर इधर-उधर की बातें करते रहे। मैंने जानबूझकर उस खिड़की वाली लड़की का जिक्र नहीं किया। शाम होने पर मुझे लगा कि कमल कुछ बेचैन सा लगने लगा है। मंै समझ गया कि उसे शराब चाहिए। अब तक मुझे ऐसा लगने लगा था कि कमल शराब के साथ शबाब का भी शौक रखता होगा। मैंने उसकी बेचैनी को ताड़कर उसके लिये शराब की व्यवस्था कर दी। हमने खाना अपने कमरे में ही मंगा लिया था। उस पर जब नशा तारी होने लगा तो मैंने उसे छेड़ते हुए पूछा क्या बाॅस शराब के ही शौकीन होे या शबाब के भी ? शबाब का नाम सुनकर वह एकदम से ख़ामोश हो गया। उसके चेहरे से गंभीरता टपकने लगी। मुझे लगा कि शायद मैंने उसकी कोई दुखती रग पर हाथ धर दिया है। मैंने उसे सहज करने के लिए अपनी रंगीन रातों की झूठी कहानियाँ बनाकर सुना दी और अपने-आपको निहायत ही लूज़ करैक्टर का बताया, जिससे कि उसे भी अपनी बात बताने में अपराधबोध महसूस न हो सके। मेरी इस बात पर वह मुस्कुराया और कहने लगा कि जीवन में मुझे सैकडांे़ अवसर मिले थे, लेकिन यार तुझे तो याद ही होगी वो खिड़की वाली लडकी । यार मैंने अपने जीवन में उसके अलावा कभी किसी के बारे में सोचा ही नहीं। मंैने मन ही मन उससे प्राॅमिस कर लिया था कि मैं लड़कियों की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूगाँ। यहाँ तक कि मैंने अपनी बीबी को भी आज तक नहीं छुआ। न जाने लड़कियांे को छूने के अहसास मात्र से मेरे मन में अपराध-बोध सा आ जाता था। हालाँकि मंैने अपनी पत्नी को भी उस खिड़की वाली लड़की के बारे में बताया था। साथ ही उससे यह भी कहा था कि मैं किसी दूसरी महिला का स्पर्श भी नहीं करूंगा। मेरी बीवी ने सब कुछ जानते-बूझते मुझसे शादी की। शादी से पहले जब तक वह दोस्त की तरह थी, कहती थी कि मैं तुम्हारी भावनाओं को समझती हूँ। हम दोनों उस खिडकी वाली लडकी के अहसास को ज़िन्दा रखेंगे, लेकिन जैसे ही वह मेरी पत्नी बनी, न जाने क्यों उसकी सोच एक साधारण सी औरत के रूप में तब्दील हो गई। मुझे हिजड़ा नपुंसक, और ज़िन्दगी को बर्बाद करने वाला कहकर प्रताड़ित करने लगी। इसके अलावा तुम्हारे जैसे नकारा आदमी की जरूरत नही है, कहकर मुझे मेरे अपने घर से भी निकाल दिया। आजकल वह लिव इन रिलेशनशिप में किसी दूसरे पुरूष के साथ मेरे ही घर में रहती है। यह सब बताते-बताते वह सुबकने लगा। मैंने उसे ढाढ़स बंधाया। वह जब सामान्य हुआ तो मंैने उससे पूछा-यार उस खिड़की वाली लड़की का क्या हुआ? वे लोग अभी भी वहीं रहते हैं, या कहीं और चले गये?  
  यार उस लड़की की रीढ़ की हड्डी ठीक से विकसित नहीं हो पायी थी, सो वह एक ऐसी व्हीलचेयर पर बैठी रहती थी, जो उसकी पीठ को पूरी तरह सहारा दे सके। उसकी लंबी पीठ वाली व्हील चेयर की जगह खिड़की के पास ही थी, सो वह ज़्यादहतर खिडकी के पास ही नज़र आती थी। कुछ सालों बाद तो वह मर गई यार, कहते हुए वह फिर सुबकने लगा।
  इधर मैं सोचने लगा हे भगवान यह कैसा आदमी है। क्या यह दूसरे ग्रह का प्राणी है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ वासना-रहित विशुध्द प्रेम करना ही जानता है। क्या व्यावहारिक जीवन में ऐसे लोग पागल ही कहला सकते हैं। देह जगत की इस दुनिया में चमकीली आत्मा और देह वाले व्यक्ति भी निवास करते हैं । मेरे इस तरह से सोचने के दरम्यान ही मैंने देखा कि वह बिस्तर पर सो गया है। उसके बारे में सोच मेरे अन्तस में भी उजाला भरने लगा था । मंैने लाईट बंद की और नाईटलैम्प का बटन दबाने जा ही रहा था कि मैंने देखा कि कमरे मे हल्की-हल्की चमकीली रोशनी हो रही है। मेरा ध्यान बेड पर गया तो मुझे लगा कि वहां पर एक बडा सा चमकने वाला रेशम का कीड़ा है। उसमे से ही हल्की चमकीली रोशनी आ रही है। मंै सोचने लगा कमल ने अपनी चारो तरफ़ रेशम का जाल ही बुन लिया है और स्वयं उसके अन्दर बंद है। वह रेशम का ककुन उसकी कब्र बन गया है। पगला जानता नहीं है कि रेशम के एक ककून से कुछ नहीं बन पाता। दुनिया को रेशमी बनाने के लिये सबको रेशम का कीड़ा बनना होगा, जो कि असंभव है।
                                 2 देने का सुख
मुनिया को विदा करते हुए राकेश की आँखें भर आई थीं। वह टाईममशीन में बैठकर कई साल पीछे पहंुच गया था। वह अकसर देखता कि उसके मुहल्ले में प्लास्टिक की पन्नी बीनने वालेे लड़के-लड़कियाँ घूमते रहते हैं। वे अपने पीछे एक गंदा सा प्लास्टिक का बोरा रखे हुए होते और कचरे के ढेर में से प्लास्टिक की पन्नियां बीनकर उसी में डालते जाते। वह यह भी देखता कि वे प्रायः चार-पांच के झुण्ड में होते। उनके हाथों में एक लकड़ी होती। अपनी बाॅल्कनी मंे बैठकर वह इन पन्नी बीनने वाले बच्चोें की गतिविधियों को ध्यान से देखा करता। वह पाता कि काॅलोनी के आवारा कुत्ते उन पर बडे ही खतरनाक तरीके से भौंका करते थे। हाथ में लकड़ी होने के बावजूद वे बच्चे इन कुत्तोें से बेहद आंतकित रहते थे। वे उन्हंे लकड़ी से मारने की बजाय अपना ही रास्ता बदल देते थे। ये अवारा कुत्ते न जाने क्यों इन्हेेें अपना दुश्मन समझते थे। ये बच्चे ज़्यादहतर घूरों पर ही पन्नियाँ बीनते और कुत्ते भी उन्हीं घूरांे पर अपना खाना तलाशते थे। संभवतः कुत्तांे को यह लगता होगा कि वे उनका खाना चुरा रहे हंै।
राकेश अविवाहित ही था और अविवाहित ही रहना भी चाहता था। वह एक सरकारी नौकरी में होने के बावजूद चिन्तक था और सामाजिक सरोकारों के प्रति पूर्णतः समर्पित था। वह इन बच्चों के लिये कुछ करना चाहता था, पर क्या करें, कुछ सोच नहीं पा रहा था।
      जिस तरह से वे दस-बारह साल के पन्नी बीनने वाले बच्चे कुत्तों से आंतकित रहते थे, उसी तरह काॅलोनीवासी इन बच्चों से आतंकित रहते थे। काॅलोनियों मे आमतौर पर यह माना जाता है कि ये बच्चे नंबरी चोर होते हैं और पन्नी बीनने के बहाने ये चोरी करने के लिये सूने घरों की रैकी करते रहते हंै। उसके बाद वे अपने मांॅ-बाप को ख़बर कर देते हंै। शहर मे पिछले दिनांे कुछ इसी तरह की घटनाएँ प्रकाश में आई थीं। सामाजिक सरोकारांे से जुडे़ होने के बावज़ूद इन घटनाआंे का प्रभाव सुरेश पर भी पड़ा था, और वह भी दूसरे काॅलोनीवासियों की तरह इनसे ही आंतकित सा रहने लगा था।
राकेश इस काॅलोनी में एक किरायेदार की हैसियत से रहता था। उसका मकानमालिक उसी शहर की दूसरी काॅलोनी में रहता था। राकेश ने घर पर झाडू-पोछा और बर्तन साफ़ के लिये एक उम्रदराज़ बाई रखी थी, जो कि पास की ही स्लम बस्ती से आती थी। वह बिल्कुल ही निरक्षर थी ।
दीवाली का त्यौहार नज़दीक ही था। राकेश ने अपनी बाई को साफ़-सफ़ाई के बारे में समझा दिया था। उसने यह भी चेता दिया था कि लकड़ी की अल्मारी में रखे हुए दीमक लगे हुए कागजों की भी सफ़ाई करनी है । बाई को समझाकर वह आॅफिस चला गया था। दो-तीन दिनोें बाद एल.आई.सी की पालिसी मेच्योर्ड होने की सूचना मिलने पर उसने उसे खोजना शुरू किया तो उसके पैरो तले जमीन खिसक गई। एल.आई.सी.पाॅलिसी, बैंक एफ.डी. और किसान विकासपत्र आदि तमाम इन्वेस्टमेंट वाली फाईलों के साथ-साथ उसकी शैक्षणिक दस्तावेजों वाली फाईल भी नहीं मिल रही थी। वह इन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को लोहे की अल्मारियों मे ही रखता था। वह खोजते-खोजते वह परेशान सा हो गया था । उसे खुद पर ही गुस्सा आ रहा था कि आखिर वह इतना लापरवाह कैसे हो गया है। उसने सारा घर छान मारा, पर उसकोे वह फ़ाईलें कहीं नज़र नहीं आईं । वह अपना सर पकड़कर बैठा था, तभी लोहे के गेट पर खटखटाहट सुनाई पड़ी। दरवाजे़ पर सफे़द बोरी टांगी हुई एक पन्नी बीनने वाली बच्ची खड़ी हुई थी। इस समय उसे देखकर राकेश का पारा, गर्म हो गया । उसने नज़दीक जाकर उसे ज़ोर से फटकारा-क्या है? यहाँ क्यों खडी़ है? चल भाग यहाँ से। अब तुम लोग भीख भी मांगने लगे हो.... । वह कुछ और बोल पाता, इससे पहले ही उस लड़की ने अपने हाथ में रखी दो फाईलें उसकी ओर बढ़ा दी। उसने उसे हाथ में लिया। वो दोनांे ही उसकी गुमशुदा फाईलें थीं । उसे याद आया कि एक दिन जल्दी-जल्दी में उसने इन फाईलों को लोहे की जगह लकडी़ की अलमारी में रख दिया था और उसकी अंगूठा-छाप बाई ने इन फाइलों को कचरा समझ कर बाहर फेंक दिया था। वह कर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा फाईलांे को देखता रहा। वह जब तक संभलता, लड़की वहां से जा चुकी थी। उसने तुरंत ही गेट खोला और उस लड़की को देखने बाहर निकल आया, पर वो लड़की दूर-दूर तक नज़र नहीं आई। उस लड़की के प्रति अपने रूखे व्यवहार पर वह बेहद शर्मिन्दा था। वह उस लड़की से माफ़ी माँगना चाहता था। वह उन फाईलांे के लिये उसे दिल से धन्यवाद भी देना चाहता था। उसे आत्मग्लानि की अनुभूति हो रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके सर पर टनों बोझ है, जो उस लड़की से माफ़ी मांगने पर ही उतरेगा। वह पूरे सप्ताह भर इंतज़ार करता रहा, पर लड़की कहीं नहीं दिखी।
  एक दिन जब वह अपनी बाल्कनी मेें बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी उसे वह लडकी नज़र आई। उसके साथ उसके और भी साथी थे। उसने उन्हें आवाज़ देकर बुलाना चाहा, पर उन्हंे यक़ीन ही नहीं हुआ कि उन्हें कोई बुला भी सकता है। वे नही आये फिर राकेश नीचे आकर अपनी बाई को उन्हें बुलाने भेजा। इस पर वे सभी डरते-डरते आये और राकेश के समक्ष दयनीय मुद्रा मंे खडे़ हो गये। राकेश ने साथ रखी हुई कुर्सियों पर उन्हें बैठने को कहा। इस पर वे मना करने लगे। उसके थोडा और ज़ोर देने पर वह सकुचाते हुए से उन कुर्सियों पर बैठ गये। तुम लोग बैठो मैं आता हूँ... कहकर राकेश अंदर चला गया और फ्रिज़ से काजू कतली का पैकेट निकाल लाया। राकेश ने उन सभी को मिठाई दी । मिठाई खाते हुए उन सभी की आंॅखों में खुशियां चमक रही थीं । फिर राकेश ने उन सभी से बारी-बारी उनका नाम पूछा। राकेश के पास फ़ाईलें पहुुंचाने वाली लडकी का नाम मुनिया था। जैसा कि मुनिया ने बताया कि वह पिछले ही साल चैथी कक्षा पास हुई थी, लेकिन उसके पिता ने आगे पढा़ने से मना कर दिया था। राकेश ने उससे पूछा कि बेटा तुम्हें कैसे पता चला कि ये फ़ाईलंे मेरी ही हैं। इस पर उस लड़की ने बताया कि बाहर में आपकी नेमप्लेट लगी हुई थी और आपके कई सारे कागजों में आपका नाम हिन्दी में लिखा हुआ था । राकेश को वह बच्ची एक्स्ट्रा-आॅर्डनरी लगी । उसने उसे अपने करीब बुलाया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगा । उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे महसूस हुआ कि वह उसकी बेटी है। वह सोचने लगा कि यदि सही उम्र में उसकी शादी हो गई होती तो उसकी बेटी भी लगभग इतनी ही बडी़ होती । यह सोचकर उसे उस पर और भी ज्यादा दुलार आने लगा । वह फिर सोचने लगा कि बच्चे तो बच्चे होते हैं फिर चाहे वे हमारे अपने हो या पन्नी बीनने वाले के हों । उसके बालों पर हाथ फेरते हुए उसके दिल से आवाज़ आई मुझे इस बच्ची के लिये कुछ करना चाहिये। उसने सभी बच्चों से पूछा कि तुममे से कौन-कौन बच्चा पढा़ई करना चाहता है। इस पर सभी ने हाथ उठा दिये। राकेश ने उनसे वादा किया कि कल से वह उन सभी को अपने घर पर पढ़ायेगा ।
  अगले दिन से सभी बच्चे सुबह उसके घर पर पढ़ने आने लगे। वह उन्हें बीच-बीच में खाने-पीने की चीजें़ भी देता रहता, कि जिससे कि उनका उत्साह बना रहे। धीरे-धीरे बच्चों को पढ़ाने में उसे मजा आने लगा, और राकेश को आत्मसंतोष भी मिलनेे लगा। मुनिया उन सभी बच्चांे में तेज़ थी। उसके अंदर सीखने की ग़जब की ललक थी। राकेश ने महसूस कर लिया था कि यदि इस लड़की पर ध्यान दिया जाये, तो यह बहुत आगे बढ़ सकती है। राकेश को एक सरकारी योजना के बारे में मालूम था, जिसमें स्कूल छोड़ चुके बच्चांे को सीधे ही पाँचवी की परीक्षा दिलाने की अनुमति होती थी। समय आने पर उसने उस योजना के तहत मुनिया को पांचवी की परीक्षा में बिठा दिया। वह मुनिया को पूरी तरह अपनी बेटी मान चुका था। वह चाहता था कि छठवीं कक्षा में वह नियमित स्कूल जाये, लेकिन इसके लिये ज़रूरी था कि उसके पिता सहमत हों। वह मुनिया के घर पहुंचा। उसके घर की हालत बहुत ख़राब थी। उसका बाप एक नंबर का शराबी था। वह रिक्शा चलाता था। उसकी माँ नहीं थी। राकेश ने उसके बाप से बात की तो वह मना करने लगा। राकेश के बहुत समझाने पर और यह आश्वस्त करने पर कि उसका सारा खर्च वह स्वयं उठायेगा, वह बडी़ ही मुश्किल से तैयार हुआ।
अब राकेश ने मुनिया का स्कूल में एडमिशन करा दिया था। अब वह नियमित रूप से स्कूल भी जाने लगी थी। वह नियमित रूप से राकेश के घर आती और मन लगाकर पढ़ती। अब अपने से छोटे बच्चों को भी वह खुद ही पढा़ने लगी थी।
    समय बीतता जा रहा था कि एक दिन राकेश को झटका सा लगा। उसका तबादला दूसरे शहर मेें हो गया था। वह मुनिया को लेकर चिंतित हो उठा कि अब उसकी पढ़ाई का क्या होगा। उसे पन्द्रह दिनों के अन्दर नई जगह पर पहुंचना था। उसने मुनिया के पिता के हाथों में एक हज़ार रूपये रखकर हाथ जोडकर कहा प्लीज़ आप मुनिया की पढा़ई मत छुड़वाउंगा। मैं इस लड़की को आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ। नोट देखकर उसके बाप की आंखों में चमक आ गई और उसने बड़ी ही लापरवाह से कहा ठीक है साहब, मैं इसकी पढ़ाई नहीं छुडवाउंगा। उसकी बातों से राकेश संतुष्ट नहीं हुआ, पर उसके पास कोई चारा भी नहीं था। आखिर वह शराबी ही तो उसका अपना बाप था। अब मुनिया को उसके भाग्य के भरोसे छोड़कर वह नये शहर पहुँच गया। नये शहर में नौकरी करते उसे तीन महीने हो गये थे । इन तीन महीनों मेे वह रोज मुनिया के बारे मेें सोचा करता। मुनिया के बाप द्वारा लापरवाहीपूर्वक दिया गया उत्तर उसे आशंकित और आतंकित करता रहता था। आख़िर एक दिन वह मुनिया से मिलने के लिये उसके शहर पहुँच गया। वहां जाकर उसे सारा माजरा समझ में आने लगा। उसके बाप ने उसका स्कूल जाना बंद करा दिया था। अब वह फिर से पन्नी बीनने जाने लगी थी । उसकी पढ़ाई के लिये दिये गये एक हजार रूपये की उसके बाप ने शराब पी ली थी। राकेश को सामने देख वह रूआंसी हो उठी और दौड़कर उससे लिपट गई। उसने फिर से उसके बालों में हाथ फेरा। राकेश ने उसके बाप को समझाने की कोशिश की, पर वह नहीं पढा़ने के लिये अड़ा रहा। थक-हारकर जब राकेश वापस लौटने लगा तो उसके बाप ने कहा-साहब यदि आपको मुनिया की इतनी ही चिंता है तो मंै इसे आपको बेचने के लिये तैयार हूँ । मंै इसे आपको बीस हज़ार रूपये में बेच सकता हूँ । यह सुनकर राकेश सकते में आ गया वह सोचने लगा-हे भगवान! ये बाप है या कोई जल्लाद। उसका जी चाहा कि वह नज़दीक के पुलिस थाने में उसके खिलाफ़ रिपोर्ट लिखवा दे, पर इससे क्या हासिल होगा। उलटे वह वहाँ से लौटकर मुनिया को ही मारा करेगा।
मैं सोचकर बताता हंू कहकर राकेश वहाँ से चला गया। उसके अन्दर अजीब तरह का द्वंद्व चल रहा था। उसका एक मन कहता था कि यह तो हो सकता है। दूसरी तरफ उसका दूसरा मन करता कि तू यदि लड़की को खरीदेगा तो तेरे अन्दर बाप की जगह मालिकपन का भाव आ जायेगा। ऐसे में तू उसके साथ न्याय कहाँ कर पायेगा। खैर उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि उसे मुनिया को इस नर्क से निकालना ही है। आज मैंने यदि उसके भले के लिये उसे नहीं खरीदा, तो उसका बाप उसे दूसरे को बेच देगा और उसकी ज़िन्दगी नर्क हो जायेगी। यह विचार आते ही उसने नज़दीक के एटीएम से बीस हजार रूपये निकाल लिये और वापस मुनिया के घर की तरफ चल पडा़ । उसने उसके बाप को बीस हज़ार रूपये देकर मुनिया को खरीद लिया। उसने उसके बाप से स्टाम्प पेपर पर लिखवा लिया कि वह मुझे गोद दे रहा है। हालांकि वह जानता था कि गोद लेने की प्रक्रिया  बहुत ही उलझी हुई होती है और कोई सिंगल पुरूष को एक लड़की गोद तो मिलने से रही... फिर भी उसके बाप की बदमाशी से बचने के लिये यह जरूरी था। उसने बाजार से मुनिया के लिये कुछ कपड़े आदि खरीदे और फिर उसे लेकर वह अपने घर आ गया। वहाँ उसने एक अच्छी स्कूल में उसका एडमिशन करा दिया। हालांकि पढा़ई शुरू हुए चार माह हो चुके थे, तो भी राकेश को यक़ीन था कि वह रिकवर कर लेगी। मुनिया कुशाग्रबुध्दि की लडकी थी, सो उसने जल्दी ही पूरा कोर्स कवर कर लिया। राकेश ने अपनी बेटी के रूप में ही लोगांे से उसका परिचय कराना शुरू कर दिया था।
मुनिया को पढा़ई के साथ-साथ खाना बनाने का भी बड़ा शौक़ था। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वह राकेश को एक से बढ़कर एक व्यंजन बनाकर खिलाने लगी। बाप और बेटी दोनांे की ज़िन्दगी बडे़ मजे से कटती रही। राकेश अक्सर पाता कि वह पन्नी बीनने वाले दूसरे बच्चांे को देखकर दुःखी हो जाती है। वह अपने बचपन में पहुँच जाती थी। धीरे-धीरे मुनिया की सामाजिक कार्योंं में रूचि बढ़ती जा रही थी, और उसने सबसे प्रतिष्ठित सामाजिक विज्ञान काॅलेज़ से स्नातकोŸार की उपाधि प्राप्त कर ली थी। उसने एक एनजीओ की तरह कार्य करना शुरू कर दिया। उसने पन्नी बीनने वाले बच्चांे, प्लेटफाॅर्म पर आवारा भटकने वाले बच्चों और भिखारी बच्चों के लिये स्कूल खोल लिया। धीरे-धीरे उसका एनजीओ शहर का सबसे प्रतिष्ठित एनजीओ बन गया था। सामाजिक कार्यों के दौरान उसकी जान-पहचान महेश नामक युुवक के साथ हो गई थी। वह भी बेहद गरीब घर का लड़का था और उसे भी किसी दूसरे ने ही पाल-पोसकर बडा़ किया था, सो उसे भी इसी तरह के सामाजिक कार्यों में रूचि थी। दोनों ने आपस में शादी का तय किया था। अलग-अलग जाति के होने के बावजूद राकेश ने उनकी अरेन्ज मैरिज़ कराई थी और कन्यादान करते हुए उसे अभी ही विदा किया था। हालांकि महेश के घर भी उसी शहर में था, तो भी बेटी की विदाई तो आखि़र विदाई ही होती है। इसलिए उसकी आँखे भर आई थी।
                                    3 साध्वी
अख़बार मे निधन वाली जगह पर मेरी नज़र पड़ी। संजना शुक्ला, उम्र 26 वर्ष, के निधन के समाचार ने मुझे भीतर तक हिला दिया। मुझे यकीं ही नहीं हुआ कि हमारी संजना नहीं रही। मंैने फोटो को ध्यान से देखा फिर मुझे यकींन करना ही पड़ा। संजना मेरे ही आॅफ़िस मे काम करने वाली एक लडकी थी। हालाँकि वह शादीशुदा और एक तीन साल के बच्चे की मां थी, पर उसका खिलंदड़पन उसे लडकियों की श्रेणी मे रख देता था। वह एक बेहद ही ख़ूबसूरत लडकी थी। जितना ख़ूबसूरत उसका चेहरा था, उससे भी कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत उसका दिल था। वह रोज नये-नये कपड़े पहनकर आॅफ़िस आया करती थी। हालांकि वह साधारण सी क्लर्क ही थी, पर उसके पहनने-ओढ़ने के ढंग से ऐसा लगता था कि वह एक सम्पन्न परिवार की लडकी है। वह ज़्वेलरी भी अलग-अलग तरीके की पहना करती थी। वह हमेशा ही खिलखिलाती रहती। उसके आने से आॅफ़िस मे खुशियां बिखर जाती थीं। हमारे आॅॅिफ़स की उसकी दूसरी साथी लडकियाँ उससे जलती थीं। वे उसे बदनाम करने की तमाम कोशिशें किया करती थीं। संजना को देखकर उन लडकियों के मन मे हीन भावना अनचाहे बच्चे की तरह पैर पसारने लगती थी। उन्हांेने सारे आॅफ़िस मे यह बात फैला दी थी कि वह निहायत ही चालू टाईप की लडकी है, और लटके-झटके दिखाकर अपना उल्लू सीधा कर लेती है। अधिकारियांे को तो वह अपनी मुट्ठी मे रखती है। काम-धाम करती नहीं है। कुल मिलाकर वह अपने औरत होने का पूरा-पूरा फ़ायदा उठा रही है।
मेरे दिमाग़ मे भी उसकी कुछ ऐसी ही छवि बनी हुई थी। इस बीच अचानक एक आदेश ज़ारी हो गया कि वह मेरे ही अधीन रहकर काम करेगी। आदेश पढ़कर मंै टेंशन मे आ गया कि मेरे तो सारे काम पेण्ंिडग ही रह जायंेगे। बिग बाॅस से तो सामना मुझे ही करना होगा। वह थोडे़ ही सुनेगा कि मेरे अण्डर मे जो क्लर्क है, वो कुछ काम नहीं करती है। बाॅस तो यह कहेगा कि तुम्हें काम लेना नहीं आता है। इस बीच मेरे साथ काम करने के लिये एक साथी अधिकारी भी आ गया। संदीप नाम का यह अधिकारी बड़ा ही कड़क और तुकमिजाज लडका था। वह औरतों से बेहद नफ़रत करता था। उसकी पत्नी उसके साथ मात्र एक महीने ही रही थी और पढ़ाई पूरी करने के बहाने अपने मायके दिल्ली चली गयी थी, जो फिर वापस नहीं आई थी। आया था तो तलाक़ का नोटिस और न मानने पर दहेज़ के प्रकरण मे फँसा देने की धमकी। वह भांैचक रह गया था कि आख़िर उसकी ग़लती क्या है। एक महीने का साथ भला तलाक़ का आधार कैसे बन सकता है। पर जैसा कि संदीप ने बताया था कि उसकी शिक्षा-दीक्षा मिलिट्री स्कूल मे हुई थी, सो वह बेहद अनुशासित जीवन जीने का आदी है। वह सुबह चार बजे उठकर घर की साफ़-सफ़ाई कर दिया करता था। अपनी पत्नी के उठने से पहले ही वह बर्तन वग़ैरह भी साफ़ कर दिया करता था। अपने और अपनी पत्नी के कपड़े भी धो दिया करता था। किचन मे जाकर सब्ज़िया भी काट दिया करता था। उसकी पत्नी इसी बात पर नाराज़ हो गई थी कि तुम्हीं सब काम कर लेते हो, तो मेरी क्या ज़रूरत ही क्या है। आमतौर पर महिलाओं को शिक़ायत रहती है कि उनके पति घर के कामांे मे उनकी मदद नहीं करते हंै, लेकिन संदीप के साथ उल्टा हो रहा था। उसे काम मे मदद करने की सज़ा मिल रही थी।
ख़ैर संजना ने हमे ज्वाॅइनिग दे दी थी। संदीप ने मुझे आश्वस्त किया था कि सर मैं तो काम लेने मे उस्ताद हूँ। मैं तो डण्डा मारकर भी काम ले लेता हूँ। अब संजना हमारे साथ काम करने लगी थी। हमने उसके प्रति अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर उसके किये गये कामों मे मीन-मेख निकालना शुरू कर दिया, लेकिन वो मुस्कुराकर अपनी ग़लती मानकर तुरन्त उसमें सुधार करने लगी। कुछ ही दिनांे बाद हमने पाया कि वह तो बहुत अच्छी तरह अपना काम करने लगी है। वह तो कामांे को इतने अच्छे से समझ गयी थी कि हमारे बोलने से पहले ही वह सारा काम कर देती थी। वह कुछ गुनगुनाती हुई सी पूरी लगन के साथ काम करती थी। अब तक हमारे पूर्वाग्रह की बर्फ़ पिघलने लगी थी। संदीप भी उसको लेकर सहज हो चुका था। एक दिन मैंने संजना से पूछा कि तुम बिना किसी तनाव के इतना सारा काम कैसे कर लेती हो इस पर उसने बताया-सर मैं कामों को बोझ न समझकर ईश्वर द्वारा मुझे सौंपी गई ज़िम्मेदारी मानती हूँ और ऐसा ही मैं अपने जीवन को भी समझती हूं। सर मैं दूसरांे के लिये जीना चाहती हूँ, अपने लिये तो सभी जीते हैं। यह मुझे उसका बड़बोलापन लगा। धीरे-धीरे वह हमसे अनौपचारिक होने लगी। बातांे ही बातांे मे उसने बताया कि उसकी साड़ियां सेल से खरीदी हुई सस्ती सी होती हैं, और गहने भी पाॅलिश वाले ही होते हंै। उसने बताया कि सर अच्छा पहने-ओढ़ने से अपना आत्मश्विास तो बढता ही है, सामने वाले को भी अच्छा महसूस होता है। बीच-बीच मे उसके पुराने साथी लंच टाईम मे उससे मिलने आते, और मुझसे कहते कि सर आपने हमसे हमारा एक बेशक़ीमती हीरा छीन लिया है।
  अब तक संजना को हमारे साथ काम करते हुए लगभग छः महीने हो चुके थे। हमंे पता चल चुका था कि वाकई में वह दूसरों के लिये ही जीती है। उसने अपनी वाणी के जादू से माइग्रेन जैसी बीमारी वाले दो-तीन सहकर्मियों का सरदर्द बहुत हद तक कम कर दिया था। वह कई लोगांे की पारिवारिक समस्याएँ हल करके उनके दाम्पत्य जीवन मंे रस घोल चुकी है। संजना की फिलाॅसफ़ी से हम बेहद प्रभावित थे और उसका बेहद सम्मान करने लगे थे। वह जब तक हमारे साथ रहती, हमें एक दैवीय सी अनुभूति होती रहती। वह एक साध्वी ही थी, जिसके साथ हमारे आत्मिक संबध स्थापित हो गये थे। वह उन कथित साध्वियांे से बिल्कुल अलग थी, जो संसार से पलायन कर संसार मे अच्छे से रहने की बातंे बताती हैं। वह उन साध्वियांे से भी अलहदा थी, जो विधवाआंे जैसे सफ़ेद ड्रेस पहनकर मनहूसियत बिखेरती हुइ त्यागमूर्तियां होने का ढोंग करती हैं। वह तो वास्तविक साध्वी थी, जो संसार मे रहते हुऐ, सांसरिक बातें करते हुए ही संसार की बड़ी-बड़ी समस्याआंे का हल चुटकी बजाते हुए ही कर देती थी।
एक दिन संदीप बड़ा ही खुश होकर आफ़िस आया, और कहने लगा-सर मैं आज आप दोनों को शहर के सबसे महंगे होटल मे पार्टी देने वाला हूँ। आज मेरी जिं़दगी का सबसे क़ीमती दिन है। मेरी पत्नी का पत्र आया है। उसने मुझसे मुआफ़ी मांगते हुए लिखा है कि उसे यह बात अच्छंे से समझ में आ गयी है कि छोटी-छोटी बातांे को लेकर वैवाहिक जीवन मे बिखराव ठीक नहीं है। उसने यह भी लिखा है कि उसे अपनी ग़लतियांे का अहसास हो गया है। हालांकि मेरे मां-बाप मुझे दूसरी जगह शादी कर देने का लालच देकर रोक रहे थे, लेकिन मंैने तो ठान लिया है कि मुझे तुम्हारे साथ ही ज़िन्दगी बितानी है। चंूकि मोबाइल मे दिल की बात कहना औपचारिकता निभाने जैसा होता है, इसलिये मैं पत्र लिख रही हूँ। संदीप ने चहकते हुए यह भी बताया कि वह अगले हफ़्ते आ रही है। इस पर संजना ने मुस्कुराते हुये कहा-सर हमंे भी अपनी मैडम से मिलवाइयेगा। इस पर संदीप ने बताया कि उसने पत्र मे लिखा है कि वह पहले हमारे आॅिफ़स ही आना चाहती है और फिर यहीं से हम दोनांे घर जायेंगे। उस दिन के बाद से मायूस सा रहने वाला संदीप खिला-खिला सा रहने लगा था। वह पूरी तल्लीनता के साथ कुछ न कुछ गुनगुनाते हुए काम करने लगा था। हमारे कमरे में पाॅजिटिव एनर्जी भरी रहने लगी। मुझे भी ऐसा लगने लगा था कि मैं अपनी उम्र से दस वर्ष छोटा हो गया हूँ।
निधारित दिन और समय पर संदीप अपनी पत्नी को लेने स्टेशन पहुँचा। स्टेशन से वे सीधे आॅफ़िस ही पहुंचे। संदीप ने अपनी पत्नी से मेरा परिचय कराया। वह संजना से उसका परिचय करा पाता, इससे पहले ही हम यह देखकर भांैचक रह गये कि उसकी पत्नी ने संजना के पैर छू लिये और कहने लगी- संजना तुम उम्र मे भले ही मुझसे छोटी होे, पर मैं तुम्हारा पैर छूने से अपने आपको रोक नहीं पा रही हूँ। थोड़ा सहज होने पर उसने बताया कि पता नही कैसे इसने मेरा नाम पता कर लिया और फेसबुक पर मेरी दोस्त बन गई। इसने धीरे-धीरे मुझे जीवन के गूढ़ रहस्यांे से परिचित कराना शुरू कर दिया। दाम्पत्य जीवन के महत्व को इसने इतने अच्छे से समझाया कि मेरा अभिमान पूरी तरह ख़त्म हो गया। फेसबुक मे चैटिंग के दौरान इसकी कही एक-एक बात मेरे दिल को छूती रही। इसने पूरी तरह से मेरा ब्रेन-वाॅश कर दिया, और मुझे एक अभिमानी लडकी से आदर्श लड़की बना दिया और सबसे खास बात यह रही कि इसने मुझे कुछ दिन पहले ही बताया था कि वह तुम्हारे ही आॅफ़िस में काम करती है। इसीलिये तो मैं आॅफिस से होते हुए ही घर जाने की बात लिखी, क्यांेकि मैं संजनाजी के दर्शन करना चाहती थी।
 संदीप ने अचरज से अपनी पत्नी से पूछा कि तुमने यह क्यों नहीं बताया कि तुम दोनों फेसबुक फे्रण्डस हो और लगातार संजना के टच मे हो। इस पर उसकी पत्नी ने बताया कि हम तुम्हंे सरप्राईज़ देना चाहते थे। इस पर संदीप ने संजना की ओर बडी कृतज्ञता के भाव से देखते हुये धन्यवाद कहा। साथ ही कहा- संजना तुम ग्रेट हो। इस पर बडे ही खिलंदड़पन के साथ हंसती हुई वह बोली-सर मैं ऐसी ही हूं।
इस घटना के कुछ ही दिनों बाद मेरा तबादला दूसरे शहर मे हो गया था। संदीप को दूसरी बड़ी नौक़री मिल गयी थी। उसका दाम्पत्य जीवन बडा सुखद था। फोन पर मेरी संदीप और संजना से बातंे होती रहती थीं। धीरे-धीरे व्यस्तता के कारण हमारे बीच बातों का सिलसिला कम होते होते ख़त्म सा हो चुका था
संजना को याद करते हुए मेरी आँखंे डबडबा आईं थीं, जिसे बड़ी ही कठिनाई से मंैने रोक लिया, क्योंकि मुझे संजना की कही गई बातें याद आ गयीं कि सर रोना किसी समस्या का हल नहीं है, बल्कि ये हमे कमज़ोर बनाता है। हमे ऐसी परिस्थ्तिियांे से बचना चाहिये, जो हमको रोने को मजबूर करे। हमंे तो सिर्फ़ मुस्कुराहट और खिलखिलाहट ही बांटनी चाहिये। मरना-जीना तो लगा ही रहता है। हमे तो सिर्फ़ भलाई करने की दृष्टि से अपने हर दिन को आख़री दिन मानते हुए भरपूर भलाई करनी चाहिये। संजना की इन बातों को याद करते हुये मैंने मन ही मन अपने आप से प्राॅमिस किया कि संजना आज से मैं भी तुम्हारी फिलासफ़ी को अपनी फिलासफ़ी बनाता हूं। अब मैं अपने लिये न जीकर दूसरों के लिये जिऊगाँ और तुम्हारे अधूरे कामों को मैं पूरा करूँगा।
                            4 शाहजहां
ताज़महल को लेकर मैंने इतनी सारी बातें सुनी हुई थीं कि मुझे ताजमहल एक विशुध्द प्रेम का मंदिर प्रतीत होता था, और शाहजहां उस मंदिर का पुजारी। शाहजहां के प्रति मेरे मन में अगाध श्रध्दा थी। उसके बारे में मैंने यह निगेटिव बातें भी सुन रखी थी कि उसने ताज़महल के कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे, जिससे कि कोई दूसरा ताज़महल न बन पाये। पर मैं इस बात पर कभी यक़ीन नही कर पाया कि मोहब्बत का इतना जीता-जाता मिसााल बनाने वाला आदमी कभी भी ऐसा कर्म नहीं कर सकता, क्योंकि जिसके दिल में मोहब्बत बसती है, वहाँ तो खुदा का वास होता हैं और खुदा कभी भी अपने बंदे से ऐसा कृत्य नहीं करा सकता। मैनंे प्रतियोगी परिक्षाओं के लिए इतिहास को विषय के रूप में चुना था और मैं शाहजहां से संबंधित अध्याय पढ़ रहा था। मैंने पढ़ा कि उसके बेटे औरगंजे़ब ने उसे आगरा स्थित लाल किले में कै़द करा दिया था। उसकी कोठरी की खिड़की ताज़महल की तरफ़ खुलती थी, जिससे वह ताज़महल का रोज दीदार किया करता था। मंैने यह भी पढा़ था कि उसकी बेटी आखरी वक्त तक उसकी तीमारदारी में लगी रही। आगे एक लाईन लिखी हुई थी कि वह अपनी बेटी के प्रति आसक्त था। यह मेरे लिए ग्यारह हजार वोल्ट का झटका सा था। मैं प्रेम के पुजारी से ऐसी अपेक्षा कैसे कर सकता था, कि वह अपनी बेटी के ही प्रति आसक्त हो जाये। मुझे यकीन नहीं हुआ और मैंने चार-पाँच और किताबे पढ़ डालीं। प्रायः सभी में यह बात लिखी हुई थी। कुछ किताबों में वाक्य को घुमा-फिरा कर यह बात कही गई थी। ख़ैर यह पढ़ने के बाद शाहजहां की प्रेम रूपी मूर्ति जो मेरे दिल मे थी, वह अब खण्डित होने लगी थी।
       मेरी शादी 32 बरस की उम्र में हुई थी। मेरी पत्नी हमारे शहर से लगभग 30 कि.मी. दूर स्थित एक गाँव में टीचर थी। वहाँ पर उसके साथ एक छोटी बच्ची, जो दूसरी कक्षा में पढ़ती थी, वह रहा करती थी। वह एक गरीब परिवार की लड़की थी और घर के सारे कामों में मेरी पत्नी की मदद किया करती थी। वह दिनभर हमारे घर ही रहा करती थी। वह मेरी पत्नी के साथ ही स्कूल जाती और आती। वह सिर्फ़ रात को अपने घर चली जाती। मेरी पत्नी ने मुझसे कहा था कि यह एक तरह से मेरी गोद ली हुई बेटी ही है। वह हमारी शादी के पहले से ही मेरी पत्नी के साथ रहा करती थी। मेरी नौकरी वहाँ से लगभग तीन सौ कि.मी. दूर गाँव में थी। सो शादी के बाद मैं महीने में एक-आध बार ही अपनी पत्नी से मिलने जा पाता। मैं जैसे ही दरवाज़े पर पहुंचता वह बच्ची दौड़कर मुझसे लिपट जाती। मैं हमेशा ही उसके लिए कुछ न कुछ उपहार लेकर पहुँचा करता। वह बडे़ ही उत्साह से उपहार खोलती और मेरे गालों और माथे पर लगातार चुंबन जड़ती। मैंने भी उसे पूरी तरह अपनी बेटी स्वीकार कर लिया था। इस तरह हमें एक बेटी मिल गयी थी। कुछ ही महानों बाद मेरी बदली मेरे अपने शहर में हो गई। मेरी पत्नी शहर से गाँव आने-जाने की स्थिति में नहीं थी, सो मैं अपनी पत्नी के गाँव में ही रहने लगा और मैं ही गाँव से शहर अपनी मोटर-सायकल से रोज आना-जाना करने लगा। मैं जैसे ही गाँव में दाखि़ल होता, मेरी मोटरसायकल की आवाज वह बच्ची पहचान जाती। हम एक फाॅर्म-हाउस जैसे घर में किराये से रहते थे, जिसके चारों तरफ़ खेत थ,े और उसमें एक बडा़ सा लोहे का दरवाज़ा था, जो कि टेªक्टर आदि के आने-जाने लिए बनाया गया था। वह मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही दरवाज़ा खोजने के लिए गेट पर आ जाती थी और मेरे पहंुचने से पहले ही गेट खोलकर तैयार रहती थी। मेरे अन्दर घुसते ही वह फिर से गेट बंद कर देती और हमेशा की तरह मुझसे लिपट जाती। समय गुजरता जा रहा था। इस बीच मेरा एक बेटा हो गया। अब हम बेटा-बेटी युक्त आदर्श परिवार की श्रेणी में आ गये थे। मतलब हम दो हमारे दो वाली श्रेणी में।
बेटे के आने से घर में काम बढ़ गया था, सो अब उस बच्ची का काम भी बढ़ गया था। हमारा समय खुशी-खुशी बीत रहा था। दिन, महीने बरस के रूप में बदलते जा रहे थे। उस बच्ची का मुझसे लिपटना जारी था। एक दिन मेरे हाॅर्न बजाने के बावजूद मेरी बेटी घर से नहीं निकली। मैंने खुद से गेट खोला और अन्दर पहुँचा। मैंने अपनी पत्नी से पूछा तो उसने कहा कि यहीं पर कहीं होगी। इतने दिनों की लिपटन का मैं आदी सा हो गया था, सो मुझे बेचैनी होने लगी, और मैं देखकर आता हूँ कहकर बाहर निकला। मैंने देखा कि वह बच्ची एक फैंसी स्टोर्स में खडी़ हुई है, और दुकानदार से श्रृंगार सामग्रियों की कीमतें पूछ रही है। वह इतनी मगन थी कि उसे श्रृंगार की वस्तुओं के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। मैं वापस आ गया। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि हमने उसकी बुनियादी ज़रूरतांे का तो ध्यान रखा है, पर वह लड़की है। श्रृंगार करने की लालस तो उसमें भी होती स्वाभाविक रूप से होगी। तुम उसे श्रृंगार का पूरा सैट लेकर दे देना। मेरी पत्नी बेहद स्ट्रीक्ट थी। उसने कहा नहीं अभी उसे श्रृंगार की कोई जरूरत नहीं है। अभी उसे सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना है। ज़रूरत पड़ने पर मैं खुद ही उसके लिए ये चीजें लेकर दे दूंगी। अगले दिन भी वह बच्ची मुझंे फैंसी स्टोर्स पर नज़र आई उसने मेरी गाडी़ की आवाज़ सुनी ही नहीं। दो-तीन दिनों तक ऐसा ही हुआ। पाँचवे दिन वह दरवाजा खोलने तो आई पर  वह बेहद उदास थी वह मुझसे लिपटी पर उसमें पहले जैसा जोश और उत्साह नहीं था। मैंने ध्यान दिया कि आज वह एकदम अलग लग रही है। उसने आँखों में काजल लगाया हुआ था और बालों में फुंदरा भी लगा रखा था। साथ ही उसने बेहूदा तरीके से लिपस्टिक भी लगा रखा था। एकदम फूहड़ता भरा मेकअप था उसका। मैंने अपनी पत्नी से उसकी उदासी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि आजकल उसका ध्यान न तो काम-धाम में लगता है और न ही पढा़ई-लिखाई में। जब देखो तब फैंसी स्टोर्स में जाकर घुसी रहती है। मैने आज उसे खूब फटकार लगाई है इसलिए वह उदास दिख रही है। उसकी उदासी मुझे बेहद खटक रही थी। मैंने उससे कहा चल आज हम मोटर-सायकल में कहीं घूम कर आते ह,ैं कहकर मैंने उसे पीछे बिठाया और हम घूमने निकल गये। मैंने उससे पूछा कि उसने यह सब मेकअप का सामान कितने रूपयों में खरीदा इस पर उसने बताया कि मेरी इच्छा को देखकर उस उस दुकानदार ने मुझे ऐसे ही दे दिया। उसकी यह बात मुझे बेहद चिन्तित कर गई। मैंने उसे कैसे समझाता कि- बेटा लड़कियों के लिए कदम-कदम पर उपहार के मायने बदलते जाते हंै। मैंने उससे कहा कि अब उससे कोई भी चीज़ फ्री में नहीं लेना। इस पर उसने तर्क किया, पर वो भी तो आपके जितने ही बडे़ हंै। आप भी तो मुझे चीजें फ्री में देते है। वाकई में वह दुकानदार तकरीबन मेरी ही उम्र का था। वह शादी शुदा था, और उसका एक बेटा भी था। हम वापस लौट आये दो-तीन दिन तक सबकुछ सामान्य रहा। फिर एक दिन आॅफ़िस से आकर मैंने पाया कि वह गेट के पास खड़ी सुबक रही है। मंैने उससे पुचकारते हुए रोने का कारण पूछा इस पर उसका रोना और बढ़ गया। मैंने अपनी श्रीमती से पूछा तो उसने बताया कि आज उस दुकानदार ने इसे फ्री में बिंदी और कान के झुमके दिये हैं। और उसे पहन कर यह इतरा रही थी, काम में जरा भी ध्यान नहीं था। गैस पर दूध चढ़ाकर भूल गई थी। सारा दूध जल गया। मैंने उसे डांटा, तब से रो रही है। उस दिन के बाद से उसने हमारे घर आना बंद कर दिया। मैंने तो उसे अपनी बेटी माना हुआ था, सो मुझे उसकी बेहद चिन्ता होने लगी। मैं चाह रहा था कि मैं उसे पूरा एक वैनटी बाॅक्स खरीदकर दे दूं, पर मिसेज को विश्वास में लिए बिना यह संभव नही था, और मेरी श्रीमती को यह कतई पसंद नहीं था कि वह पढा़ई-लिखाई की उम्र में साज श्रृंगार करके गाँव भर घूमे और गाँव के लड़को को अनावश्यक रूप से आकर्षित करे।
एक छुट्टी वाले दिन मैं उसी फैंसी स्टोर्स के पास ही स्थित एक किराने की दुकान के बाहर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। तभी मेरा ध्यान गया सामने की ओर मैंने देखा मेरी वो बेटी कुछ अलग ही तरीके से चलती हुई फैंसी स्टोर्स पहुँच रही है। मैंने अपना ध्यान अखबार से हटाकर पूरी तरह उसी पर केन्द्रित कर लिया। मैंने देखा कि वह में झुककर कांच के बक्से में रखे आभूषणों को देख रही है। और उंगली रख-रखकर आभूषणों की कीमतें पूछ रही है और उस दुकानदार का पूरा ध्यान उसकी उभरी हुई छाती की तरफ़ है। यह देखकर मेरे तन-बदन में आग़ लग गई और मैंने चिल्लाकर उसे अपने पास बुलाया और फिर फटकारते हुए कहा-चल भाग यहाँ से अपने घर जा। इस पर वह रूआँसी होकर कहने लगी पहले तो सिर्फ दीदी ही डाँटती थी, अब आप भी डाँटने लगे हैं, कहती हुई वह चली गई। मैंने उस दुकानदार के कमीनेपन को ताड़ लिया था, पर मैं सिर्फ़ अपनी बेटी को समझाने के सिवाय कर ही क्या सकता था। खै़र वह हमारे घर लगभग पन्द्रह दिनों तक नही आई। फिर एक दिन वह सर झुकाई हुई आई और अपनी दीदी से बिना कुछ कहे घर के काम में जुट गई। मैं उस दिन घर पर ही था। हमने उससे कुछ बात नहीं की। शाम को उसने कहा जीजाजी मुझे अपनी एक सहेली से नोट्स लेने हैं, तो नज़दीक के गाँव जाना पडे़गा। मैंने उसे गाडी़ पर बिठाया और हम उस गाँव की तरफ चल पडे़। अचानक उसने मुझसे कहा जीजाजी काई नोट्स लेने नही जाना है। मै तो आपको एक बात बताना चाहती थी कि वह फैंसी स्टोर्स वाला बहुत गंदा आदमी है। एक दिन मौका देखकर वह मेरी छाती की तरफ हाथ बढा़ रहा था। दीदी से डर लगता है, इसलिए मैं आपको बता रही हूँ।
     मुझे जिस बात का डर था, वही बात होने वाली थी। मुझे उस दुकानदार पर बेहद गुस्सा आ रहा था, पर मैं कर भी क्या सकता था। हम वापस आ गये। गाडी़ से वह जैसे ही उतरी, मेरा ध्यान उसकी तरफ चला गया। मुझे अब अहसास होने लगा कि मेरी बेटी जवान हो चली है। अगले दिन से उसका मुझ से फिर से पहले की तरह लिपटना शुरू हो गया, पर अब मुझे उसके स्तनों की चुभन स्पष्ट महसूस होने लगी थी। अब मैं सोचने लगा-हे भगवान क्या मैं भी शाहजहाँ की तरह ही अपनी बेटी के प्रति आसक्त हो रहा हूँ। अब उसके लिपटने से रोज ही आसक्ति सी महसूस होने लगी। मैं इन परिस्थितियों में मैं खुद को बेहद असहज महसूस करने लगा था। यह तो अच्छा हुआ कि कुछ दिनो बाद मेरी पत्नी का ट्राँसफर शहर में ही हो गया और हम उस गाँव को छोड़कर शहर में रहने लगे। उसके मां-बाप ने उसे हमारे साथ शहर भेजने से मना कर दिया था। फिर भी चूंकि हमने उसे अपनी बेटी माना था, सो उसकी पढाई-लिखाई से संबंधित सारे खर्च अब भी हम ही उठाते थे। इस बीच छुट्टियों में वह जब भी हमारे घर आती, मैं आसक्त होने के अपराधबोध से भर जाता। मैं अपने प्रेम वाले शाहजहाँ के स्वरूप में जीना चाहता था, पर अनजाने में ही मैं आसक्त शाहजहाँ हो जाता था।
                                 
5 बेड़ियाँ
             परमदीप की शिक्षा-दीक्षा एक ऐसे स्कूल में हुई थी, जो कथित तौर पर लोगों को संस्कारी बनाता था। वह राष्ट्रवादी होने का ढिढो़ंरा पीटने वाला एक स्कूल था। वास्तव में वह अंध-राष्ट्रवाद सीखाता था। कुल मिलाकर वह हिटलर के नाजी सैनिक तैयार करने वाला स्कूल था और अपने धर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करता था। वहाँ की बुनियाद ही अपने धर्म से प्रेम व विधार्थियों से घृणा थी। यहाँ के छात्र सिर्फ़ अनुशासन के नाम पर अपने आपको चरित्रवान होने का ढ़िंढा़ेरा पीटते थे। अब भला इन्हें कोई बताये कि अनुशासन तो बड़े-बड़े आतंकवादी संगठनों मंे भी पाया जाता हैं। परमदीप वास्तव में एक चरित्रवान लड़का था। स्कूली पढ़ाई के दौरान वह शालानायक हुआ करता था और सभी छात्र-छात्राएँ उसे भैय्या कहकर ही संबोधित किया करते थे जिससे उसके अंदर भैय्या होने का अहसास कूट-कूटकर भर गया था। स्कूली जीवन तक तो फिर भी ठीक था, पर यह अहसास उसे काॅलेज़ पहुँचने पर और तो और उसकी शादी तक बरकरार रहा। अब आप जैसे संस्कारी लोग सोच रहे होंगें कि भैय्यापन होने में आखिर बुराई ही क्या है। यह तो अच्छी बात है। पर भाई साहब सेक्स एक अतिआवश्यक क्रिया है। और सेक्स करने की इच्छा को ज्यादह से ज्यादह कुछ ही दिनांे तक डायवर्ट किया जा सकता है,लेकिन परमदीप इस इच्छा को डायवर्ट करते-करते नपुंसक होने की हद तक पहुँच चुका था। जिस पर भी उसे अपने संस्कारी होने पर बडा़ गुमान था। चँूकि उसे यह बताया गया था कि विवाह भी एक किस्म का संस्कार ही है सो उसने संस्कारी होने के नाते से विवाह कर लिया था। उसने अपने बेडरूम में भी पंचाग कलेण्डर लगा रखा था। और मुहूर्त देखकर ही सेक्स करने को उद्यत होता था।
चूँकि डायवर्ट करते-करते उसे सेक्स में अरूचि सी हो गई थी, सो उसने अपनी सुविधानुसार उस कैलण्डर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जिस दिन उसका मूड नहीं होता, वह शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की दुहाई देते हुए मना कर देता। उसकी पत्नी दिल्ली महानगर की थी और अंग्रेज़ी माध्यम के इसाई स्कूलों में उसकी शिक्षा-दीक्षा हुई थी। उसे इन तमाम ढ़कोसलों से चिढ़ सी थी। जब कभी वह पहल करती, परमदीप उस पर भड़क जाता और कहता- तुझे बडी़ खुजली है, साले इसाई स्कूलों में यही सब तो सीखाते हैं। वास्तव में परमदीप अपनी कम़जोरी को इस तरह से अपनी पत्नी पर हावी होकर ढाकने की कोशिश करता था। उसकी पत्नी यदि कभी अपनी बहन या किसी सहेली के सुखमय सेक्स जीवन का उदाहरण देती तो वह कह देता जा उन्ही के पतियों के साथ सो जा। उसकी पत्नी अपमान का कड़वा घूंट पीकर रह जाती थी। उसकी पत्नी उसके साथ तीन-चार माह ही रह पाई। उसे यह बात समझ में आ गई कि बेड़ियों मंे जकडे़ इस नपुंसक पुरूष के साथ जीवन बर्बाद नहीं्र किया जा सकता है, सो वह अपने मायके चली गई और वहाँ से उसने तलाक का नोटिस भिजवा दिया था। तिलमिलाया हुआ परमदीप अब एकसूत्रीय कार्यक्रम बना चुका था कि जाति-समाज में स्वयं को चरित्रवान और अपनी पत्नी को चरित्रहीन प्रचारित करने का। उधर उसकी पत्नी ने भी नहले पर दहला मारते हुए उसे जात-समाज में नपुंसक के तौर पर प्रचारित करना शुरू कर दिया था। कुल मिलाकर उनके छोटे से समाज में उसके नपंुसक होने की बात फैल गई थी। तलाक लेने के बाद उसकी पत्नी ने दूसरा ब्याह कर लिया था। अब परमदीप औरतों से बेहद नफ़रत करने लगा।
जीवन चलता रहा इस बीच उसके आॅफ़िस में दिल्ली से वंदना नाम की लड़की का आगमन हुआ। उसकी शिक्षा-दिक्षा परमदीप के स्कूल जैसे कट्टर स्कूल में तो नहीं हुई थी, पर संस्कारी बनाने के नाम से जाने जानी वाली एक दूसरी स्कूल में हुई थी। उन दोनों मेें अच्छी दोस्ती हो गई। वंदना एक बेहद संपन्न परिवार की लड़की थी। परमदीप और वो दोनो जब भी किसी रेस्ट्रोरेंट में या फिल्म देखने जाते तो वह ज़िद करके खुद ही पेमेण्ट करती। उन दोनो के बीच सब कुछ था सेक्स को छोड़कर। एक दिन वे दोनो किसी रेस्टोरेन्ट से खाना खाकर निकले। परमदीप ने उसे उसके कमरे तक छोड़ दिया और अपने घर चला आया। वह सोचने लगा कि इतनी रात को उसने वंदना को सुरक्षित घर तक छोड़ने पर वह जरूर उसे धन्यवाद देगी और यह कहेगी कि आप वाकई में एक संस्कारवान व्यक्ति हो। पर वंदना का फोन ना आने पर उसने खुद ही फोन लगाया वंदना की तरफ से साधारण औपचारिक बातें ही होती रही आखिरकार पहल करते हुए परमदीप ने खुद ही कहना शुरू कर दिया देखिये वंदना इतनी रात को मैने आपको सही-सलामत आपके घर तक पहुँचा दिया। आज के जमाने में ऐसे लाॅयबल ब्याॅयफ्रेन्ड्स मिलते ही कहाँ है। इस पर वंदना ने उत्तर दिया तुम ब्याॅयफ्रेन्ड्स की श्रेणी में हो ही कहाँ। तुम तो भैय्या की श्रेणी में ही हो तुम तो पूरे भाई ही हो यार परमदीप मुझे इस उम्र में भाईयों की नहीं, ब्याॅयफ्रेन्ड्स की जरूरत है। तुम तो ब्यायफ्रेन्ड्स गले में संस्कारों की ढ़फली नही बजाया करते हैं। समझे। परमदीप तुम तो पूरे भैय्या हो, वंदना का यह उत्तर एकदम प्रत्याशित था। परमदीप ने कभी कल्पना भी नही की थी कि वास्तव में संस्कार जैसा शब्द गाली भी हो सकता है। वह अपना सर पकड़कर धम्म से नीचे बैठ गया । उसे अचानकर लगने लगा कि वह एक कैदी है, जो संस्कारो की बेड़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ है। और वह इन बेड़ियों से चाहकर भी छुटकारा नहीं पा सकता हैं तुम ब्वायफे्रन्ड कतई नही बन सकते क्योंकि ब्याॅयफ्रेन्ड््स होने की पहली शर्त है एक दूसरे की आवश्यकताओं का सम्मान।
                                   6 प्रेम-पत्र
          मेरी प्यारी बेटी, दीपिका,
         तुमने मुझसे कई बार कहा था कि पापा आप मुझे लव लेटर लिखना सीखा दीजिए। आप तो एक राईटर हैं। भाषा पर तो आपकी जबरदस्त पकड़ है। आपके लिये तो लव लेटर लिखना बाएं हाथ का खेल है। तुम्हंे तो याद होगा कि हम दोनों के बीच दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं। मैं जब तुमसे पूछा करता था। कि तुम लव लेटर लिखना सीखने के बाद किसे लिखा करोगी, तो तुमने बडे़ ही खिलंदड़पन के साथ कहती थी कि पापा मेरे सबसे बडे़ प्रेमी तो आप ही हैं। मैं आपसे ही लव लेटर लिखने की शुरूआत करूंगी, और खिलखिला पड़ती थी। मैंने तुमसे कहा था- बेटी अपने ब्वाॅयफ्रेण्ड्स को लिखो तो कुछ सार्थक होगा, इस पर तुम शरमा सी गई थी। दीपिका, जब तुम कहती थीं कि मेरे लिये इस तरह का लव लेटर लिखना या किसी को लिखना सिखाना बाँये हाथ का खेल है, तो मुझे भी लगता था कि वाकई में यह तो मेरे लिये आसां है। पर जब लिखने बैठा तब समझ आया प्रेम एक अथाह समुद्र की भांति होता है। इसमें हम जितना गहरे उतरते जायेंगे, उतने ही हमें नये-नये दुर्लभ रत्न मिलेंगे। हम भ्रमित हो जायेंगे कि हम अपने अंक में क्या समेटे और क्या छोड़ दें। यह हो सकता है कि हम मूंगे-मोतियों की चाह में समुद्र में उतरंे और हमारे हाथ सिर्फ़ कौड़ियाँ ही लगंे। तमाम तरह के समुद्री ख़तरों को उठाते हुए हम उसकी गहराइयाँ नापें और कौड़ियाँ उठाकर ले आयें तो यह हमारी नादानी होगी। मैंने तुमसे बार-बार कहा है कि बेटी सपनों के मर जाने के बारे में सोचकर सपने देखना नहीं छोड़ते। तुम्हारे पास उड़ने को खुला आसमान है, सिर्फ तुम्हंे अपने पास पंख होने की जानकारी नहीं है।
      बेटा प्रेम और आकर्षण के बीच एक झीनी सी रेखा होती है, जो कई-कई बार तो हमें नज़र भी नहीं आती है, और साधारण से दैहिक आकर्षण को हम प्रेम समझ बैठने की भूल कर बैठते हैं। बेटा प्रेम सोशल मीडिया में चलने वाला कोई जोक नहीं है, जिसे हम पढ़ते साथ कहीं और फारवर्ड करने बैठ जायंे। प्रेम एक जिम्मेदारी का नाम है। यदि मैं तुमसे पे्रम करता हूँ तो यकीं मानों मैं तुम्हारे प्रति पूरी तरह जिम्मेदारी निभाने के लिए कटिबध्द और प्रतिबध्द हूँ। और मैं तुमसे भी यही अपेक्षा करता हूँ कि तुम चाहे जिससे भी प्रेम करो, जिम्मेदारी समझते हुए शुचिता बनाये रखकर करो। कई बार प्रेम अपराधबोध का कारण बन जाता है। बेटा अपराधबोध हमारे व्यक्तित्व को खोखला कर देता है, इसलिए इस बोध से यथा-संभव बचने की कोशिश करो।
       दरअसल बेटा हमने अपनी चारों तरफ़ संस्कारों का जाल सा बुन रखा है और हम उसी में फँसकर छटपटाते रहते हैं। वास्तव में प्रकृति में जो भी घटता है, वह सारा कुछ प्राकृतिक ही होता है, इसलिये घटित घटनाओं को लेकर अपराध बोध न हो। मुझे दरअसल तुम्हारी चिन्ता इसलिए भी रही है कि तुम इंटरनेट युग की लड़की हो, जहाँ एक क्लिक में दुनिया-जहाँ की चीज़ें हमारे सामने आ जाती हंै। बेटा जिस तरह प्रेम ओर आकर्षण में बारीक सा विभेद हैं, बस उसी तरह सूचना और ज्ञान में अंतर है। हमें डाटा कलेक्शन सेण्टर नहीं बनना है, बल्कि हमें ज्ञानी बनाना है। हमें सूचनाओं को ज्ञान में ढालना आना चाहिये। बेटा तुम दूसरी कक्षा में पढ़ती थी,जब हमने तुम्हे गोद लिया था। गुजरात भूंकप में एक मासूम सी बच्ची। आज तुम पूरी तरह समझदार हो गई हो। तुम्हें याद पड़ता होगा या तुमने महसूस किया होगा कि तुमसे बिछड़ने के पहले तक जब हम जब भी सड़क क्रास करते थे तो मैं तुम्हारा हाथ थाम लेता था। मेरे लिये तो तुम आज भी दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली सात-आठ साल की बच्ची हो। तुम चाहे जितनी भी बडी़ हो जाओ, मेरे लिए तुम बच्ची ही रहोगी। तुम मेरी आत्मा तक गहरे उतरी हुई हो। तुम्हे याद होगा तुम्हारी मम्मी के जाने के बाद मैं आध्यात्मिक होकर वैरागी की तरह जीवन जीने लगा था। फिर मैंने वैराग्य से बचने के लिए आध्यात्म छोड़ दिया, क्योंकि आध्यात्म मुझे स्वार्थी बनाने लगा था। मैं तुमसे ही दूर होने लगा था। मैं भला ऐसे आध्यात्म से वास्ता क्यों रखूं जो मुझे उससे दूर रखे जिससे मैं बेहद प्यार करता हूं। बेटा हर बाप के लिए उसकी बेटी खूबसूरत होती है, लेकिन मैं तो तुम्हे दुनियाँ की सबसे ख़ूबसूरत रचना मानता हूँ। और ईश्वर को इस बात के लिए रोज धन्यवाद भी देता हूँ, कि उसने मुझे तुम्हें पालने का सौभाग्य प्रदान किया। जब तुम मेरे सामने होती तो य़कीन मानांे मुझे लगता है कि कोई महिला देवदूत बनकर परी की शक्ल में मेरे आस-पास है। लेकिन जब तुम सामने नहीं होती हो तो मैं आशंकित हो जाता हूं। शायद मैं तुम पर एकाधिकार चाहता हूं। यहां पर तुम मुझे स्वार्थी कह सकती हो। यकीन मानांे मैंने हर तरीके से तुम्हें खुश रखने की कोशिश की है, सीमाएं लांघकर, मर्यादाएं लांघकर भी। तुम मेरे जीवन का उद्देश्य रही हो। तुम मेरे जीवन में रेगिस्तान में पानी की तरह हो। मैंने तुम्हारे साथ का हर लम्हा अपनी यादों में संजोकर रखा है। बेटा तुमसे बात करके मेरा सारा तनाव दूर हो जाता है। तुम मेरेे लिए एक औषधि हो। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं। लाईफ में तुम कुछ बनो या न बनो, एक अच्छी इंसान तो तुम बचपन से हो ही, इसलिये तो मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं। मैंने सच में एक बेटी की कामना की और तुम आदर्श रूप में माजूद हो। तुम्हारी तमाम नादानियों के बावजूद तुम मेरी आदर्श बेटी थी, और रहोगी। मैं हमेशा से चाहता रहा कि तुम मुझे दोस्त ही समझो और अपने तमाम निर्णयों में मुझे शामिल करती रहो, चाहे वे निर्णय सामाजिक रूप से जायज हो, या न हों। इसमें बाध्यता वाली बात नहीं थी, बल्कि तुम्हारी मर्जी थी। तुम्हारा हर निर्णय मेरे सर-आंखों पर है। मैं एक तरह से अपनी बेटी का अंध समर्थक हूं।
      तुमने संजीव के साथ ब्याह कर लिया और मुझे बताया तक नहीं। यह कैसा दोस्ताना रहा हमारे बीच। तुमने शायद सोचा होगा कि मैं संजीव से तुम्हारी शादी करने के लिए इनकार कर दूँगा। अगर तुम ऐसा सोचती हो तो इसका मतलब यह है कि तुमने अपने बाप को जाना ही नहीं है। मेरी बेटी की पसंद ही मेरी पसंद है। तुमने कम से कम एक बार कहा तो होता। तुम्हारे इस कदम ने मुझे आज अहसास कराया है कि तुम अब बड़ी हो गई हो। तुम्हें मेरी ऊँगलियाँ थामने की ज़रूरत नहीं रही। लेकिन बेटा मैं यह बार-बार भूल जाता हूँ कि तुम अब बडी़ हो गई हो, और मेरे साथ नहीं हो। अब जबकि तुमने ब्याह कर लिया है, तो मैं चाहूंगा कि अपने दाम्पत्य जीवन को हिमालय की उंचाईयां दो। मैं एक बहादूर बच्ची का बाप हूं। यह मेरे लिये गर्व की बात हैं। मैंने तुम्हारे कमरे को खुला ही रख छोड़ा है। पता नही क्यों तुम्हारा कमरा मुझे तुम्हारे होने का अहसास कराता है। साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि कभी तो तुम अपने बाप से मिलने आओगी।
     बेटा जब तक तुम मेरे साथ थी, मैं अपने-आपको बेहद एनर्जेटिक महसूस किया करता था और तुम्हारे जाने के बाद अचानक मैं अपने आपको बूढ़ा सा महसूस करने लगा हूँ। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे बीच जो भी सम्बन्ध रहे हैं, वे सिर्फ़ और सिर्फ़ औपचारिक तो नहीं रहे हंै। दीपिका मुझे पता ही नही चला कि तुम अपने घर को एक पिंजरा समझती रहीं। संजीव से तुम्हारा कोर्ट मैरिज़ कर लेना इस बात को पुष्ट करता है कि तुम्हे घर में बंधन सा महसूस होता था। मुझे यह बिल्कुल भी समझ में नही आ रहा है कि मेरी परवरिश में आखिर चूक कहाँ रह गई । शायद मुझे तुम्हारे युवा होने का अहसास ही नहीं हो पाया। मैं समझ ही नहीं पाया कि युवाओं की अपनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ या तमन्नाएँ हो सकती हैं। तुम इस घर रूपी पिंजरे से बाहर निकलकर खुले आसमान में उड़ना चाहती थी। तुमने मुझे इस बात का जरा भी अहसास कराया होता तो मैं अपने हाथों से तुम्हें पंख फैलाकर उड़ने के लिए छोड़ देता। मैं आज तुमसे माफी माँगना चाहता हूँ। तुम्हें ना समझ पाने के लिए । मैं माफी माँगना चाहता हूँ एक लड़की का बाप होने के लिए। मैं माफी़ चाहता हूँ तुम्हारी तमन्नाओं का कत्ल करने के लिए। मैं माफ़ी चाहता हूं अपने हर उस अपराध के लिए जो मेरे अनुसार परवरिश के लिए आवश्यक माने जाते हैं। मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। बेटा तुम इस घर के रोम-रोम में महसूस की जा सकती हो। मुझे यह स्वीकार करने में जरा भी संकोच नहीं है कि मैं तुम्हे अपनी बेटी न मानकर, अपनी प्रेमिका मानता था। एक ऐसी प्रेमिका जो मुझसे ही सीखकर मुझे ही लव लेटर लिखे। मुझे लगता है मेरे द्वारा लिखे गये इस पत्र को लोग कभी नही मानेंगे कि ये किसी पिता द्वारा अपनी पुत्री को लिखे गये हैं।
  तुम्हंे अपने कृत्य पर किसी तरह का अपराधबोध पालने की जरूरत नहीं है। तुमने कोई अपराध नहीं किया है। तुम यदि सही हो तो सही ही हो और यदि तुम गलत भी हो, तो भी मेरे लिए सही ही हो। मैंने फेसबुक की कव्हर पिक्चर में तुम्हारी फोटो डाल रखी है। साथ ही व्हाट्सअप की डीपी मंे भी वही फोटो है, जिसमें तुम्हारी मोनालिसा की तरह रहस्यमयी मुस्कान है। साथ ही है एक कविता। मेरी अपनी कविता। मेरी बेटी नाम की इस कविता में मैने लिखा है-नदी है मेरी बेटी/उद्गम पर पतली/पहाडो़ं पर दहाड़ती/मैदानों पर मंथर गति से बहती/झरनों पर वेगवती/नदी है मेरी बेटी।
    मैं तुमसे सिर्फ़ और सिर्फ़ इतनी ही उम्मीद करता हूँ कि तुम एक बार आ जाओ फिर हम दोनो एक दूसरे से लिपटकर फूट-फूट कर रोयेंगें। बस यूँ ही रोयेंगे अकारण।
                                तुम्हारे इंतजार में
                                            तुम्हारा पापा
                         


 7 राधाबाई
          अपनी बेटी की शादी की तैयारियाँ करते वक़्त अचानक मेरी नज़र राधा पापड़ के पैकेट पर पड़ी, और मुझे अचानक ही राधाबाई की याद आ गई। राधाबाई हमारे घर के पीछे वाली गली में रहने वाली एक बेहद दुखियारी विधवा महिला थी। उसकी आँखंे हमेशा ही डबडबाई हुई होतीं। माँ से बाते करते हुए वह कई बार अपने आँसू पोछा करती थी। हम उसके दुःख से पूरी तरह अनजान थे। वह अभावांे का दौर था। उस समय हम सभी भाई-बहनों के कपडे़ माँ घर में ही सीलती थी, और बची हुई चिन्दियों को संभाल कर रखती थी। इन चिन्दियों से वो पैर पोछने का फुट-मैट, बैठने के लिए आसनी आदि बनवाया करती थी। ख़राब साड़ी और फटे-पुराने कपड़ों से कथरियां (गुदड़ियां) बनवाया करती थी। ये गुदड़ियां ही हमें भयंकर ठण्ड से बचाती थीं। फटे-पुराने कपड़ों और चिन्दियों को उपयोगी वस्तु बनाने में राधाबाई को महारत हासिल थी। माँ उन्हें पूरा का पूरा गट्ठर उठाकर दे देती थी। इन चिन्दियों से जब उपयोगी चीजें़ बनकर आती थीं, तो हमे ऐसा लगता था कि घर में नई-नई चीज़ें आ गई हैं। उस समय हमें जो खुशी मिलती थी, आज वह माॅल से हज़ारों रूपये की शाॅपिंग करने के बाद भी नहीं मिलती है।
 अक्षय तृतीया (अक्ति) के दिन हम सभी-भाई बहन गुड्डे-गुडियों की शादी किया करते थे। बाज़ार में मिलने वाले गुड्डे-गुड़ियों की कीमत पचास पैसे मात्र होने के बावज़ूद उसे खरीदने की हमारी हैसियत नहीं थी। ख़ैर अक्षय तृतीया के दिन राधाबाई सुबह से ही हमारे घर पर आ जाती थी। उसे देखकर हम सभी भाई-बहन बेहद खुश हो जाते थे। वह हमारे साथ-साथ मुहल्ले के दूसरे ग़रीब बच्चों के लिए भी गुड्डे-गुड़िया बनाने के लिये चिन्दियाँ ले जाया करती थीं। शाम पाँच बजते-बजते वो गुड्डे-गुड़ियांे को दूल्हा-दुल्हन के रूप में सजाकर ले आती थी। अपने उत्साह के अतिरेक में हम चार-पाँच बार अपने गुड्डे-गुड़ियांे के बनने की प्रक्रिया को देखने के लिये राधाबाई के घर हो आते थे। हमें राधाबाई किसी देवदूत से कम नहीं लगती थी।
         इस बीच हम बांस की खपच्चियों से विवाह का मण्डप बनाकर तैयार रखते थे। आम की पत्तियों से मण्डप की छत बनाया करते थे। हम एक लोटे में पानी रखकर उसके चारों ओर आम की पत्तियाँ सजाते, और उसके बीच में दिया जलाया करते थे। गुड्डे-गुड़ियों की शादी को लेकर हमारे मन में बडा़ उत्साह होता था। हम दिन-भर आस-पास के घरों में टिकावन टिकने का न्योता दे आते थे। अभावों के उस दौर में लोग टिकावन के रूप में पांच-दस पैसे के सिक्के ही डालते, पर हमें खज़ाना मिलने का अहसास सा होता था।
      राधाबाई की सबसे बडी़ विशेषता यह थी कि वह ग़रीब होने के बावजूद पैसों के लिये यह काम नहीं करती थी। वह कहती कि उसे गुड्डे-गुड़िया बनाना बहुत अच्छा लगता है, इसलिए वह बनाती है। तो भी लोग उसे बदले में चावल, आटा या शक्कर आदि चीज़ें दे दिया करते थे। एक तरह से वह दूसरों पर आश्रित ही थी। मेरी बहन की कुछ सहेलियां उसके घर के पास ही रहा करती थी। वे बताती थीं कि राधाबाई का लड़का एकदम नालायक़ है, और अपनी माँ पर हाथ उठाता है। इसी कारण वह दुःखी रहती है। राधाबाई का लड़का हमसे चार-पाँच साल बडा़ था, और चैथी कक्षा तक ही पढ़ पाया था। उसकी संगत बेहद ख़राब लोगों के साथ थी। यह बात पता चलने पर कि वह अपनी देवी जैसी माँ पर हाथ उठाता है, हमें उससे बेहद नफ़रत सी हो गई थी। हम उससे बचकर ही चलते थे। रफ़्ता-रफ़्ता समय बीत रहा था। एक दिन राधाबाई हमारे घर पर आई और हमारी माँ के सामने फूट-फूटकर रोने लगी। अब तक हमारी समझ विकसित हो चुकी थी। वह रोते-राते माँ को बता रही थी कि उसके बेटे ने एक नीच जाति की लड़की से मंदिर में शादी कर ली है, और उसे घर में ले आया है। राधाबाई हमारी माँ से राय लेना चाह रही थी कि अब क्या किया जाये। माँ ने उसे समझाया कि उन्होेंने शादी कर ही ली है, और दोनों ही बालिग़ हैं तो तुम्हंे तो उसे अपनी बहू स्वीकारना ही होगा। ख़ैर, उसकी बहू बेहद ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ बडी़ प्रतिभा सम्पन्न भी थी। उसमें नेतृत्व क्षमता भी गज़ब की थी। वह एक मिलनसार महिला थी और लोगांे से तुरंत ही घुल-मिल जाती थी। वह अक्सर अपनी सास के साथ ही हमारे घर पर आती और हमारी बड़ी बहनों से कुछ-कुछ जानकारियाँ हासिल करती रहती। उसने नये ज़नरेशन की दुखती रग को पकड़ लिया था कि यह जनरेशन श्रमसाध्य कामों से बचना चाहता है। जल्द ही उसने एक महिला समूह बना लिया और पापड़, बड़ी और अचार के बिज़नेस में कूद पड़ी। कुछ ही सालों में उसके बनाये पापड,़ बडी़ और अचार एक ब्राण्ड के रूप में जाना जाने लगा। ब्राण्ड का नाम भी उसने अपनी सास के नाम से राधा ही रखा था। उसकी बहू राधाबाई से बेहद प्रेम करती थी। राधाबाई के दिन अब पूरी तरह से फिर चुके थे। उसका बेटा भी आवारागर्दी छोड़कर अब अपनी पत्नी के कामों में हाथ बंटाने लगा था। राधाबाई इतनी सुयोग्य बहू को पाकर बेहद खुश थी। आमतौर पर दूल्हे-दुल्हन को बड़े आशीर्वाद देते हैं, पर हमें लगता था कि अक्षय तृतीया पर चिन्दियों से बने गुड्डे-गुड़ियों ने राधाबाई को आशीर्वाद दे दिया था कि उसे सर्वगुण संपन्न लक्ष्मी जैसी बहू मिले।
                              8 गिध्द
         उस दिन डिस्कवरी चैनल में गिध्दांे के झुण्ड को एक लाश को सफाचट करते हुए देखकर मुझे बचपन के दिन याद आ गये। हमारा शहर उन दिनों कस्बे जैसा ही हुआ करता था और हमारे मुहल्ले के बाद लोगों के खेत शुरू हो जाते थे। हम आसमान में मण्डराते हुए गिध्दों को स्पष्ट देखा करते थे। हमारे मोहल्लें में कुछ दूध व्यापारी के अलावा किसान भी रहते थे जो कि अपनी मरी हुई गायों को खेतों में फेंक आते थे और गिध्द उन्हे चन्द मिनटों में ही साफ़ कर दिया करते थे। उस समय गिध्दों की इतनी संख्या होती थी कि हम बच्चांे का इनके आस-पास फटकने से भी डर लगता था। हमने कई कहारियां सुन रखी थी कि ये गिध्द मुर्दे जानवर खाने के अलावा कई ज़िन्दा बच्चों को भी उठाकर ले जाते है। गिध्दो की संख्या में हमें पता ही चल पाता था कि लाश किस जानवर की है। कभी-कभी हम यह सोचकर घबरा जाते कि कहीं इन गिध्दो ने जिन्दा आदमी पर तो हमला नहीं बोल दिया हैं। खैर हमें उन्हे दूर से देखना अच्छा लगता था। कुछ गिध्द तो मुर्दे में मांस के लोथडे़ दबाये अलग से खाते थे, तो कुछ उससे छीनने की कोशिश करते नजर आतें। हमें उनकों देखने की उत्सुकता रहती। बाद में हमने किताबो में पढा़ कि वे प्रकृति के सफ़ाई कर्मचारी होते हंै और सिर्फ मरे हुए जीवों को ही खाते है तो फिर हमारे मन से उनके प्रति डर कम हो गया, और हम उन्हे नजदीक से देखने लगे। काॅलेज़ पहुंचते-पहुंचते किताबों में हम पढ़ने लगे कि मवेशियों के इलाज के लिये उपयोग किये जाने वाले एक रसायन के कारण गिध्दो की मौत होती जा रही है। और आखिरकार आज वे लगभग खत्म से हो गये है।
मेरे एक मित्र की चैदह साल की बेटी सड़क पर अपने वाहन से जा रही कि अचानक उसकी गाडी़ को एक आॅटो वाले ने ठोक दिया और वह सर के बल सड़क पर गिर पडी़। कुछ लोग आॅटो वाले को मारने के लिये दौडे़ उसमें कुछ हमारी काॅलोनी के ही आवारागर्दी करने वाले लड़के भी थे। इनके बाप कालोनी में घर खरीदने और बेचने के दलाल थें ये इस तरह के दलाल थे, कि आवश्यकता पड़ने पर ये अपनी पत्नी की भी दलाली कर लेते थे। इनका बस चलता तो ये पूरी काॅलोनी, पूरा शहर पूरा राज्य या पूरा देश ही दलाली लेकर बेच खाते। खैर तीन-चार लोगों ने आॅटो वाले को पकड़ लिया। उधर आॅटो वाले को दुर्घटना की नजा़कत समझ में आ चुकी थी सो उसने अपने जेब से सारा रूपया निकालकर उन्हंे दे दिया और हाथ जोड़कर कहने लगा कि भैया मुझे बचा लो पुलिस थाने कोर्ट-कचहरी से। मैं कल आप लोगो को दस हजा़र रूपये और दे दूंगा। इस तरह उनके बीच समझौता हो गया। पीछा करने वालों ने बताया कि उन्होने उस आॅटो वाले का बहुत दूर तक पीछा किया लेकिन साला भाग निकला। कल साला इधर से गुजरेगा तो उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। मुझे इस घटना ने विचलित कर दिया। मुझे गिध्दों के झुण्ड में से मांस के लोथडे़ अलग से ले जाकर खाने वाले तीन गिध्दों की याद आ गई। इस बीच एक जागरूक प्रत्यक्षदर्शी ने फ्री टोल नं. वाली एंबुलेंस को 108 पर काॅल कर बुलवा लिया था और उस बच्ची को एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल रवाना कर दिया गया। उधर एम्बुलेंस ड्राइव्हर और वहां मौजूद नर्स और डाॅक्टर ने कमीशन खोरी के चक्कर में बडे़ सरकारी अस्पताल न ले जाकर एक प्राइवेट अस्पताल पंहुचा दिया। लड़की के फोन पर उन्होंने पापा लिखे हुए नंबर पर काॅल कर दिया और हाथ लगे यह भी जानकारी हासिल कर ली कि सामने वाली पार्टी कितनी दमदार हैं। जब यह पता चल गया कि मरीज का बाप तो सरकारी विभाग में अफसर है तो उनकी बांछे खिल र्गइं और फिर वे उसे निजी अस्पताल में भर्ती करा गये। अब तक लड़की कोमा में जा चुकी थी। मेरा मित्र उस समय चार सौ कि.मी.अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके यहां वाले घर में उसकी दोनो बेटिंयां ही रहती थीं। दुर्घटना के वक़्त उसकी बडी़ बेटी काॅलेज़ गई हुई थी। हम सभी अपने-अपने काम पर गये हुए थे। मुझे अगले दिन पता चला और मैं अपने उस मित्र को सान्त्वना देने रोज ही अस्पताल जाने लगा। बेटी कोमा में होने के बावजूद डाॅक्टरों द्वारा लगभग रोज बीस हजार रूपये की दवाइयां लिखी जातीं और मेरे मित्र को थमा दी जातीं। वह नर्सिंग होम के मेडिकल स्टोर्स से ही दवाइयां खरीदता और पूरा पैकेट वार्ड बाॅय को सौंप देता। हमें अन्दर जाने की मनाही थी। मुझे यह बात बडी़ खटकती थी कि इन दवाइयों में कई सारी टेबलेट्स और कैप्सूल्स भी होती थी। मैं सोचता कि कोमा में जा चुकी बच्ची को ये किस तरह से टेबलेट्स और कैप्सूल खिलाते होगें। भई इंजेक्शन तक की बात समझ में आती थी कि सलाइन के माध्यम से पहुंचा दी जाती होगी। तीसरे दिन मेरे दोस्त ने दवाइयों का कैरीबैग वार्ड ब्को दिया और वापस लौट आया। उस समय मैं भी उसके साथ में ही था। तभी मुझे टाॅयलेट जाने की आवश्यकता महसूस हुई। टाॅयलेट के पास मैंने देखा कि वह वार्ड ब्याॅय उन्ही दवाइयों का पूरा का पूरा कैरी बैग मेडिकल स्टोर्स के एक कर्मचारी को वापस लौटा रहा है। यह देखकर मेरा खून खौल उठा। पर चूंकि मामला संवेदनशील था सो मैनें अपने मित्र को बताना उचित समझा। मेरे मित्र को मैंने यह बताया इस पर उसका कहना था कि ये लोग चाहे जितनी बदमाशियां कर,ें बस मेरी बेटी ठीक हो जाये। डाॅक्टर उसे लगातार आश्वसान दे रहे थे जबकि मेरा मन कहने लगा था कि अब कुछ नही हो सकता है। चैथे दिन उस अस्पताल में काम करने वाले मेरे एक परिचित ने मुझे बताया भैया वह लड़की तो बे्रन डेड हो चुकी है और अब ये लोग उसे वेंटीलेटर पर रखकर सिर्फ बेड का प्रतिदिन बीस हजार किराया वसूलने के चक्कर में बाॅडी को रखे रहेंगे और हो सकता है कि आॅपरेशन की नौटंकी भी कर सकते है और हुआ भी यही। डाॅक्टर ने आॅपरेशन करना है कहकर मित्र से दो लाख रूपये जमा करा लिये। मैं जबकुछ जानकर भी बेबस था उधर लूट पाट खसोट जारी थी। मंैने अपने मित्र से कहा कि एक बार बच्ची को देख आते हंै। अब तक इन्फेक्शन हो जायेगा कहकर हमें अन्दर जाने ही नहीं दिया जाता था, लेकिन मैं चाहता था कि मेरा मित्र बच्ची को एक बार देखकर सारी बातें समझ जाये, पर उम्मीदें जो न कराये कम है। खै़र दोस्त ने डाक्टर से कहा कि उसे अपनी बच्ची को देखना है। इस पर डाॅक्टर ने फिर इन्फेक्शन की बात से उसे डरा दिया। मैंने कहा हम हम थोडी़ दूर से देख लेंगे। आखिर -डाॅक्टर तैयार हो गया और उसने शाम को 6 बजे हमें बच्ची को दूर से देखने की अनुमति दे दी। हमें निर्धारित समय पर अन्दर पहुुुंचे तो देखा कि लगभग आठ-दस डाॅक्टरों ने उसे घेर रखा है डाॅक्टरों की भीड़ में हमें बच्ची दिखी ही नहीं। बच्ची को घेरे हुए वो डाॅक्टर्स मुझे झुण्ड में मांस नोचते गिध्द से प्रतीत हुए। हमें ऐसे ही लौटना पडा़ अब मुझे उस अस्पताल से नफ़रत सी होने लगी थी। मैं देखते-सुनते, जानते-समझते मक्खी निगल रहा था। मेरे पास कोई उपाय नहीं था। मैनेे अगले दिन से जाना बंद कर दिया। तीन दिनों बाद बच्ची मृत घोषित कर दी गई। मैं तुरंत अस्पताल पहुंचा । अस्पताल वालों ने दो लाख रूपये का बिल बनाया था। और उसे जमा किये जाने के बाद ही बाॅडी ले जाने की अनुमति देने की बात कह रहे थे। मेरा मित्र उनसे हुज्जत कर रहा था। उसके रिश्तेदार समझा रहे थे कि ये हुज्जत करने का समय नहीं है। आखिरकार बाॅडी गिध्दो से छुडा़ ली गई, लेकिन डाॅक्टरों ने थाने में फोन कर दिया था। मतलब गिध्दों ने अपने दूसरे भाईयों को बुला लिया था और फिर बाॅडी पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई। पुलिस ने पंचनामा बनाने के लिए लड़की के बाप से पैसे वसूल लिये। पोस्टमार्टम के लिये पहले से पांच बाॅडी इंतजार में थी। एक किशोर लड़की की मृत्यु से दुःखी पिता को कुछ समझ नहीं आ रहा था। पोस्टमार्टम में शराब पीने बाॅडी को लपेटने के लिये पन्नी खरीदने और न जाने किस-किस नाम से पैसे वसूल लिए गये।
उस बच्ची को कंधा देते हुए अचानक हमें महसूस हुआ कि व तो एकदम हल्की है। हमने इतने सारे गिध्दों से छुडा़ई गयी पूरी तरह बची हुई लाश को न ढोकर लाश के छोटे से हिस्से को ढो रहे है। सड़ी-गली व्यवस्था को ढो रहें हैं।
                                    9 कुंदन दीदी
मेरा बचपन अभावों में बीता था। हालांकि वो दौर ही अभावों का था। संपन्न से दिखने वाले लोग भी अभावग्रस्त होते थे, या कर्ज में डूबे हुए होते थे। मेरी बडी़ बहन गुजरातियों के स्कूल में पढ़ती थी, और उसकी कुछ गुजराती सहेलियां भी थी। हमारे गरीब होने की स्वाभाविक कुण्ठा पनप रही थी। उपर से गरीबी गजब ढा रही थी इसके अलावा हम सभी भाई-बहन औसत कद काठी के एकदम साधारण शक्लों सूरत के मालिक थे। ऐसे में दीदी की वो गुजराती सहेलियां भी हमारे घर आती थी तो हमें लगता कि हमारा घर परीलोक बन गया है। वे बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उनमें अपनी खूबसूरती और संपन्नता का जरा भी अभिमान नहीं था। इन गुजराती लड़कियों में से एक थी कुंदन दीदी । वह लगभग रोज ही हमारे घर पर आती थी। वह हमें हमारी सगी बहनों से भी ज्यादह प्रेम करती थी। और हम छोटे भाई-बहनों के लिए कुछ ना कुछ उपहार लाया करती थी। गरीबी के कारण हमारे हमारे पास खिलौने नहीं होते थे। हम सायकल के खराब टायर को एक लकडी़ से ढुलाते हुए खेलते थे। हवा चलने पर रस्सी में पन्नी बांधकर उडा़या करते थे। बरसात के मौसम में लोहे की कही पडी़ हुई मिली राॅड से गीली मिट्टी में गडा़ने का खेल गड़उला खेलते थे। कुछ नही ंतो अपने दोनो हाथों को डैने की शक्ल में फैलाकर दौड़ते थें। हमने कुछ नये खेल भी खोज निकाले थे। हम अपने दोनों पैरों अंगूठों के बीच धागा बांधते थे और उसके बीच में अगरबत्ती की काडी़ लगाकर और उसे घुमाते थे और फिर उसके बीच में धागे का एक नया लूप बनाकर उसमें फसाकर घूमाते थे। फिर धागे के लूप को खींचतें और छोड़ते थे। इस तरह वह चरखे की तरह चलता था। कई बार तो चायपत्ती के डब्बों में चक्के के लिये स्थान बनाकर चक्कों की जगह पर फोटों खीचने वाली फिल्म की खाली प्लास्टिक की गड्डी रखकर उस पैकेट को कार की तरह चलाते थे। उस वक्त कार का स्वप्न देखना भी बडी़ बात होती थी। मैं अपनी उस कार में चींटों को बिठाकर घुमाया करता था और सोचता था कि चींटे की जगह मैं खुद अपनी कार में बैठा हूं। इसी तरह हम कागज की नाव बनाकर उसमें बड़े काले वाले चींटे को रखकर पानी में तैराना आदि खेल खेला करते थे। कुंदन दीदी हमारे लिये अच्छे-अच्छे खिलौने लाती, खाने-पीने की चीजें लाती। हमारा परिवार उस समय भूखमरी के दौर से गुजर रहा था ऐसे में खाने-पीने की ये चीजें हमारे लिए अमृत समान थीं। हम आठ भाई-बहन थे। कुंदन दीदी हमें सांताक्लाॅज जैसी लगती। कभी-कभी वह हमें एक ऐसी परी की तरह लगती, जो छड़ी घुमाकर मनचाही, चीजें निकालकर दे-दे। कुंदन दीदी को देखते ही हम सब भाई बहनों के चेहरों पर रौनक़ आ जाती थी, और हम दीदी-दीदी कहते हुए उनके आगे-पीछे घूमते रहते। हमारे पड़ोस में एक वहीदा दीदी भी रहा करती थी। वे मुस्लिम थी। मुझमें समझ विकसित होने पर कि वहीदा दीदी भी हमारे घर प्रायः रोज आती थी। वे भी तभी आती जब कुंदन दीदी आया करती थीं, पर मैंने एक बात महसूस किया था कि वहीदा दीदी के आने पर कुंदन दीदी बेहद असहज हो जाती थी।
कुछ ही दिनों बाद कुंदन दीदी की शादी तय हो गई।  उनके होने वाले पति बेहद सम्पन्न थे। वे बडोदरा के रहने वाले थ,े और उनका दुबई में सोने-चांदी का बिजनेस था। कुछ महीनों के बाद कुंदन दीदी की शादी हो गई और वे दुबई चली र्गइं। अब दीदी पता नहीं कब आयेगी, सोचकर हम अपने-आपको बेसहारा समझने लगे थे। हम उस वक़्त दाने-दाने को मोहताज़ थे। हम अपने घर के सामने से गुजरती आलू-प्याज से भरी बैलगाड़ियों में से आलू-प्याज चुराया करते थे। और उसे ही भूंजकर खा लेते थे। राशन दुकान से लाल रंग के गेंहू मिलते थे, जिसकी रोटी बडी़ ही कड़ी बनती थी। हमारे दिन इसी तरह गुजर रहे थे।
कुंदन दीदी जैसी थीं, वैसे ही उदार मना उनके पति भी थे। शादी के छः महीने बाद वे दोनों ढेर सारे उपहारों के साथ हमारे घर आये थे। हमारी खराब परिस्थितियों को देखकर उन्होंने मुझे गोद लेने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन मेरी मां ने मना कर दिया था। ख़ैर कुंदन दीदी मुझे बेहद प्रेम करती थी और दुबई से मेरे लिए एक से बढ़कर एक उपहार भेजती रहती थी। अब तक मैं मिडिल स्कूल में पहंुच चुका था। उन्हांेने मेरे लिए एक पार्कर पेन भिजवाया था। उस जमाने में पार्कर पेन दुनिया की सबसे महंगी पेन में शुमार होती थी। मैं उस पेन का इस्तेमाल नहीं करता था। मुझे डर था कि इस्तेमाल करने से पेन कहीं ख़राब न हो जाय। मै उसे एक पेटी में छुपाकर रखता था और रोज सुबह शाम देखता था कि पैन सही सलामत है कि नहीं। मंै अपने तमाम मित्रों को बताता कि मेरी दीदी ने दुबई से मेरे लिये दुनिया की सबसे महंगी कंपनी की पेन भिजवाई है तो मेरे दोस्त मेरा मजाक बनाते- अबे ऐसे सपने मत देखा कर। मैं उन्हें वह पेन दिखाना चाहता था, लेकिन डरता था कि कहीं कोई मुझसे वो पेन छीन न ले या चोरी न कर ले। दोस्त आसपास की स्लम बस्ती के थे। मैं उन्हे हर हाल में यकीन दिलाना चाहता था कि मेरे पास दुबई से मंहगे-मंहगे गिफ्ट आते हंै। मैं पोस्टमैन अंकल से उनके सामने पूछवाता अंकल आप बताइये न कि मेरे पास दुबई से पार्सल आते हैं कि नहीं। और पोस्टमेन अंकल बोलते हां आते है। लेकिन मेरे दोस्त फिर भी य़कीन नहीं करते थे। एक दिन मैंने सोचा कि मैं पेन को तो पेटी में ही रखी रहने देता हूं। लेकिन उसका केस दोस्तों को दिखा देता हूं। उस पेन का केस बहुत ही खूबसूरत था। वह ज्याॅमेट्री बाक्स जितना बडा़ था और पूरी तरह मखमल से कव्हर्ड था। उसमें प्रयोग की गई धातु में सुनहरे रंग की पाॅलिश थी। वह कुछ-कुछ आज के बडी़ ज़्वेलरी बाॅक्स जैसा ही था। मैंने दोस्तों को पेन का बाॅक्स दिखाया तो उन्होंने मेरा यकीन कर लिया। अब मैं उस बाक्स में पेन, पेन्सिल स्केल आदि रखकर स्कूल ले जाने लगा। मेरा वह पेन केस सारी कक्षा के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। कुंदन दीदी मेरे लिये लगातार उपहार भेजती रहीं। एक बार उन्होंने मेरे लिए वहां की बडी़ ब्रांडेड कंपनी का शर्ट और पैण्ट भिजवाया। मैं उसे पहनकर कई दिनों तक इतराता घूमता रहा। अपने दोस्तों को बताता रहा। अब तक मेरे दोस्तों को मुझसे थोडी़ जलन भी होने लगी थी। चार-पांच दिनों तक लगातार पहनने के बाद मेरी मां ने उस कपडे़ को धो दिया। धोने के बाद जब लोहे की इस्तरी से मैं उसे प्रेस करने बैठा तो मैं बेहद मायूस हो गया। फुल पैण्ट की लम्बाई बारह-पन्द्रह इंच कम हो चुकी थी। यही हाल, फुलशर्ट का भी था। मुझे रोना आ गया। वास्तव में वह कपडा़ ड्रायक्लिनिग में ही धोये जाने वाला कपड़ा था इसलिये साधारण धुलाई ने उसका यह हश्र कर दिया था। चूंकि अब वह शर्ट-पैण्ट अजीब तरीके का हो चुका था, सो मैेंने उसे पहनना बंद कर दिया। लेकिन मैंने उसे संभालकर उसी पेटी में रख दिया। धीरे-धीरे हमारी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी थी। कुन्दन दीदी लगातार हमसे जुडी़ हुई थीं। वह जब भी अपने मायके आती, हमारे यहां जरूर आती। चिट्ठी-पत्री तो उनकी लगातार आती ही रहती थी। इसी बीच उनकी एक लड़की हो गई। वह भी बेहद खूबसूरत बार्बी डाॅल की तरह लगती थी। कुंदन दीदी की संपन्नता के कारण हमें कभी अहसास ही नहीं हो पाया कि वह भीतर से दुःखी भी हो सकती है। तब तक हमारे लिये सुख का मतलब रूपयें-पैसे ही होता था। कुन्दन दीदी अपने पत्रों में लिखती रहती कि यहां दुबई में उनका दम घुटता है। उसने कई बार वहां के कडे़ कानून और धार्मिक भेदभाव की बात लिखी थी। उसने अपने-आपको सोने के पिंजरे में कैद पक्षी की तरह बताया था। उनकी ससुराल में भी तीन-चार सौ एकड़ खेत थे और किसी किस्म की कमी नहीं थी, तो भी चूंकि उनका कारोबार दुबई में जमा-जमाया था सो एकदम से समेटा नहीं जा सकता था। कुंदन दीदी की इच्छा थी कि उनके पति अपना सारा करोबार समेटकर भारत में ही बस जायें। पर यह सब आसान नहीं था। इस बीच उनको एक लड़का हुआ। कुंदन दीदी अब अवसाद में रहने लगी थी। उनका बच्चा कमजोर पैदा हुआ था, और दो साल के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई थी। दीदी अवसाद-ग्रस्त तो पहले से ही थी, अब उनका अवसाद और भी बढ़ गया था। उसे लगने लगा कि वहां के डाक्ट्ररों ने मजहबी भेद-भाव के चलते जान-बूझकर उसे मार डाला है। इधर अब तक हम सभी भाई-बहन आत्मनिर्भर हो चुके थे। उधर कुंदन दीदी पागल होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। कभी वह हम लोगों के साथ रहने की बात कहती, तो कभी हमारी बडी़ बहन के घर पर रहने की । आख़िरकार उनके पति ने उन्हें हमारी बडी़ बहन के घर छोड़ दिया। अब वे बेहद खुश रहने लगी थी। वह बारी-बारी से हम सभी भाई-बहनों के घर जाने लगी, और उसे हम सभी से मिलकर बेहद खुशी होती। कंुदन दीदी धीरे-धीरे अब पूरी तरह से ठीक होने लगी फिर वह वापस दुबई चली गई। अब तक मुझमें समझ विकसित होने लगी थी और मैं एक निष्कर्ष पर पहुंचा मुझे लगता है, कि हमारे देश में दलित और मुसलमान दोनों की तकरीबन एक सी स्थिति है। हमारे मुल्क में कुछ लोगों के अवचेतन में दलित और मुसलमानों को लेकर बेहद नफ़रत और अविश्वास भरा होता है। ज़्यादहतर ऐसे लोग होते है, जिनके मन में इस दोनों के प्रति एक सी नफरत भरी होती है। कुछ लोग धार्मिक भेदभाव रखते हैं तो कुछ जातिगत भेदभाव । कुंदन दीदी के मन मेें दलितों के प्रति सद्भावना रही, जबकि मुस्लमान वहीदा दीदी के वे कभी-कभी सहज नहीं रह पाई।
10 जोंक
हमारे घर की चारों ओर बहुत से तालाब थे और हम सभी दोस्त बारी-बारी से सभी तालाबों मे नहाया करते थे। इन तालाबों में एक फोटका तरिया भी था। जलकुंभी को छत्तीसगढ़ी में फोटका कहा जाता है। यह तालाब, पूरी तरह जलकुंभी से ढ़का हुआ रहता था। एक नज़र में यह तालाब, तालाब नज़र न आकर हरा-भरा मैदान ही नज़र आता था। यहां जलकुंभियां बेहद घनी थी। यदि हमें इस तालाब में नहाना होता तो हमें कम से कम आधा घण्टा मेहनत करते हुए जलकुंभियों को या तो बाहर करना होता था, या फिर ठेलकर उसे दूर हटाना होता था। इस तालाब में नहाना बडी़ ही बहादुरी का काम माना जाता था। सबसे पहले तो फोटका हटाना ही बडा़ श्रमसाध्य कार्य होता था। फिर उस फोटका तरिया में पानी के सांपों की भरमार थी और मेंढ़क-मछलियों के साथ-साथ जोंक भी वहां बहुतायत में पाई जाती थीं। चूंकि वहां जलकुंभी बेहद घनी थी, सो वहां इफ़रात मछलियां होने के बावजूद मछली पकड़ने का कोई ठेका नहीं लेता था और मछलियां अंदर ही अंदर बहुत बडी़ हो जाती थी। उसी अनुपात में सांपो का आकार भी बढ़ जाता था। वहां पानी के तमाम जीव बडे़ आकार के थे। केकडे़ भी बहुत बडे़ होते थे। इस तालाब में कई बार मछलियां इतनी बडी़ हो जाती थीं कि वे चार-पांच साल के बच्चों के पैरों को अपना शिकार समझ कर खींच लेती थी और फिर डूबने से बच्चे की मृत्यु हो जाती थी। उस वक़्त तक किसी को भी नहीं पता होता था कि ये बडी़ मछलियों की करतूत है। लोग कहते कि बच्चों को सांकल पकड़ लेती हंै और डूबा देती है। इस तालाब में सिर्फ भैंस ही नहाती थी, जिनकी पीठ पर बैठकर चिड़िया जुएं खाया करती थी।
इन सारे जीवांे में मुझे जोंक से बेहद डर लगता था। वे शरीर से बुरी तरह चिपक जातीं और चुपचाप खून पीने लगतीं। वे इतनी खामोशी से खून पीती थीं कि पता भी नहीं चल पाता था। बाद में रिसर्च में पता चला कि जोंक अपनी लार के साथ वे एक ऐसा रसायन छोड़ती हैं, कि मनुष्य को खून निकलने पर दर्द का अहसास ही न हो। खै़र मैं सबसे ज़्यादह इन जोंको से डरता था। पानी के सांपों के बारे में आमधारणा थी कि वे ज़हरीले नहीं होते हैं, और सांकल के बारे में कहा जाता था कि वह तालाब के बीच में रहती है। खै़र जोंक के बारे मे यह बातंे कही जाती थी कि वह हाथ-पैर में चिपके तो फिर भी निकाला जा सकता हैं, लेकिन यदि वह शरीर के किसी भी छिद्र के रास्ते से अन्दर घुस गई तो फिर पेट के सारे अंगों का खून चूस कर उसे बर्बाद कर देती है और आदमी भयंकर मौत मरता है। एक तरह से जोंक को लेकर मेरे दिमाग़ में ख़ून पीने वाले ड्रायकुला की तस्वीर बनती थी। मैं उस तालाब में नहाने की कल्पना से ही डर जाता था, लेकिन दोस्तों के कारण हिम्मत बढ़ जाती। तो भी मैं अपने साथ एक लोटा लेकर जाता था कि यदि ज़्यादह डर लगे तो तालाब में न उतरकर वहीं किनारे पर लोटे से नहा लूंगा। मेरे दोस्त मेरा बहुत मजाक उडा़ते कि अबे तू तालाब में जाकर लोटे से नहायेगा तो फिर तालाब में नहाने का मतलब ही क्या हुआ। मेरे दोस्त तो नंगे ही कूद पड़ते थे, पर जोंक के अंदर घुस जाने की कल्पना से मैं तो अपना हाॅफ- पैण्ट उतारने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता था।
मेरे प्रायः सभी दोस्त आस-पास की स्लम बस्तियों से थे वे सभी हालांकि पढा़ई में कमज़ोर थे, लेकिन उन्हंे दुनियादारी की बेहद गहरी समझ थी। उन्हंे जोंक से निपटना आता था। उस तालाब में हमें जब भी नहाने-जाना होता तो वे अपने साथ गुडा़खू (गीला सा नशीला मंजन) या फिर पुड़िया मे गडा़ नमक लेकर चलते थे। वे मुझे हिम्मत बंधाते, अबे चल हमने जोंक को मारने का इंतजाम कर रखा है। शरीर में चिपकी हुई जोंक को निकालने के बारे में उन्हें मालूम था कि नमक, गुडा़खू या फिर मिट्टी का तेल डालकर उन्हें निकाला जा सकता है। लेकिन जोंक के बारे में मैंने किताबों में पढा़ था कि उसके जितने टुकडे़ किये जाये वो उतनी ही जोंक में बदल जाती है। एक तरह से रक्तबीज राक्षस की भांति ही होती हैं। मेरे दोस्तों के लाख समझाने के बावजूद मैं जोंक को लेकर कभी भी सहज नहीं हो पाया। जोंको का डर मेरे अन्तस में कहीं गहरे पैठ कर गया था और मेरे व्यक्तित्व का खून चूसकर मुझे डरपोक बना रहा था।
एक बार दोस्तों के बेहद उकसाने पर मैं फोटका तरिया में कूद गया और काफी देर तक उनके साथ नहाता रहा। गर्मियों के दिन थे। मुझे बेहद मजा आ रहा था। मैं नहाकर जैसे ही बाहर निकला, तो मेरे दोस्तों ने बताया कि अबे तेरे शरीर से चार-पांच जोंक चिपकी हुई हैं। इतना सुनना ही था कि मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। मैं बेहद घबरा गया था। जोंक का मुझ पर खौफ़ इस तरह चढा़ हुआ था कि मुझे लगने लगा कि ये जोंक मेरा खून चूसते-चूसते मेरी नसों के अंदर घुस जायेंगी, और फिर नसों के माध्यम से मेरे दिमाग़ में पहुंचकर मेरे मस्तिष्क में विस्फोट कर दंेगी। इतने कम समय में मैंने यह सारी बातंे सोच लीं, और मैं और भी ज़्यादा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उधर एक दोस्त ने नमक के गड़े को बडे़ पत्थरों में पीसकर सभी जोंकों के उपर डाल दिया। जोंक अब तड़पकर मरने लगी थी, तब मेरी जान में जान आई और मैंने रोना बंद किया।
  मैं अपने घर में सबसे छोटा था। मेरे से बडे़ सात भाई बहन थे। चूंकि मैं घर में सबसे छोटा था, सो लाड़-प्यार में पला-बढा़। मेरी मां मुझसे कोई श्रम वाला काम नहीं कराती थी। मैं एकदम छुईमुई सा नाजुक लड़का था। बेहद दुबला-पतला। ज़रा-ज़रा सी बात पर मेरी तबीयत ख़राब हो जाती थी, और मुझे शहर के सरकारी अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। मैं एकदम पिनपिना सा था। लोग अस्पताल के नाम से घबराते थे, लेकिन मुझे अस्पताल बहुत अच्छा लगता था। वहां भर्ती होकर रहना मुझे बेहद अच्छा लगता था। बच्चों के वार्ड में सभी बीमार बच्चों से मेरी दोस्ती हो जाती थी, और चूंकि मैं पढा़ई-लिखाई में उस वक़्त तक होशियार था, सो मैं जल्दी ही वहां लोकप्रिय भी हो जाता था। उन दिनों पता नहीं कैसे मुझे मिट्टी खाना और स्लेट पेंसिल खाना अच्छा लगता था। उन दिनों मिट्टी से ईंटों की जोडा़ई की जाती थी और सीमेण्ट से प्लास्टर कर दिया जाता था। कई लोग अभावों के चलते प्लास्टर भी नहीं करा पाते थी मैं इन्हीं घरों से मिट्टी निकालकर खाया करता था। इसके अलावा मैं छुही, और स्लेट पेंसिल भी खा लिया करता था। मैं जिस स्कूल में पढ़ता था वह सौ साल पुराना स्कूल था और उसकी दीवारों पर लगातार पोताई से चूने की एक मोटी सी पर्त चढी़ हुई थी। मैं कक्षा में दीवाल के पास बैठा करता था और उस चूने की पर्त को भी खाया करता था। इसका दुष्परिणाम यह होता कि मेरे पेट में कृमि लगातार रहती और मुझे बार-बार अस्पताल जाना पड़ता। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान बच्चा वार्ड के पूरे बच्चों से मेरी दोस्ती हो जाती थी। मैं उन सबका पता लिख लिया करता था। और उन्हें भी अपना पता दे दिया करता था, जो बाद में चिट्ठी पत्री काम आता था। जीवन की नश्वरता का ज्ञान मुझे छुटपन से ही हो गया था, क्योंकि अस्पताल में मेरी ही उम्र के कई बच्चों की मृत्यु मेरे ही सामने हो जाती थी। बच्चों के वार्ड में एक कोना ऐसा भी था, जहां लावारिस बच्चे पलते थे। उसमें कई बच्चे ऐसे होते थे, जिनकी माएं डिलवरी के बाद गरीबी के चलते उन्हंे पालने में असमर्थ होने पर उन्हे छोड़कर चली जाती थी। कुछ अवैध संतानें हुआ करती थीं। ये बच्चे वार्ड के मरीजों के अलावा नर्स और डाॅक्टरों के चहेते होते थे। ये बच्चे मुझे दुनिया की क्रूरता, स्वार्थ और प्रेम आदि दुनियादारी की बातें सिखाते थे। उस वक्त अमीरी-गरीबी जैसा स्पष्ट विभाजन बाहर तो दिखाई पड़ता, लेकिन स्कूलों और अस्पतालों में सभी बराबर थे। अमीर से अमीर और गरीब से गरीब बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, और सरकारी अस्पताल में ही भर्ती होते थे। उस समय भी हालांकि प्राॅयवेट स्कूल थ,े लेकिन सरकारी स्कूलों में पढा़ई इतनी अच्छी हुआ करती थी कि सभी चाहते थे कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढा़ई करें। जिन्हंे सरकारी स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाता था, वे ही प्रायवेट स्कूल का रूख करते थे। हालांकि कुछ ऐसे लोग उस वक्त भी थे जो अपनी श्रेष्ठता के अहं को तुष्ट करने और गरीब बच्चों की छाया से दूर रखने के लिए अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूल मंे पढा़ते थे। वाद-विवाद हो, या भाषण प्रतियोगिता हो, हमारे मुकाबले में प्राॅयवेट स्कूल टिक नहीं पाते थे। प्रतियोगिता के दौरान हम अपने साथियों का उत्साह बढा़ने के क्लॅास छोड़कर चले जाते थे। प्राॅयवेट स्कूल के लड़के भी हमारा सम्मान किया करते थे। कुल मिलाकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती थी। आज परिस्थितियां पूरी तरह उलट चुकी हैं। शिक्षा व्यवसाय बन चुका है। शिक्षा के लिये परचून की दुकान से लेकर बडे़-बडे़ माॅल के स्तर की दुकान खुल गई हैं जहां सेे लोग शिक्षा खरीद रहे हैं।
हां तो अस्पताल एक तरह से समाजवाद और साम्यवाद की पाठशाला हुआ करता था। मेरे हमउम्र बच्चों से मेरी दोस्ती लम्बे समय तक बनी रहती थी। मेरे शहर में रहने वालांे से  तो मैं गाहे-बगाहे मिलता ही रहता था। और दूसरे शहर वालो को चिट्ठी लिखा करता था। उस व़क्त डाॅक्टरी सेवा का पर्याय होती थी आज की तरह पेशा नही था। उसमें आज की तरह लूट-पाट नहीं होती थी। कमीशन खोरी भी नहीं होती थी। डाॅक्टर भगवान से लगते थे, और नर्से देवदूत सी होती थीं। उनका व्यवहार इतना अच्छा होता था कि वे हमें याद रह जाते थे। मुझे याद आता है कि एक डाॅ. श्रीमती प्रसन्ना हुआ करती थीं। वे अपनी पूरी टीम के साथ हर बेड के नज़दीक आती थी, और हर बच्चे के सर पर इतने प्यार से हाथ फेरती थी कि लगता था कि किसी परी ने जादू की छडी़ घुमा दी हो। और हम पूरी तरह से ठीक हो गये हंै। उनके स्पर्श में गजब का जादू होता था। वे जब बोलतीं थी तो ऐसा लगता था कि आकाशवाणी हो रही हो कि तुम ठीक हो जाओगे। वे हर बच्चे के पास कम से कम दस मिनट ठहरती,ं और अपनी टीम को उस बच्चे के ईलाज़ के संबंध में आवश्यक निर्देश देती रहती। हां, तो घर में सबसे छोटा होने के कारण मुझे बडी़ जिम्मेदारियां निभाने का अवसर नहीं मिला और अपने घर में मैं बच्चा ही रहा। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मैं धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराने लगा। हर काम को मैं टालने लगा और एक तरह से पलायनवादी सा बन गया। इसका यह भी बुरा प्रभाव पडा़ कि पढा़ई में अच्छा होने के बावजूद मेरा आत्मविश्वास डगमगाने लगा। मैं अपने-आपको सांत्वना देता कि मैं चूंकि पढा़ई में अच्छा हूं, सो प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर बडा़ अधिकारी बन जाऊँगा। मैं अपने सारे काम नौकरों से करवाया करूंगा। लेकिन मैं प्रतियोगी परिक्षाओं में फिसड्डी साबित होने लगा। आईएएस बनने का सोचते हुए नौकरी की उम्र खत्म होते होते एक मामूली सी नौकरी में जा टिका। चूंकि पलायन मेरा स्वभाव सा बन गया। था सो वहां भी मै असफल ही रहा, पर चंूकि सरकारी नौकरी थी, इसलिये मैं चलता रहा, चलता रहा। मैं अपनी नौकरी को लेकर इतना असुरक्षित रहा कि मुझे लगने लगा कि मुझे शादी भी किसी नौकरी वाली लड़की से ही करनी चाहिये। युवावस्था की समाप्ति और अधेडा़वस्था की शुरूआत में मैने शादी कर ली। मेरी पत्नी खुद को लेकर महत्वकांक्षी कभी नहीं रही, लेकिन पति को लेकर वह बेहद महत्वकांक्षी थी। उसने ख्वाबों में पति के रूप में कोई आईएएस ही देखा था। डाॅक्टर-इंजीनियर से नीचे के लेवल से कम का उसने कभी सोचा भी नही था, लेकिन हम जैसा चाहते है, वैसा होता कहां है। हम दोनों अपनी-अपनी कुण्ठाओं के मारे हुए थे। अपनी असफलता से उपजी कुण्ठा से भयंकर रूप से पीड़ित। परिणाम-स्वरूप हमारा दाम्पत्य जीवन हमारी हताशाओं और निराशाओं की भेंट चढ़ गया। चूंकि मैं तो पूरी तरह पलायनवादी था, सो मेरे समक्ष पलायन के बहुत रास्ते थे जैसे मर जाना, मार देना, शराब में डूब जाना दूसरी औरतों के चक्कर में पड़ जाना। ये बेहद प्रचलित और लोकप्रिय उपाय थे पलायन के। लेकिन इस बीच मेरे एक मित्र ने मुझे मेरा परिचय एक आध्यात्मिक बाबा से कराया। बाबा, बाबा न हेाकर एक मनोवैज्ञानिक लुटेरा था। उसने भांप लिया कि मैं पलायनवादी प्रवृत्ति का आदमी हूं, सो उसने मुझे दुनिया से पलायन करने के ऐसे तरीके बताये कि मंै उससे बेहद प्रभावित हो गया। उसने भगवान की शरण में जाने की सलाह दी। अब तक तो मैं नास्तिक ही था, लेकिन भगवान की शरण में जाने का विचार मुझे बेहद प्रभावित कर गया। इसमें कोई ख़तरा भी नहीं था। बल्कि इस तरह के पलायन से सामाजिक प्रतिष्ठा ही बढ़ती थी। अब मैं धीरे-धीरे बाबा का अंध-भक्त बनता जा रहा था। मैं एक तरह से बाबा का गुलाम ही बन गया। मेरा अवचेतन मन मुझसे हमेशा चेताता रहता कि बाबा से बचो, पर पलायनवाद जो न कराये कम है। धीरे-धीरे वह बाबा मेरी जेब खाली करने लगा। मेरे मन में वैराग्य पनपने लगा। बाबा हमेशा काम-वासना से दूर रहने की बात कहता, लेकिन एक बार मैंने खुद उसे एक साध्वी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया। मुझे झटका सा लगा, और फिर उस बाबा से मेरा मोह भंग हो गया। इस घटना ने यह बात सिध्द कर दी कि काम-वासना से दूर रहने की बातें करना और काम वासना से दूर रहने में बेहद अंतर है। हमारे शरीर की संरचना ही ऐसी है कि काम-वासना को टाला नहीं जा सकता। लेकिन अब तक मुझे पलायवादी बातें, जिसे कथित तौर पर ज्ञान की बाते भी कहा जाता है, सुनने की लत सी लग चुकी थी, और मैं कथित तौर पर ज्ञान-पिपासु हो गया था। मैं दिनभर टीवी खोलकर आध्यात्मिक चैनल देखने लगा था। इस बीच मुझे एक ऐसे बाबा के बारे में पता चला जो कि कहता था कि आप काम-वासना में डूब कर ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हंै। बीच-बीच में वह विज्ञान की तर्कपूर्ण बातें भी किया करता था। उसकी इस बात ने मेरी नास्तिकता और पलायनवाद देानों को तुष्ट करना शुरू कर दिया था। और दोस्तों के लाख मना करने के बावजूद मैंने उसका आश्रम ज्वाईन कर लिया। उसका आश्रम बेहद वैभवशाली था। उसमें किसी फाइव स्टाॅर होटल जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध थीं। यहां पर ऐय्याशी को आध्यात्म का चोला ओढा़ दिया गया था। इस आश्रम में शराब, कबाब और शबाब तीनों की व्यवस्थाएं थीं। उस बाबा का सिंध्दांत था कि था कि काम वासना में इतना डूब जाया जाये कि काम-वासना से वैराग्य हो जाये। उनकी यह बात मुझे बेहद प्रेरित करती थी। ख़ैर इस बाबा के आश्रम में तमाम किस्म की रंगिनीयों के अलावा आध्यत्म भी था, सो मैंने इस बाबा से वादा कर लिया कि अब चाहे जो जाये बाबा, मैं आपकी शरण में आ गया हूं और अब यहां से कहीं और नहीं जाऊँगा। मेरी ज्ञान की खोज ते़जी से मेरी जेब खाली कराने लगी। यहां रहते हुए भोग-विलास में डूबते हुए मुझमें वैराग्य तो नहीं पनपा, लेकिन धीरे-धीरे मुझे बाबा से ही वैराग्य होने लगा। अब तक पहले फांस ने और बाद में लूटने वाले बाबाओं से मैं सतर्क हो गया था। एक दिन मुझे ऐसे बाबा के बारे में पता चला जो कि जीवन जीने की कला सीखाता है। उससे जीने की कला सीखकर, उसके कई एजेण्ट देश के विभिन्न शहरों में कमीशन एजेण्ट की तरह दुकानदारी चला रहे थे। हमारे शहर में एक भू-माफिया उसका कमीशन एजेण्ट था। वह भू-माफियागिरी करने के साथ-साथ साईड बिजनेस के रूप में जीने की कला सीखा रहा था। मैंने सोचा कि चलो ईश्वर की प्राप्ति तो हो नहीं पा रही हैं, तो कम से कम जीवन जीने की कला ही सीख ली जाये। वह एजेण्ट दस दिनों का कोर्स चलाता था, जीने की कला सीखाने का। उसने अपनी फीस पांच हजार रू.रखी थी। मैंने सोचा चलिए यहां भी दांव आजमाया जाये, और मैंने रूपये जमा करके उस कोर्स में एडमिशन ले लिया। पहले दिन मुझे वही नाक, मुंह और पेट फुलाने वाली कला सिखाई जाने लगी, जिसे कई चैनल फ्री में दिखाते थे। मुझे लगा कि मैं एक बार फिर ठगा गया हूं। मेरे सवाल उठाने पर उन्होंने आगे के नौ दिन मे जीने की कला सीखाने की बात कही लेकिन दूसरे ही दिन पता चला कि उस भू-माफिया को लोगों की जमीन हड़पने और सरकारी ज़मीन दबाने के मामले में गिऱफ्तार कर लिया गया है। पेपर में उस भू-माफिया की हथकडी़ लगी हुई फोटो छपी हुई थी। यह उस दिन का मुख्य समाचार था। मैंने सोचा चलो पांच ह़जार रूपये डूबे तो डूबे, मैं जीवन जीने की ऐसी कला सीखने से बच गया, जिसका अंजाम जेल हो। चूंकि पलायनवादिता मेरी रग-रग में थी, सो इतने धोखे खाने के बाद भी मुझे इस बात पर यकीन था कि मुझे कहीं न कहीं तो मोक्ष प्राप्ति का रास्ता मिलेगा ही। मैं कई बाबाओं के दरवाजे़ गया लेकिन सभी की काली करतूतंे कुछ दिनों बाद ही उजागर हो जातीं। लगभग सभी बाबा किसी ना किसी रूप में अनैतिक कर्मो में लगे हुए थे, और उनका एकमात्र उदे्दश्य था कि अपने अंधभक्तों के जीवनभर की कमाई को चूस लेना। मैं भी इन बाबाओं के चक्कर में पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। अचानक मुझे एक दिन अपने आप ही आत्म ज्ञान प्राप्त हो गया कि ये साले सारे के पाखण्डी हंै और आपका अपना परिवार ही सब कुछ ह लेकिन। अब तक मैं पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। मुझे समझ में आ गया कि ये धर्म-आध्यात्म आदि फोटका तरिया है, जिसमें विभिन्न आकार के जीवों के साथ जोंक भी पल रही हंै। ये जोंकें कभी मेरे छिद्रो से अंदर घुस रही है, तो कभी मेरा खून चूसते हुए मुझे निस्तेज बना रही हैंै। ये बाबा रूपी जोंक भी अपनी लार के साथ ऐसा केमिकल छोड़ते हैं, कि हमंे हमारे चूसे जाने का अहसास ही नहीं हो पाता है। बस अन्तर यह होता है कि जोंक जबरदस्ती हमारे शरीर से चिपकती है,  और यहां पर हम उन्हें आमंत्रित करते है, अपना चुसवाने के लिए, फोटका तरिया में नहाने का जोखिम उठाकर। ये कभी नहीं मरतीं इन्हे अमरत्व का वरदान प्राप्त है। इन्हें मारने के लिये आज तक कोई गुड़ाखू, नमक या घासलेट नहीं बन पाया है।
पथराई आँखों में लहराते सपने
वह बस्ती शहर के लगभग बाहर ही बसी हुई थी । कंाक्रीट के पसरते जंग़ल उस बस्ती को भी लील लेने के षड़यंत्र में लगे हुए प्रतीत हो रहे थे। उसी बस्ती के सीमांत पर स्थित एक झोपड़ी की गोबर से लीपी हुई ज़मीन पर बोरे बिछाये पड़ी उम्र की मंज़िल के सूने रास्ते की आधी दूरी तय कर चुकी फूलवती की आँखों से नींद कोसांे दूर थी। आज दीपावली की रात थी। हवाओं में ठंडक घुली हुई थी, जिसकी चुभन से वह सिहर-सिहर सी जाती थी। उसके नज़दीक ही उसका छः वर्षीय बेटा मुन्ना, पटाखे खरीद देने की ज़िद करते हुए मार खाकर सो गया था। उस मासूम के गालों पर लुढ़की आँसू की बँूदें अभी भी सूखी नहीं थी । उसने अपने पुत्र के शापित माथे पर वात्सल्य से बोझिल हाथ फेरा। इससे भी जी नहीं भरने पर उसने उसे अपने अंक में समेट लिया और आँचल से उसे ढँंक दिया। माँ के तन की तपिश में मुन्ना कुछ देर कुनकुनाने के बाद फिर से सो गया। फूलवती अपने भूत में खो गई। उसकी जीवन-पुस्तिका के पन्ने दर पन्ने खुलते चले गये । पता नहीं, कैसी फूटी क़िस्मत लेकर पैदा हुई थी वह। जन्म से ही दाने-दाने को मोहताज़ रही। ईश्वर ने शायद दुनिया के तमाम दुःख-दर्द उसी के मत्थे मढ़ दिये हैं, सोच-सोचकर उसके दिल में पल-प्रतिपल नये-नये घावों का जन्म होने लगा, जिनकी पीड़ा के अहसास से उसका मुँह बिगड़ने लगा।
उसका श़्ाराबी बाप, लड़की जनने के अपराध में उसकी माँ को मारता-पीटता था। उसकी माँ बेचारी चुपचाप सहती रहती, इतने पर भी उसके बाप का जी नहीं भरा, और उसने लाख मिन्नतों के बावज़ूद उसे घर से बाहर निकाल दिया। उसके बाद माँ का कुछ पता नहीं चल पाया। कुछ दिनों बाद ही जात-समाज के लोगो को भात खिलाकर उसका बाप दूसरी औरत बना लाया। सौतेली माँ से तो अपनेपन की उम्मीद करना ही बेक़ार था। उसने आते ही उस पर ज़़ुल्म ढाने शुरू कर दिये। उससे घर के सारे काम कराये जाते। दिन भर खटती रहती बेचारी। कालचक्र अपनी गति से घूमता रहा। इस बीच उसकी सौतेली माँ ने एक बेटे को जन्म दिया। कितनी ख़ुश हुई थी वह, एक छोटे भाई को पाकर...उसे पढ़ने-लिखने का कितना शौक था, पर भाई की देखभाल करने के लिये उसका नाम स्कूल से कटवा दिया गया। वह यह सोचकर अपना दर्द पी गई कि, आख़िर है तो उसका भाई ही। बेचारी फूलवती रिश्तों की माया में उलझी हुई अपने भाई को दिनभर छाती से चिपटाये फिरती रहती।
कुछ सालों बाद ही उसके बाप ने उसे एक श़्ाराबी के पल्ले बांध दिया, और अपना सामाजिक दायित्व निभा लिया । उसका पति रोज़ रात को श़्ाराब पीकर घर आता, और उसे मारता-पीटता । शादी के साल भर बाद मुन्ने का जन्म हुआ । ज़िन्दगी ऐसी ही घिसट-घिसट कर चलती रही । हद तो तब हो गई, जब उसका पति बाज़ारू औरतों को घर लाने लगा । उसे अपने आप पर घिन्न सी होने लगी । उसे अपनी सारी देह में कीड़े रेंगते से प्रतीत होते, पर ज़िन्दगी जिये जाने की विवशता में वह रोज़ मर-मरकर जीती रही । समय की छाती पर उसकी पीड़ा भरी यात्रा चलती रही, पर उपर वाला शायद इतने पर भी संतुष्ट नहीं था, कुछ ही दिनों बाद उसका वह नाममात्र का औपचारिक पति ज़हरीली शराब पीने से मर गया । अब तो वह पूरी तरह से निस्सहाय हो गई । अपने मुन्ने को साथ लेकर वह यह सोचकर कि सौतेला ही सहीं, है तो भाई ही, वह उसके घर चली आयी । उसके मन में यह भी विचार आया, कि भाई के घर पर उसे कम से कम छाया तो नसीब हो ही जायेगी । अपने और मुन्ना के लायक़ तो वह कमा ही लेगी । भाई के घर पहुँचने पर उसके भाई की जा़ेरू ने उसे दुत्कार दिया । उसने काफी हाथ पैर-जोड़े । अपने भाई को छुटपन में सूखी छाती की गरमी का वास्ता दिया, पर वह हलकट, खामोश ही रहा।
भाई के घर से निकलकर वह कुछ दिनों पहले ही यहाँ आई थी। यहाँ उसे घर सें बाहर अकेली स्त्री की पीड़ा का अहसास होने लगा था। लोगों की नज़रों की गहराईयाँ उसके सारे शरीर को भेदती हुर्ह निकल जाती। उसे पास ही एक ईंट भट्टे में काम मिल गया था। पन्द्रह-पन्द्रह दिनों में तनख्वाह मिलने की बात थी। मालिक ने स्पष्ट तौर पर कह दिया था कि, पन्द्रह दिन पूरे होने पर ही पैसे मिलेंगे, और इसी बीच दीपावली की ये रात आ गई। आज घर में सुबह के बनाये भात के पेज के अतिरिक्त कुछ नहीं था। उसके अंदर उमड़ती-घुमड़ती बेबसी से वीराना गहराने लगा था। दूसरों को पटाखे छुड़ाते देख मुन्ना भी पटाखे खरीदने की ज़िद करने लगा। उसने मुन्ने को बहलाने की बहुत कोशिश की पर वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। अपनी विवशता की अग्नि में जलती हुई फूलवती ने आख़िर उसके गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया। वह काफ़ी देर तक सिसकियाँ ले-लेकर रोता रहा। उसने अपने मुन्ने से कल पटाखे खरीद कर देने का वादा कर दिया, लेकिन उसे अब यह सोच-सोचकर दहशत सी होने लगी कि, कल वह मुन्ने को क्या जवाब देगी। वह इसी उधेड़बुन में लगी हुई थी, कि अचानक कुछ सोचकर उसके होंठो के कोष्ठक फैलने लगे और उसके चेहरे पर मुस्कान उग आई। अब उसे पहट की प्रतीक्षा थी। वह बड़ी ही बेसब्री से पहट का इंतज़ार करने लगी। इंतज़ार की घड़ियाँ बमुश्किल कटती हैं। उसे समय की कछुआ चाल पर गुस्सा आने लगा, आख़िरकार वह उद्विग्न होकर उठ बैठी, और जिस बोरे पर वह सोई हुई थी, उसे लेकर बाहर निकल पड़ी।
बाहर चारों ओर वीराना पसरा हुआ था। दूर कहीं पर कभी-कभार पटाखे छुड़ाये जाने की आवाज़ें आ जाती थीं। बाहर अन्धेरे में नींद से बोझिल वृक्ष किसी दैत्य की भाँंति प्रतीत हो रहे थे । हवाओं में धरती की महक़ फैली हुई थी, और सड़क पर ओस की चादर बिछी हुई थी । अपनी धुन में चलती हुई वह, जल्द ही एक रिहायशी बस्ती में पहुँच गई। उसने जल्दी-जल्दी अधजले और अफूटे पटाखों को चुना, और तेज़ गति से अपने साथ लाये बोरे में उन्हें भरने लगी। पटाखे ओस से भीगे हुए थे। उसने सोचा कि कल दिन भर पटाखों को धूप में रखने पर शाम तक ये मुन्ने के फोड़ने लायक़ हो जायेंगे। इतने ढेर सारे पटाखों को पाकर कितना खुश हो जायेगा वह। अपने मुन्ने की भोर के उजाली सी मुस्कान की कल्पना कर वह पुलकित हो उठी।
पर्याप्त मात्रा में अपने बोरे में पटाखे भर लेने के बाद उसने उसके मँुह को कस कर पकड़ लिया, और घर की ओर लौट पड़ी। उसने उपर की ओर देखा आकाश तारों से पटा पड़ा था। उसका जी चाहा कि वह इन तारों को चुनकर अपने मुन्ने के लिये एक हार बना ले। अपनी जागती आँखों में स्वप्न संजोये वह कुछ ही दूर चल पाई थी कि, पीछे से अनियंत्रित गति से चली आ रही किसी रईसज़ादे की गाड़ी के नीचे आ गई। नीरवता में उसकी चीखें गाड़ी के पहिये के साथ दूर तक घिसटती चली गयी। थोड़ी देर तड़पन के बाद वहीं पर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। दुर्घटना के चश्मदीद खंभे काँप उठे। सड़क हाहाकार कर उठी । एक अप्रमेय सी उदासी निर्मित हो गई चारों ओर ।
सुबह लोगों ने ओस से भीगी हुई उसकी लाश देखी। उसने अब भी बोरे का मुँह कसकर पकड़ रखा था । तमाशाबीन अलग-अलग कयास लगा रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे कि, इतनी रात गये सड़क में कोई चोरनी ही घूमेगी...। देखो भला उसने अभी भी चोरी के माल से भरे उस बोरे को कैसे कसकर पकड़ रखा है। कुछ लोग खुद को संवेदनशील प्रमाणित करने के लिये उस अदृश्य गाड़ी चालक को कोसने की औपचारिकताएँ निभा रहे थे, पर उस लाश की पथराई आँखों में अपने मुन्ने की ख़ुशियों के लहराते स्वप्न को कोई भी नहीं पढ़ पा रहा था।
                                  तमसो मा ज्योतिर्गमय
वह तेरह-चैदह वर्ष का मंटू सोफ़े पर बैठकर अपने दोनों हाथों में सर टिकाये ध्यान से अपनी मम्मी को मेकअप करते हुए देख रहा है, और सोच रहा है कि, मेरी इतनी सुंदर मम्मी को भला ये दुनियाभर के पाउडर और क्रीम लगाने की क्या आवश्यकता है। मेकअप करने के बाद मम्मी कितनी भौंडी लगती है । शायद आज भी किसी के घर पर किटी पार्टी है। एक बार गया था, अपनी मम्मी के साथ वहाँ...। सभी लोग वहाँ सिर्फ़ दिखावा करने के लिये आते हैं। उसे तब बड़ा बुरा लगा था, जब वहाँ उपस्थित हर महिला उसके गालों की दुश्मन बन गई थी। कोई उसके गालों की चिमटी काट रही थी, तो कोई किस कर लिपिस्टिक से गालों को गंदा कर रही थी...। ये सब कितना भद्दा लगता है... छी ! उसके विचारों की शृंखला तब टूटती है, जब उसे अपनी मम्मी का स्वर सुनाई पड़ता है। लिपिस्टक लगाते-लगाते मम्मी पूछ रही है-मंटू व्हाट्स गोइंग आॅन ? और वह जवाब देता है-कुछ नहीं ममा।
मैंने तुमसे कितनी दफ़ा कहा है कि हमेशा इंग्लिश में ही बातें किया करो, लेकिन तुम हो कि बस...। नेल पाॅलिश लगाती हुई मम्मी नाराज़गी से कहती है।
साॅरी ममा, आईल टेक केयर। मंटू सहमा सा जवाब देता है।
दैट्स गुड। कहकर मम्मी फिर से मेकअप में लग जाती है।
मंटू को अचानक अपनी दादी का वो कथन याद आ जाता है। दादी पड़ोस में गुड्डू की दादी से कह रही थी, कि हमार बहुरिया तो अपन फिग़र बिगड़े के भय से मंटू के दूध नहीं पिलाईस्। तो क्या उसकी रगों में पाऊडर दूध बहता रहा...? उस दिन के बाद से उसे न जाने क्यूँ, मम्मी पराई सी जान पड़ रही है। उसे सबसे ज़्यादह आश्चर्य तब होता है, जब इतना सब होने के बाद मम्मी उसे ‘सिंपल लिविंग एण्ड हाई थिकिंग’, की घुट्टी पिलाती है ।
मंटू के समृति-पटल पर दृश्य बदलता है। उसे अपने व्यस्त पिता याद आते हैं, जो हमेशा ही हड़बड़ी में रहते हैं। खाना भी अधिकतर वे खड़े-खड़े ही खाते हैं। कभी-कभी तो वे कार की स्टीयरिंग पर बैठे-बैठे ही स्नैक्स और वेफ़र्स से काम चला लेते है। वे केवल सण्डे ही फ्री रहते हैं, जिसे वे सोकर गुजारते हैं। इस दौरान उनका स्ट्रीक्ट निर्देश होता है कि, कोई भी उन्हें डिस्टर्ब न करें । पिछले सण्डे उन्होने स्पष्ट निर्देश दे रखा था कि, पड़ोस के शर्मा अंकल आये तो उन्हें कह देना की पापा घर पर नहीं है। साला चिपकू जाने का नाम ही नहीें लेता है। शर्मा अंकल के आने पर उसने कह दिया कि, पापा यह कहकर सोये हैं कि पड़ोस के शर्मा अंकल आयें तो उनसे कह देना कि पापा घर पर नहीं है। शाम के पापा के जागने पर उसने बड़े ही उत्साह से अपने द्वारा कही गई बातें बतलाई, जिस पर पापा ने अपना सर पीट लिया और लगे कोसने-मण्टू तुममें ज़रा सा भी काॅमनसेंस नहीं है...। शर्माजी के साथ मेरे व्यावसायिक संबंध हैं, जो अब ख़तरे में पड़ जायेंगे। अभी पिछले दो चार-दिनों पहले की ही तो बात है, जब पापा दादी को किसी उपनिषद् में लिखा हुआ वाक्य सुना रहे थे कि ‘‘सत्यमेव जयते’’ अर्थात् सत्य की ही जीत होती है। वह ये नहीं समझा पाता है कि, जब सत्य की ही जीत होती है, तो उसे सच बोलने पर डाँट क्यों पड़ी ? वह ये सोच-सोचकर उद्विग्न हो जाता है, और अपना मन लगाने के लिये टी.वी. आॅन करता है। टी.वी. स्क्रीन पर समुद्र के अंदर मूंगे की चट्टानें नज़र आ रहीं हैं, और उन चट्टानो के बीच में से गुजरती रंग बिरंगी मछलियाँ भी...। अहा ! कितना सुंदर है ये सब कुछ । शायद डिस्कवरी चैनल लग गया है। अच्छे शिक्षाप्रद कार्यक्रम आते हैं इस चैनल पर। स्कूल में टीचर्स हमेशा ही इसी चैनल को देखने को कहते हैं। अचानक उसके विचारपटल पर स्कूल का दृश्य उभर आता है। कितना आलीशान स्कूल है उसका। कितनी मुश्किलों से तो एडमिशन हुआ था उसका। पापा, मम्मी को बता रहे थे कि पूरे बीस हज़ार रूपये देने पड़े डोनेशन के रूप में, तब कहीं जाकर एडमिशन हुआ था उसका। इसके अलावा अतिरिक्त ट्यूशन पढ़़ने और स्कूल की ही दुकान से स्टेशनरी लेने की शर्तें अलग से थीं। उसे अपने प्रिंसीपल के कमरे की दीवारों पर लिखी हुई सूक्तियाँ याद आने लगीं-‘‘विद्या ददाति विनयम्’’ ‘विद्या चरित्र का निर्माण करती है,’ और न जाने क्या-क्या, हिन्दी और अँगरेज़ी के कोटेशन लिखे हुए हैं। अँगरेज़ी के कई क़ोटेशन तो उसके पल्ले ही नहीं पड़ते हैं।
अब वह कल्पना से यथार्थ में उतर आता है। वह व्यर्थ चलती टी.वी. को आॅफ़ कर देता है, और पास ही सेंटर टेबल पर पड़ी हुई ‘पोकेमाॅन‘ काॅमिक्स में मन लगाने की कोशिश करने लगता है, और सोचने लगता है कि लोग भी न जाने कैसे-कैसे हीरो गढ़ लेते हैं। उसे तो इन काॅमिक्सों में ज़रा भी रूचि नहीं है। यह काॅमिक्स तो उसके बर्थ-डे पर दुबे आँटी ने गिफ़्ट किया था, सो वह वहीं पड़़ी हुई थी। उसे तो प्रेमचंद की कहानियाँ पसंद हैं। मम्मी का कहना है कि, क्या गंवारों जैसी कहानियाँ पढ़ते हो...? पढ़ना ही है तो, गुलीवर्स ट्रेव्हल्स पढ़ो। मम्मी उसे हमेशा इंग्लिश क़िताबें ही खरीद कर देती हैं। प्रेमचंद की क़िताबें तो वह अपनी पाॅकेट-मनी से खरीदता है। आजकल न जाने क्यँू वह अपने आप में ही खोया रहता है। मम्मी कहती हैं, क्या मनहूसों जैसी शक्ल लिये फिरते हो। कुछ लोग कहते हैं कि वह कम उम्र में ही मैच्योर हो गया है। वह तो सादग़ी से रहना चाहता है, उसे दिखावे से नफ़रत है। वह फिर से सोचने लगता है कि कौन मम्मी-पापा को सत्य का अर्थ समझायेगा, कौन मम्मी में पनपी असुरक्षा की भावना को दूर करेगा, क्या तमसो मा ज्योतिर्गमय कहने मात्र से काम चल जायेगा ? नहीं ! कभी नहीं...। ये सूक्तियाँ क़िताबों में ही ठीक हैं ।
                               
 यक्ष प्रश्न
यक्ष - युधिष्ठिर, मुझे यह बताओ कि हमारे वर्तमान जनप्रतिनिधि जुअॅारी क्यों हंै ?
युधिष्ठिर - वे जुआॅरी इसलिये हैं, क्योंकि राजनीति स्वयं एक जुआॅ है । चुनाव में वे लाखों-करोड़ों रूपये दाँव पर लगाते हैं, और जीतने पर अपनी सात पीढ़ियों के लिये कमा लेते हैं ।
यक्ष - अब ये बताओ कि वे गैंगवार करते और कराते क्यों हैं ? जबकि इस चक्कर में वे हत्यारे तक बन जाते हैं ।
युधिष्ठिर - शक्तियों में संघर्ष का ही दूसरा नाम राजनीति है, और वर्तमान दौर में यही संघर्ष गैंगवार कहलाता है। चूँकि हाथ में आये शत्रु को छोड़ देना पराजय है, सो वे शत्रुओं की हत्या कर हत्यारे भी बन जाते हैं ।
यक्ष - बिल्कुल सही। अब ये बताओ वे श़्ाराबी क्यों हैं ?
युधिष्ठिर - चँूकि सत्ता में ही श़्ाराब का नशा होता है, इसलिये वे श़्ाराबी जैसे लगते हैं। इसमें उनका कोई क़सूर नहीं है ।
यक्ष - ठीक। पर वे सीना ठोककर खुद को शैतान सिद्ध करने की कोशिश क्यों करते हैं ?
युधिष्ठिर - चूँकि राजनीति साधुओं के लिये नहीं है, अतः उन्हें ऐसा करना ही पड़ता है।
यक्ष - अच्छा ये बताओं जहाँ एक आम आदमी का आत्मविश्वास झूठ बोलते समय डगमगा जाता है, वहीं ये बड़े ही आत्मविश्वास से धाराप्रवाह झूठ कैसे बोल लेते हैं ?
युधिष्ठिर - चूंकि सच को झुठलाना और झूठ को सचलाना ही व्यावहारिक राजनीति है, सो ये नेतागण व्यावहारिक राजनीति कर रहे हैं ।
यक्ष - आजकल नेतागण अधर्मी क्यों हो गये हैं ? जबकि तुम्हारे दौर में धर्म की महत्ता सर्वविदित थी ।
युधिष्ठिर - चूँकि हमारे यहाँ धर्मनिरपेक्षता की डफली बज रही है, ऐसे में किसी एक धर्म का पालनकर्ता होना धर्म निरपेक्षता की सेहत के लिये घातक है, और चूँंकि सर्वधर्मी होना हर किसी के बस की बात नहीं है, सो उनका अधर्मी होना जायज़ है।
यक्ष - यहाँ ये बात तो समझ में आती है, पर नेतागणों का वेश्यामामी होना समझ से परे है ।
युधिष्ठिर - चूँकि राजनीति ही एक वेश्या है, ऐसे में वे वेश्यागामी हो ही गये ।
यक्ष - कहीं ऐसा न हो कि राजनीति के चलते उनको या उनके चलते राजनीति को एड्स हो जाये ।
युधिष्ठिर - इस विषय पर मै सिर्फ इतना ही कहूँगा...आगे आगे देख होता है क्या।
ड्रामेबाज
मैंने एक सरकारी काॅलोनी में मकान खरीदा था। दो कमरों और किचन युक्त छोटा सा मकान था। वह काॅलोनी मुख्य सक से काफी अन्दर थी, इसलिए वहां बसाहट हो नहीं पा रही थी और काॅलोनी के मकान खाली पड़े हुए थे। कुछ लोगों ने तो इन्वेस्टमेंण्ट के हिसाब से वहां मकान खरीद रखा था, पर चूंकि बसाहट हो नहीं पा रहा रही थी, सो मकानों के मूल्यों में वृध्दि नहीं हो रही थी, और उनके लिए ये मकान घाटे का सौदा साबित हो रहे थे। मैंने भी उस काॅलोनी में मकान लिया था और काॅलोनी के बसने के इंतजार में था। मैंने वह मकान अपनी जरूरत के लिये खरीदा था, पर चूंकि वहां इक्का-दुक्का लोग ही बसे थे सो मैं वहां शिफ्ट होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उस काॅलोंनी में हमेशा ही सन्नाटा पसरा हुआ रहता था। इस इस बीच मैं उस काॅलोनी की बसाहट के बारे में लोंगो से पता करता रहता। एक दिन मुझे पता चला कि मेरे सेक्टर में चार-पंाच लोग बस गये है और समें एक दलित परिवार रहने आया है। यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई कि उस परिवार का मुखिया पास के किसी काॅलेज में विज्ञान का प्रोफेसर है। मैं अब अपने उस घर में शिफ्ट होने का सोचने लगा। एक बार मैं उनसे मिलने पहंुचा तो उन्होंने बड़े  ही गर्म जोशी से मेरा स्वागत किया और कहने लगा कि आप जल्द से जल्द अपने घर में शिफट हो जाये फिर हम बैठकर बौध्दिक चर्चाएं करते रहेंगे। पहली बार उनसे मिलकर मैं उनसे बेहद प्रभावित हुआ। उनसे विदा लेते हुए मैंने ठान लिया कि अब अपने घर में शिफ्ट हो जाना ही चाहिए। पास में हमारे  एक विद्वान दलित भाई तो है ही तो। हम दलित विमर्श पर खूब चर्चा करेंगे। घर पहंुचकर मैंने अपनी श्रीमती से कहा कि अब हमें वहां अपने घर में तुरन्त ही शिफ्ट हो जाना चाहिए इस पर श्रीमती जी ना नकुर करने लगी और कहने लगी कि अपनी बच्ची बड़ी होती जा रही है ऐसे में हम उस सुनसान काॅलोनी में जाने का रिस्क नहीं ले सकते पर मुझे तो अपने उस दलित पड़ोसी ने पहली मुलाकात मे ही इतना प्रभावित कर दिया था कि मैं एक तरह से उसका अंधभक्त बन चुका था। मैंने कहा कि यदि सभी लोग उस काॅलोनी में बसाहट का इंतजार करते रहे तो काॅलोनी तो बसने से रही। आखिर बसने की शुरूआत का रिस्क तो किसी न किसी को लेना ही पड़ेगा, और फिर हमारे सेक्टर में तो पांच परिवार बस भी चुके हैं। ऐसे में हमें वहां बहुत ज़्यादह समस्याएं नही होंगी। और फिर हमारे पड़ोसी प्रोफेसर साहब ने आश्वस्त किया है कि हमें किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी। वे हमारा पूरा सहयोग करेंगे। पत्नी अब भी आशंकित थी और तैयार नहीं हो पा रही थी। सो मैंने सकी दुखती रग पर हाथ रखते हुए कह दिया कि अपना खुद का घर होते हुए भी हम तीन-चार सालों से किराये से रह रहे हैं। हम यदि अपने घर में शिफ्ट हो जाते हंै तो मकान किराये की शुध्द बचत हो जायेगी, जो हमारे काम आयेगी। मेरी यह बात असर कर गई और पत्नी भी तैयार हो गई। अगले ही रविवार हमने शिफ्टििंग का प्लान बना लिया। अपने खुद के घर में रहने में रहने की पुलक और एक दलित विद्वान की संगत की कल्पना से मैं बेहद रोमांचित था। आखिर रविवार आ गया और हम अपने घर में शिफ्ट हो गये। हमारे वो पड़ोसी दलित जाति के थे पर उनका सरनेम चतुर्वेदी था यह सरनेम आमतौर पर ब्राम्हनों का होता है। उनका का एक लड़का और एक लड़की थे। उनकी लड़की मेरी बच्ची से तीन साल बड़ी थी। जबकि लड़की बड़ी और दसवी कक्षा में पढ़ता था। उन्होंने हमें खाने पर बुलाया था। हमने खाना खाया तो महसूस हुआ खाना एकदम फीका सा है। उसमें मसाले बिल्कुल भी नहीं थे। और ऐसा लग रहा था कि सब्जियां उबाल कर परोस दी गई है। खैर हमें लगा कि शायद डाॅक्टर ने उन्हें इसी तरह का खाना खाने की सलाह दे रखी हो। खैर हम खाना खाकर हाथ धोने को ठें वाॅश बेसिन दोनों कमरों के बीच मे था। हाथ धोते-धोते अचानक मेरी नज़र उनके अन्दर कमरे में पड़ा। वहां पर बहुत बड़ी साईज की फ्रेम की हुई एक बाबा की तस्वीर दिखी। और उसके बिल्कुल सामने फ्रेम की हुई एक दूसरे बाबा की तस्वीर भी दिख गई। ये दोनों ही बाबा इन दिनों जेल में बलात्कार के आरोप में बन्द थे। इन बाबाओं की तस्वीर देखकर मेरा माथा ठनका। एक तो दलित दूसरे विज्ञान के प्रोफेसर ऐसे बाबाओं के भक्त हो सकते है यह अकल्पनीय था। मेरा सारा उत्साह ठण्डा हो चुका था। तो भी मैंने प्रोफेसर साहब से इस संबंध में कोई बात नहीं की।
      अब तक हमें अपने नये घर में पूरी तरह सैट हुए एक सप्ताह हो चुके थे। प्रोफेसर साहब रोज शाम हमारे घर आते। मैं और वे बाहर कुर्सियां निकालकर बैठ जाते। मैंने महसूस किया कि प्रोफेसर साहब दलित मुद्दे पर किसी तरह की बात खुद से नहीं करते थे उलटे मेरे द्वारा पहल किये जाने पर वह विषय बदल देते थे और काॅलोनियों में रहने वालों की निजी जिन्दगी से जुड़े किस्से बताने लगते कि फलां की लड़की भाग गई, तो उसकी पत्नी के किसी अन्य पुरूष के साथ संबंध हैं। फलां का लड़का चोर है और वह चोरी के पंप बेचा करता है। फलां आदमी दलाली करता है और जवां लड़के लड़कियों को किसी भी खाली कमरे की चाबी पांच सौ रूपये लेकर दे देता है। मुझे उनकी बाते बोर करनेे लगी। कुछ दिनों बाद वे एक अलग तरह की चर्चा करने लगे कि दुनिया में जो भी घटनाएं घट रही हैं, वही ड्रामा है यह रिपीट होने वाला ड्रामा है। हम सारे तो कठपुतली हंै। हमारा कण्ट्रोल उपर वाले के हाथ में है। वह जो चाहता है वहीं होता है। हम दलित इसलिये हैं। वह जो चाहता है, वही होता है। हम दलित इसलिए है क्योंकि हमने पिछले जन्मों में बहुत से पाप किये है। उनकी यह विचित्र फिलाॅसफी मुझे कोरी बकवास लगने लगी। धर उनकी पत्नी मेरी धर्मपत्नी के पास आकर एक अलग ही तरह की फिलासफी बघारती। वह राधेकृष्ण के प्रेम में मगन होकर नाचने की बात कहती। उनकी बकवास धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। इस बीच हमने ध्यान दिया कि वे अपने घर तो हमें चाय-नाश्ता कराते, लेकिन हमारे घर का पानी भी नहीं पीते हंै। चाय-पानी सामने लाने पर वे दोनों पति-पत्नी हाथ जोकर मना कर देते है। उनका इस तरह से करना मुझे बेहद अपमान-जनक लगता। एक दिन मैंने चिढ़कर उनसे पूछ ही लिया-क्यों प्रोफेसर साहब? क्या आप हमसे छुआ मानते हैं? इस पर उन्होंने बताया कि हमारे बाबा का आदेश है कि किसी के भी घर कुछ खाना-पीना नहीं है। उनका कहना है कि शुध्दतापूर्वक जीवन जीने से आप ब्राम्हणों से भी श्रेष्ठ हो जाते हैं। हमारी पत्नी के बाबा भी दूसरों के घर खाने-पीने से बचने के लिए कहते हैं।
समय बीतता जा रहा था और हमें समझ में आने लगा था कि प्रोफेसर साहब वैचारिक रूप से  पूरी तरह दिवालिया हैं। अब उन दोनों पति-पत्नियों को झेल पाना हमारे लिये मुश्किल होता जा रहा था, सो हम अपने चेहरे के हाव-भाव से न्हें जताने लगे कि हमें उनकी बातें नापसंद है। उन्हें भी यह बात समझ में आ गई और वे भी हमसे दूरियां बनाने लगे। अब संबंध सिर्फ हाय-हैलो जल्दी चलो तक का रह गया था। इस बीच काॅलोनी में और भी लोग रहने आ गये थे। उनमें से एक हमारे मित्र तिवारी जी भी थ,े जो प्रोफेसर साहब के काॅलेज में ही क्लर्क थे। वे मुझसे कहने लगे कि अरे प्रोफेसर साहब तो बड़े ही सात्विक प्रवृत्ति के व्यक्ति है। काम-क्रोध मद मोह है। लोभ से एकदम अछूते। हमेशा ही ईश्वर के ध्यान में रहने वाले। अरे उनकी धार्मिकता का क्या कहना, वे तो गृहस्थ में रहते हुए भी सन्यासियों सा जीवन जीते है। वे तो अपना बिस्तर भी अलग रखते है। मतलब पत्नी के साथ नहीं सोते और खान-पान की शुध्दता के बारे में तो कहना ही क्या मांसाहार की बात छोड़िये वे तो लहसुन-प्याज जैसी तामसिक वस्तुओं का नाम भी नहीं लेते वाकई में वे एक आदर्श व्यक्ति हंै। तिवारी जी के द्वारा प्रोफेसर साहब की शान में पढ़े गये कसीदे ने मेरे तन-बदन में आग़ लगा दी मेरा जी चाहा कि मैं तिवारी जी से कहूं कि तुम्हारें द्वारा रचित ढोंग को आंख मूंदकर जो माने वो आदर्श है और जो तर्क के द्वारा आपके पाखण्ड को खारिज करे वह कतर्क करने वाला कहलाए। खैर तिवारी ने मुझे उकसा दिया था और मैंने शालीनता के साथ कहा तिवारी जी मुझे तो ये कर्मकाण्ड ढोंग लगते है। आदमी एक सामाजिक प्राणी है और उसे व्यावहारिक होना ही होता है। और आपके प्रोफेसर साहब निहायत ही अव्यावहारिक किस्म के आदमी हंै।
  खै़र अब हमारे और प्रोफेसर साहब के बीच सिर्फ़ औपचारिक संबंध भर रह गये थे। हां उनके बच्चे जरूर हमारे घर आते-जाते रहते। आॅफ़िस के काम से कई बार मुझे सुबह जागकर काम करता होता था, मैं चार बजे सुबह का अलार्म लगाया करता था, लेकिन मेरी नींद प्रोफेसर साहब के घर पर सुबह साढे़ तीन बजे होने वाली खटर-पटर से ही खुल जाती। कभी उनके घर भजन की आवाज आती तो कभी पति-पत्नी के बीच चीं आवाज़ में बातें करने की। फिर किचन में खाना बनाने की आवाजें आने लगती थी। मुझे बड़े ही आश्चर्य होता था कि प्रोफेसर साहब काॅलेज तो बारह बजे जाते हंै, और उनकी पत्नी तो हाउस वाईफ है फिर इतनी सुबह से ठकर ये लोग करते क्या हैं यह जिज्ञासा मेेरे मन में बहुत दिनों से थी। फिर मैं देखता कि वे दोनो पति-पत्नी सुबह पांच बजे से कहीं जाने के लिये निकल जाते। उनके बच्चे अन्दर सोते रहते और वे दोनो लोहे के गेट पर ताला लगाकर कहीं निकल जाते। वे दोनों ही पति-पत्नी रहस्यमय व्यक्ति के स्वामी थे एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने गर्व से बताया था कि हम दोनों पति-पत्नी अलग-अलग बाबाओं के आश्रम में ध्यान करने जाते है। हमारा तो सारा खानदान ही आध्यात्मिक है। उन्होंने कहा कि धोकर पूजा-पाठ करके पढ़ने बैठ जाते है। हमने ज्यादह लोगों के संपर्क में नहीं रहते हैं मैं यही देखता कि उनके बच्चे नौ बच्चे स्कूल के लिये निकलते। उनकी बच्ची को तो मैंने दो-चार बार आवारा लड़कों के साथ भी देखा था। उनके द्वारा ऐसा कहे जाने पर मुझे भी आ गई उनका बेटा बहुत ही सीधा-साधा था लेकिन उनके घर में लहसुन प्याज वाली मसालेदार सब्जियां नहीं बनती थी सो वह मसालेदार सब्जियां नहीं बनती थी सो वह मसालेदार सब्जियां खाने के लिये लालायित रहता था। वह हमारे घर में बनी तरकारी को बहेद पसंद करता था। वो जैसे ही हमारे घर आता उसके मां-बाप पंाच-दस मिनट बाद ही आवाज़ देकर से बुला लेते थे। उन्हें कतई यह पसंद नहीं था कि उनका बेटा लहसुन-प्याज जैसी तामसिक वस्तुओं का सेवन करे। हमें उनके बच्चें पर तरस आता था, लेकिन हम कर भी क्या सकते थे। यह उनका नितांत ही निजी मुआमला था। सकी इच्छा को देखते हुए हम जल्दी से ही से सब्जी-रोटी खिला देते थे। धीरे-धीरे अब वह बड़ा होने लगा था। अब से इस तरह के फालतू बंधन कतई स्वीकार्य नहीं थे। धर प्रोफेसर साहब को लगने लगा कि हम नके लके को बिगा रहे हैं और न्होंने अपने बच्चे को हमारे घर आना लगभग बंद सा करा दिया। अब जब उसके मां-बाप घर पर नहीं होते तभी वह हमारे घर आता था। अब उसके अन्दर की छटपटाहट हमें स्पष्ट महसूस होने लगी थी। एकाध बार उसने हमसे अण्डे की तरकारी खिलाने का कहा लेकिन हमने मना कर दिया मसालेदार शाकाहारी सब्जियों तक तो ठीक था लेकिन हम यह कतई नहीं चाहते थे कि सके माता-पिता यह कहे कि हमने नके बेटे को मांसाहारी बना दिया है। ख़ैर वह अण्डें के ठेलों में अण्डें खाता हुआ हमें कभी-कभी दिख जाता था। वह हम दोनो पति-पत्नी को अपना बेहद करीबी मानता था। अब वह काॅलेज़ पहंुच चुका था। काॅलेज़ के साथियों के बारे में वह मुझसे सारी बातें बताया करता था। एक तरह से वह मेरा मित्र ही बन गया था।
इस बीच प्रोफेसर साहब की पुत्री के बारे में काॅलोनी में खुसुर-फुसुर शुरू हो गई थी कि वह आवारा लड़कों के साथ घूमती रहती है। काॅलोनी के कुछ लोगों ने प्रोफेसर साहब को बताने की कोशिश की थी पर उन्होंने उलटे उन पर भड़कते हुए कहा था कि आप अपना घर संभाले। उनकी इस तरह की बदतमीजी भरी बाते सुनकर लोग धीरे-धीरे उनसे कन्नी काटने लगे थे वे और उनका परिवार काॅलोनी में एक दम अलग-थलग सा पाया गया था। मेरे साथ भी उनकी हाॅय-हैलो भी सिमट गई थी। अब जब अचानक सामना हो जाता था, तभी हाॅय-हलो हो जाती थी। उनकी लड़की के बारे में परिचित लोग बताते कि यह एक नंबर की चोर है। मोबाईल चोरी करने में वह एकदम सिध्दहस्त है। नगद भी पार कर देती है और उसको देखकर लोग सतर्क हो जाते है। चोरी के पैसे से वह अपने ब्याय फ्रेण्ड्स को ऐश कराती है।
उनकी लड़की 18 वर्ष की होते ही एक शादी-शुदा आॅटो डाईव्हर के साथ भाग गई। यह बेहद ही अपमानजनक बात थी। मुझे लगा प्रोफेसर साहब को अब तक अपनी ग़लती का अहसास हो चुका होगा कि आश्रमों में जाने की बजाय गृहस्थ आश्रम को ही ठीक तरीके से जीना चाहिये। अपने बच्चों की तरफ पूरा ध्यान देना चाहिये। इतनी बड़ी घटना घर जाने के बाद भी मैं देखता दोनों पति-पत्नी के चेहरे में शिकन तक नहीं है। मुझे लगा ये लोग अन्दर से पक्के तौर पर दुःखी होंगे, भले ही बाहर जाहिर न करें। सबसे करीबी पड़ोसी होने के नाते मेरे अन्दर ये यह आवाज लगातार आ रही थी कि मैं नसे सहानुभूति के दो बोल बोलूं। सो एक दिन मैंने नसे कहा आजकल के बच्चे जरा भी नियंत्रण में नहीं रहते है। मां-बाप की इज्जत को तो वे सड़कों में उछाल देते हैं। वाकई बड़े बुरे दिन आ गये है। वे शांति से मेरी बात सुनते रहे और फिर कहने लगे कि इस दुनिया में जो घट रहा है, वह सारा का सारा पूर्व नियोजित है। यह एक किस्म का ड्रामा है, जो बार-बार रिपीट होता है। ऐसा कहते हुए वे चले गये। इधर मैं सोचने लगा कि यदि सबकुछ ड्रामा के अनुसार ही होना है, तो भला कर्म करने की जरूरत ही क्या है?
    उधर उनका लड़का आगे की पढ़ाई करने के लिये दिल्ली चला गया था। वह फेसबुक और व्हाट्सप के माध्यम से मुझसे जुड़ा हुआ था। दूर रहकर भी वह मेरे बेहद करीब था। उसके पिता के उम्र का होने के बावजूद हम बेहद मित्रवत थे। हालांकि कुछ मुआमलांे में उसने अब भी संकोच कायम रखा हुआ था। एक दिन सने मुझसे घुमा-फिराकर अंतर्जातीय विवाह के बारे में पूछा। हालांकि मैं समझ गया कि वह किसी दूसरी जाति की लड़की से अंतरर्जातीय विवाह करना चाहता है, लेकिन मैंने उसे बिल्कुल ही नहीं छेड़ा और अंतरजातीय विवाह के बारे में वह जो-जो पूछता गया मैं बताता गया। कुछ महीनों बाद उसने कोर्ट मैरिज करने या मंदिर में शादी करने पर वैधता के बारे में पूछा। अब तक मैं पूरी तरह समझ चुका थां कि वह किसी लड़की से प्रेम करता है और उससे शादी करना चाहता है। इसमें कोई बुराई तो थी भी नहीं सो मैंने उससे मित्रवत स्पष्ट पूछा और यह भी आश्वस्त किया कि यह बात हम दोनो के बीच ही रहेगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर मैं खुद ही तुम लोगांे की शादी करा दूंगा। भले ही तुम्हारे मां-बाप मुझे अपना दुश्मन ही क्यों न समझने लगे।
वह मेरी बातों से आश्वस्त हुआ या नहीं मुझे नहीं मालूम। खैर उससे होती बातों से मैंने अंदाज़ लगाया कि वह अपने बाप से बेहद नफ़रत करने लगा ह,ै और मां के प्रति भी उसे कोई विशेष लगाव नहीं रह गया है। वह अब अपने घर से विद्रोह करने की तैयारी करने लगा है, लेकिन उसकी जैसी परवरिश हुई थी उसके हिसाब से न जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि सके व्यक्तित्व पर अपने बाप का इतना खौफ़ है कि वह विद्रोह करने में नाकाम हो जायेगा या फिर उसके विद्रोह को बलात् दबा दिया जायेगा। उसमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी। ख़ैर इस दौरान मैं अपने कामों में इतना व्यस्त हो गया कि सोशल मीडिया से मैं कट सा गया। वह भी अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया था। हमारे बीच संवाद कम हो गया था।  एक बार जब प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी दोनो अपने-अपने  आध्यात्मिक बाबा की यात्रा पर 10 दिनों के लिये गये बाहर गये हुए थे, उसी दौरान एक दिन उसने हमें उस लड़की से मिलवाया। वाकई में वह लड़की भी दलित ही थी पर प्रोफेसर साहब की जात स इतर जात की थी। मैंने फिर से उन्हें आश्वस्त किया कि मैं इस बारे में प्रोफेसर साहब से बात करूंगा और यदि वे नहीं माने तो तुम लोग कोर्ट मैरिज कर लेना मैं तुम्हारे साथ हूं। वह लड़की बेहद सभ्य और मिलनसार लगी। औपचारिक बात-चीत के दौरान ही हमने अंदाज लगा लिया कि वह दलित आंदोलनों की बुनियादी समझ रखती है। वह लड़की हमारे शहर की थी और सके पिता से मेरी जान पहचान भी थी। मैंने उन्हें चेताया था कि अभी अपने संबंधों के बारे में ज्यादह बातें न की जाये इस पर उसने कहा था कि मैंने अपने ताऊ के हम उम्र लड़के को बता रखा है। वह मेरा रिश्तेदार कम, दोस्त ज़्यादह है।
एक दिन अचानक प्रोफेसर साहब के घर पर उनके बहुत से रिश्तेदार नज़र आये। सबके चेहरों पर मातम पसरा हुआ था। कुछ महिलाओं के रोने की आवाजं़े आती थी। प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी दोनों ही घर पर नहीं थे। प्रोफेसर साहब के साले से साहब से मेरी मित्रता थी, वे दलित आंदोलनों से जुड़े हुए थे? उन्हें अपने घर के सामने बेचैनी से टहलते हुए पाया तो पूछ लिया। इस पर उन्होंने जो उत्तर दिया वह सुनकर मैं शाॅक्ड सा रह गया। उसने बताया कि प्रोफेसर साहब के लड़के ने दिल्ली में ही अपने हास्टल में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली है, और दोनो पति-पत्नी यह कहते हुए कि आत्मा तो चोला बदलती ही है इसमें क्या रोना कहते हुए कुछ रिश्तेदारों के साथ दिल्ली निकल गये हैं। वे वहीं पर उसका क्रिया-कर्म करके वापस आयेंगे। यह बताते हुए उसका गला रूंध सा गया। इधर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे थे। मुझे रह-रहकर उसकी बातें याद आ रही थी। मैं उस रात सो नहीं पाया। मेरे मन में उसकी खुदकुशी के कारणों को जानने की जिज्ञासा  भी थी। अगले दिन थो सहज होने पर मैंने प्रोफेसर साहब के साले को कुरेदा इस पर वह फटपटे् और अपनी बहन और जीजाजी दोनो को कोसते हुए बताने लगे कि मेरे भानजे के ये हत्यारे हैं। फिर उन्होंने विस्तार से बताना शुरू कर दिया कि प्रोफेसर साहब के भतीजे ने परिवार में यह बात लीक कर दी कि वह एक दूसरी जाति की लड़की से शादी करना चाहता है। बस फिर क्या था इन दोनों ने अपने बेटे को फोन लगाकर खूब भला-बुरा कहा और फिर क्षणिक आवेश में आकर उसने आत्महत्या कर ली। यह सुनकर अब मैं अपनी व्यस्तता को कोसने लगा था यह  इस दौरान मेरी, उनके बेटे के साथ संवादहीनता की स्थिति निर्मित हो गई थीं और मैं उसे माॅरल सपोर्ट नहीं दे पाया। खै़र अब कुछ नहीं हो सकता था। दो-तीन दिनों बाद प्रोफेसर दंपति वापस आ गये। उन्होंने किसी भी तरह की औपचारिकताओं के बगैर सभी रिश्तेदारों को रवाना कर दिया।
अब तक पूरी तरह बस चुकी काॅलोनी में मेरे सहित दो-चार लोगों को ही उनके बेटे की मृत्यु के बारे में पता था। वे दोनों पति-पत्नि फिर से अपनी दिनचर्या में ऐसे लग गय,े मानो कुछ हुआ ही न हो। उसका वही सुबह से आश्रम जाना फिर चालू हो गया। उनके चेहरों पर किसी किस्म की मायूसी नज़र नहीं आती थी। इधर मैं यह सोचता रहा कि शायद दोनों अपने चेहरे से दु:ख जताना नहीं चाहते होंगे। वरना इतने जवान लड़के की मौत पर कोई इतना सहज कैसे रह सकता है। मुझे लगा कि वे अन्दर से बेहद दुःखी होंग,े सो पड़ोसी होने के नाते यह मेरा फर्ज है कि मैं उनसे सहानुभूति के दो शब्द बोलंू। सो एक बार मैंने प्रोफेसर साहब से कहा कि मुझे आपके बेटे की मौत का बेहद दुःख है। इस पर उन्होंने कहा अरे मरना जीना तो लगा रहता है। आत्मा तो अजर-अमर है। वह तो शरीर रूपी चोला बदलती है। और हमारी जिन्दगी अपने-आप में एक ड्रामा है, और घटने वाली घटनाएं उसका हिस्सा होती हैं। ड्रामा में जो होना है, वो होकर रहेगा। मेरा और मेरे बेटे का इतने ही दिनों का साथ था। ये तो रीपिट होने वाला ड्रामा है, इसमें हम कर भी क्या सकते हैं। उसके ऐसा कहते-कहते मुझे लगने लगा कि एक हत्यारा अपनी सफाई में कह रहा हो- जनाब मकतूल तो खुद मेरे छुरे के सामने आ गया था। खैर इस बीच उसने ड्रामा-ड्रामा इतनी बार कहा कि मेरे दिमाग में ड्रामा शब्द पूरी तरह घर कर गया वापस लौटते हुए मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया -साला ड्रामेबाज़।
प्रकाश स्तम्भ
आज जब वर्तमान युवा पीढ़ी ने अपने-आपको मोबाईल-इण्टरनेट की दुनिया में भूला सा लिया है, सामाजिक सरोकार एवं संघर्ष जिनके लिये महज किताबी बातें बनकर रह गई हैं, जो नैतिक मूल्यों का सिर्फ ़मजा़क बनाना ही जानते हैं। युवा जो रियल लाईफ न जीकर वर्चुअल लाइफ जीना चाहते हैं। वे एक तरह से रियल लाईफ से पलायन ही कर रहे होते हैं। ऐसे में एक युवा द्वारा अपने जीवन में घटने वाली छोटी से छोटी घटनाओं से भी शिक्षा ग्रहण करना,अगम्भीर से अगम्भीर लोगों से भी प्रेरित होना, सामाजिक सरोकारों के प्रति पूर्णतः सचेत रहकर घोर निगेटिव वातावरण में भी पाॅजिटिविटी की तलाश कर लेना हमें यह आश्वस्त करता है कि हालात उतने भी बुरे नहीं हैं। आज हमें ऐसे ही युवाओं की जरूरत है जो जहाज रूपी समाज को दिशा देकर प्रकाशस्तंभ की भूमिका निभाये।
आज सुबह मैंने जैसे ही अख़बार खोला, मेरी नज़र राज्य लोक सेवा आयोग के परीक्षा परिणामों पर पङी। अख़बार में सभी पदों पर चयनित लोगों के नाम छपे थे। मेरी नज़र डी एसपी के पदों पर चयनित लोगांे पर पड़ी और घनश्याम कुमार नाम पर जाकर ठहर सी गई। नाम के साथ उसके गांव का नाम भी लिखा हुआ था,जिसे पढ़कर मेरी स्मृतियांे के सितार के तार बजने लगे। मैं बीस बरस पीछे पहुंच गया। मेरी नियुक्ति जंगल क्षेत्र के एक गांव में एक छोटे से पद पर हुई थी। मेरे कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बीस गांव में एक गांव घनश्याम का भी था मोहनभांठा। हम अपने सारे सरकारी कामों के लिये मुख्य रूप से ग्राम-कोटवार पर ही निर्भर होते थे। ये कोटवार सरकारी योजनाओं की मुनादी करने के साथ ही लाभ लेने वालों की वास्तविक स्थिति से हमें अवगत कराते थे। इसके अलावा ये जन्म-मृत्यु की सूचना देने से लेकर गांव में घटने वाली हर महत्वपूर्ण घटना की सूचना देने के लिये थाने जाया करते थे। सारे सरकारी विभागों की जिम्मेदारी अघोषित रूप से इनके कंधों पर होती थी। ये कोटवार सबसे छोटे स्तर के सरकारी प्रतिनिधि होते थे। उस दौर में इन्हें मात्र 500 रूपये प्रतिमाह मानदेय मिलता था और बेचारे सारे कर्मचारियों की जी-हजूरी करते रहते थे। सारे विभाग के कर्मचारी उस पर रौब गा़लिब किया करते थे।
  वो मेरी युवावस्था का दौर था। ग्रामीण क्षेत्र के सभी महत्वपूर्ण पदों पर हम युवाओं का ही कब्जा था। हम फील्ड वाले सभी युवा प्रायः समूह में ही दौरा किया करते थे। हममे से ज़्यादहतर कर्मचारी शहरी क्षेत्रों से थे। हमारा रहन-सहन ग्रामीणों को बेहद आकर्षित करता था। ग्रामीण बालाएं भी हमसे बातें करने को आतुर रहती थीं। हमारा भी एक मात्र उद्देश्य होता था कि हम अधिक से अधिक ग्रामीण बालाओं का ध्यान अपनी ओर खींचे। हमारे समूह के सदस्यों के बीच में एक अघोषित सा समझौता था कि हम सारे लोग अंगरेजी में ही बातें किया करेंगे। चाहे गलत-सलत ही क्यों न बोलें। हमारा तो मुख्य उददे्श्य तो ज्यादह से ज्यादह लङ़कियों को प्रभावित करना होता था। खैर यह तो हमारी उम्र का तकाजा़ भी था कि खिलदड़पन हमारे व्यवहार में स्वाभाविक रूप से आ गया था और ग्रामीण लड़कियों में भी।
धीरे-धीरे हमारा ग्रुप उस क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय होता जा रहा था। हालांकि हम लोग एकदम अगंभीर किस्म के युवा थे तो भी हम सभी वहां के रचनात्मक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। हम स्कूलों में आयोजित होने वाली खेलकूद प्रतियोगिता के विजेताओं को अपनी तरफ से पुरस्कार देते थे। इसके अलावा बोर्ड परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्रों को भी ईनाम देते थे।
मेरे कार्यक्षेत्र की एक ग्राम पंचायत मोहनभांठा के कोटवार का कुछ अता-पता नहीं था। गांव के लोग बताते थे कि किसी बाबा के चक्कर में पड़कर वह एक बार जो घर से लापता हुआ तो फिर कभी नहीं आया। स्थानीय व्यवस्था के तहत उसका सारा कार्य उसकी पत्नी फुलकंुवर के जिम्मे आ गया था। उसके दो बच्चे थे एक लड़का और एक लड़की। लड़का तीसरी कक्षा में पढ़ता था जबकि लङ़की दूसरी कक्षा में थी। चूंकि मैं प्रारंभ से ही संवेदनशील रहा, सो मैं फूलकुंवर कोटवारिन का समाना करने से बचता रहा। मुझे उसकी दयनीय परिस्थिति देखकर रोना सा आता था। मैं हालांकि उसकी मद्द करना चाहता था तो भी लोक-लाज के भय से मैं उसकी ज़्यादह मदद नहीं कर पाता था। हालांकि मैं कभी-कभार 100-50 रू. से उसकी मदद कर दिया करता था। मैं उससे कार्य न लेकर, किसी और ग्रामीण से अपना काम करा लेता था। इससे मुझे लगता कि मैं परोक्ष रूप से फूलकंुवर की मदद कर रहा हूं।
इस बीच समय अपनी रफ्तार से चलता रहा और मुझे एक बङ़ी नौकरी मिल गई जो कि राजधानी के मंत्रालय में थी। अब तक मेरा खिलंदड़पन न जाने कहां गायब हो गया था। गांव के उन साथी कर्मचारियों से कभी-कभार  मोबाईल पर बात हो जाती थी। हम सभी अपने दाम्पत्य जीवन मे रम गये थे। उस ग्रामीण क्षेत्र की सारी घटनाएं स्मृतियों के कोनों में कहीं धूल खाती पड़ी हुई थी।
एक दिन अचानक मेरे सबसे करीबी साथी सुभाष का फोन आया कि शिक्षकों का राज्य स्तरीय सम्मेलन राजधानी में हो रहा है जिसमें उसकी शिक्षिका पत्नी के अलावा कुछ और लोग भी आ रहे ह,ैं जो मुझसे मिलना चाहते है। निर्धारित तिथि एवं समय पर मेरी मुलाकात शिक्षकों के उस दल से हुई। सुभाष ने सभी को मेरे बारे में बताकर रखा था सो वे बड़ी ही गर्म जोशी से मिले। उसमें से एक लड़के ने अचानक मुझसे पूछा कि क्या आप मुझे पहचानते हैं? मेरे इनकार करने पर उसने बताया कि वह मोहनभांठा की कोटवारीन फूलकुंवर का लड़का घनश्याम है। उसके ऐसा बताते ही मेरे सामने फूलकुंवर का दयनीय सा चेहरा घूम गया, लेकिन अब मुझे यह जानकर संतोष हुआ कि चलो अब उसका बेटा शिक्षक बन गया है, तो उसके घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई होगी। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसने मेरे विभाग में एक अधिकारी पद के लिये परीक्षा दिलाई है। अब मुझे लगा कि वह मुझसे कहेगा कि आप मेरी एप्रोच कर दें। इसके पहले कि वह आगे कुछ कहता, मैंने पहले ही कह दिया कि -घनश्याम मैं इसमें तुम्हारी किसी भी तरह से मदद नहीं कर सकता। मेरे ऐसा कहने पर उसने कहा भैया मैं तो आपको बताना चाह रहा हूं कि इस पद पर मेरा चयन होना तय है। एक सौ पचास नंबर की उस परीक्षा में 125 नंबर से ज्यादह किसी को नहीं मिलेंगे और मुझे 117 नंबर मिल रहे है। ऐसा कहते हुए उसकी आंखो में गज़ब का आत्मविश्वास था। आगे बातों ही बातों में उसने कहा कि भैया मेरे आदर्श तो आप रहे हैं। आप लोग जब भी हमारे गांव में आते थे और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में बातें किया करते थे तो हम सभी बच्चे आप लोगों को घेरकर खडे़ हो जाया करते थे और आप लोगों की बातों को ध्यान से सुना करते थे। उस समय आप ही सबसे ज्यादह आत्मविश्वास के साथ अंग्रेज़ी बोला करते थ,े इसलिये आपकी छवि मेरे दिमाग़ में अंकित हो गई थी।
    मुझे उससे बातें करते हुए बङ़ा अच्छा लगने लगा। एक सुखद आश्चर्य भी हुआ कि उस दौर में, जब हम कतई गंभीर नहीं थे, हमें भी आदर्श माना जा सकता था। यह एक सुकून देने वाली ख़बर थी। खै़र आगे बातचीत में पता चला कि वह स्कूली पढ़ाई-लिखाई में एकदम औसत छात्र रहा है। मोबाईल नंबर के आदान-प्रदान के बाद वे सब विदा हो गये। मेरे जेहन में उस क्षेत्र की ऐसी छवि बन गई थी कि मुझे लगा कि यह लङ़का अति-आत्मविश्वासी है और ज्यादह कुछ नहीं कर पायेगा। कुछ दिन गुजर गये। इस बीच उसका दो-तीन बार फोन आया,लेकिन मैं उसके साथ औपचारिक ही रहा। घनश्याम में ऐसी कोई बात तो थी जो मुझे उसके बारे में ज्यादह से ज्यादह जानने के लिये पे्ररित करती थी। मैंने सुभाष से उसके बारे में पूछा तो उसने घनश्याम के जीवन की संघर्ष गाथा बयां की और मेरे मन में उसके प्रति अगाध सम्मान भर गया। घनश्याम की ज़िन्दगी की किताब के पन्ने-दर-पन्ने खुलते चले गये। मुझे पता चला कि उसने बचपन से ही अपनी मां के काम की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली थी। पांचवी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते वह बेहद समझदार हो चुका था। वह मुनादी करने से लेकर अपनी मां को पच्चीस किलोमीटर दूर थाने तक सायकल में बिठाकर लाने ले जाने का काम भी किया करता था। अपने काम के चक्कर में वह स्कूल जाने को तरस सा जाता था। थोङा और बङ़ा होने पर वह कभी ढाबे में प्लेटे धोने का काम किया करता,कभी किसी ट्रक में क्लीनर का काम करते हुए खुद को नीट एण्ङ क्लीन बनाये रखना उसकी उपलब्धियां थी। जीवन संघर्ष में तपक रवह कुंदन बन रहा था। खैर उसने अपनी स्कूली शिक्षा जैसे -तैसे पूरी की और हायर सेकण्ङरी करने के तुरंत बाद सरकारी कामों में वह मेट की हैसियत से काम करने लगा साथ ही काॅलेज की पढ़ाई प्रायवेट छात्र की हैसियत से जारी रखा लेकिन उसने अपने अंदर प्रतिस्पर्धा की भावना को हमेशा ही जीवित रखा। वह अपने जीवने में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं से बङे़-बङ़े सबक लेता रहा। उसका व्यावहारिक पक्ष बहुत मजबूत था। उसे यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई थी कि अकादमिक परीक्षाओं में औसत छात्र भी बड़े से बड़े पदों पर प्रतियोगिता के जरिये पहुंच सकते हैं। उसने अपने अंदर यह आग हमेशा ही जलाये रखी।
अब मैं सुभाष से जब भी मोबाईल पर बात करता, तो सि़र्फ ओर सिर्फ घनश्याम के बारे में ही पूछता। इस बीच सुभाष ने मुझे घनश्याम के व्यक्तित्व के एक अलग ही पहलू से परिचित कराया। उसने बताया कि वह जिस गांव में शिक्षक है, वहां पर वह स्कूली बच्चों को प्रारंभ से ही प्रतियोगी परीक्षाओं से परिचित कराता है। वह उनके अन्दर प्रतिस्पर्धा का जोश भरने के लिये साल में दो बार परीक्षाएं आयोजित करता है। धीरे-धीरे आस-पास की बीस-पच्चीस  स्कूलों में वह इस तरह के आयोजन कराकर वहां के बच्चों को भविष्य के लिये तैयार कर रहा है। वह इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले बच्चों को पुरस्कृत भी करता है। इन तमाम व्यवस्थाओं का खर्च वह खुद ही उठाता है। इस बीच मेरे विभाग के अधिकारी पद के नतीजे़ आ गये थे। सर्वाधिक नंबर पाने वाले उम्मीदवार को 120 नंबर मिले थे, जबकि घनश्याम को उसके अनुमान के मुताबिक 116 नंबर मिले थे। उसका अनुमान लगभग सटीक ही था। अब मैं घनश्याम से लगातार सम्पर्क बनाये रखा था। उससे बातें करना मुझे बहुत ही अच्छा लगता। वह बेहद संतुलित और वजनदार बातें ही करता था। इस बीच उसने दो-तीन प्रतियोगी परीक्षाएं और दिलाई थी। और सभी के पूर्वानुमान से मुझे पहले ही अवगत कराकर बताता रहा कि मेरा सभी में चयन तय है। वह एक तरह से मिस्टर परफेक्शनिस्ट सा हो गया था। उसने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी दिलाई। मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद एक बार वह मेरे घर पर आया। बातों ही बातों मे उसने मुझे बताया कि भैया मेरा डी एसपी के पद पर चयन तय है। मुझे फिर आश्चर्य हुआ कि अभी तो साक्षात्कार भी नहीं हुए है और इतने आत्मविश्वास से यह कैसे कह रहा है। लेकिन अब तक के उसके सारे अनुमान लगभग ठीक ही निकले थे सो मेरे पास कहने लायक कुछ बचा नहीं था। आगे मैंने उसका उत्साह बढा़ते हुए कहा कि चयन के बाद तुम्हें प्रशासनिक अकादमी भेजा जायेगा,जहां पर तुम्हें सूर्यवंशी सर प्रशिक्षण देंगे। वे हमारे बहुत अच्छे मित्र है। सूर्यवंशी सर का नाम सुनकर उसकी आंखों में चमक सी आ गई और फिर उसने पूछा कि कहीं उनका नाम आनंद सूर्यवंशी तो नहीं है? मेरे हां कहने पर उसके चेहरे पर प्रसन्नता नाच उठी और फिर उसने बच्चों की भांति ज़िद करते हुए कहा कि मुझे सूर्यवंशी सर से मिलना है। आप प्लीज़ मुझे उनसे मिलवा दीजिये। मैंने हैरत से उससे पूछा कि तुम सूर्यवंशी सर को कैसे जानते हो इस पर उसने बताया कि बारहवीं पास होने के बाद मैंने एक सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण प्राप्त किया था उसमें इन सूर्यवंशी सर ने ही हमें प्रशिक्षण दिया था। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने हमें नैतिक मूल्यों पर आधारित एक कहानी भी सुनाई थी। यह कहकर वह मुझे अक्षरशः वही कहानी सुनाने लगा। कहानी सुनते-सुनते मुझे घनश्याम के व्यक्तित्व की गहराईयों में उतरने का मौका मिला। मैंने देखा कि वह कहानी सुनाते-सुनाते अपने पिछले दौर में पहुंच गया है। इधर मैं सोचने लगा कि सौ-दो सौ लड़कों के प्रशिक्षण के दौरान एक  प्रशिक्षक  का नाम याद रखना और उनकी सुनाई गई कहानी से नैतिक शिक्षा ग्रहण करना, आज के दौर में दुलभर््ा है। मैंने उत्कण्ठावश पूछ ही लिया कि इतने वर्षों बाद भी तुम्हें सूर्यवंशी सर कैसे याद रह गये? तो उसने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने कुछ प्रश्न पूछे थे जिसका मैंने सही-सही उत्तर दिया था। प्रशिक्षण पूरा होने पर उन्होंने मुझे अपने गले लगाकर कहा था कि तुम लोक सेवा आयोग परीक्षा की तैयारी जरूर करना। उस वक़्त तक मैं इस परीक्षा के बारे में जानता भी नहीं था, लेकिन उनके द्वारा मुझे अपने गले लगाना जादू की झप्पी की तरह काम कर गया और मैंने ठान लिया कि मुझे इस परीक्षा की तैयारी करनी ही है फिर मैंने इस परीक्षा के बारे में सारी बातें पता की, और परीक्षा की पूरी तैयारी भी की और मैं आत्म विश्वास से कह रहा हूं कि मेरा डी एसपी बनना तय है।
अब मैं घनश्याम की प्रतिभा का पूरी तरह कायल हो गया था। मुझे लगने लगा कि आज यह एक लड़का न होकर कोई प्रकाशस्तंभ ह,ै जो अपने व्यक्तित्व के प्रकाश से न सिर्फ स्वयं आलोकित है बल्कि समाज में उम्मीद की रोशनी बिखेर रहा है।
सुसाईडल नोट्स
मैं एक असफल व्यक्ति हूँ । जीवन के हर क्षेत्र में असफल ...। प्रेम में तो बिल्कुल ही असफल । आज जब मैंने मौत को गले से लगाने की ठान ही ली है, तो यह सच स्वीकार करने में मुझे ज़रा भी शर्म महसूस नहीं हो रही है कि मैं हमेशा ही आत्मविश्वासरहित और हीनभावना से भरा रहा । चूँकि मुझे खुद अपने आप पर विश्वास नहीं था, इसलिये मैने दूसरो ंपर भी भरोसा नहीं किया, और प्रेम की नींव विश्वास पर ही टिकी होती है, इसलिये मै प्रेम का भवन ही तैयार नहीं करा पाया। हालांकि इस दिशा मे मैंने कभी-कभी प्रयास किया किन्तु... ख़ैर मेरी कहानी भी वही प्रेम-त्रिकोण पर आधारित घिसी-पिटी ही है । यह कहानी मेरे, और मेरे एक करीबी दोस्त सुहास, और एक नारी पात्र नेमत के बीच की है । मैंने नेमत को दिलोजां से चाहा, पर इज़हार की हिम्मत नहीं जुटा पाया । मैने यह ख़ुशफ़हमी पाल रखी थी कि, वह भी मुझसे प्यार करती है। आदमी जैसा सोचता है वैसा होता कहाँ है। मुझे बाद में मालूम हुआ कि वह मुझे नहीं, बल्कि सुहास को चाहती है । चूँकि मैने सुहास से कह रखा था, कि मै नेमत से प्यार करता हूँ, सो वह नेमत से दूरी ही बनाकर रखता था, तो मुझे भी उस पर यकीं नहीं होता था । अपने अविश्वास के चलते मैने कई दफ़े उसकी परीक्षा ली । वह हर बार परीक्षा में खरा उतरता था । मेरी परीक्षा की आग में तपकर कुंदन सा बन गया था वह । अब मुझे उसके भाग्य से जलन सी होने लगी थी । अब मैने उससे दूसरे क्षेत्र में पटखनी देने की सोची। लेखन की ओर मेरा रूझान छुटपन से रहा, अब मैंने इस ओर ज़्यादह ध्यान देना शुरू किया । कुछ अख़बारों में मेरी रचनाएँ छपने लगी थी । मुझे अपनी विद्वता बघारने का अच्छा मौका मिल गया । अब मैं अपनी बातो में दर्शन का पुट डालकर उस पर साहित्यिक दृष्टि से हावी होने की कोशिश करने लगा । मुझे तब बड़ी ख़ुशी होती जब वह मुझसे हिन्दी या उर्दू के कठिन शब्दों का अर्थ पूछता । रफ़्ता-रफ़्ता वक़्त गुज़रता गया । मुझे कभी विश्वास ही नहीं हुआ, कि वह सिर्फ़ मेरे लिये नेमत से हमेशा ही दूरी बनाकर रखेगा । मेरे अविश्वास की सीमा हद पर कर चुकी थी । मैंने हमेशा ही उसे नीचा दिखाने की कोशिश की । आज जब मै दुनियाँ से दूर जाने का फ़ैसला कर लिया है, तब मैं अपनी आत्मा पर किसी भी प्रकार का बोझ नहीं रखना चाहता। इसलिये मैं नेमत और सुहास को भी संबोधित कर अलग-अलग नोट लिख रहा हूँ ।
आदरणीय सुहास जी,
सादर अभिवादन,
तुम यह सोच रहे हेागे कि राकेश को भला यह क्या हो गया है, जो ‘आदरणीय’ शब्द का उपयोग कर रहा है, तो सुनो तुम हो ही ऐसे कि तुम्हारे दिल के दैर-ओ-हरम में सज़दा करने को जी चाहता है । तुम हमेशा ही कहते रहते हो कि, मैं तुम्हारी परीक्षा लेता रहता, हँू ये एकदम सही है । मुझे कभी-कभी लगता है कि, मै एक परीक्षक हूँ, जिसे परीक्षा में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर ही नही मालूम हैं । आज मुझे यह स्वीकार करने में ज़रा भी शर्म महसूस नही हो रही है, कि मुझमें आत्मविश्वास की भारी कमी है, और हीनता का भाव मुझमें कूट-कूट कर भरा हुआ है । सुहास, तुमने चारित्रिक उदात्तता की पराकाष्ठा को छुआ है । मैं अपने हीनताबोध को दबाने के लिये तुम्हें दर्शन के कलेवर से भ्रमित करता रहा । आज मैं ईश्वर को साक्षी मानकर सच कहता हँू कि, मैं पूरी तरह पोंगा पण्डित हूँ । मै तुम्हारी चारित्रिक ऊँचाईयों को छूना तो दूर, उसकी छाँव तक भी नहीं पहुँच सकता । सच, पराजय को स्वीकार करते हुए कितनी मर्मंातक पीड़़ा होती है, इसका अहसास मुझे अभी हो रहा है । मेरे ये सुसाईड नोट्स मेरे आत्म-मंथन का सार हैं । मैं सदा ही अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहा । अपने अहं की तुष्टि के लिये क्या-क्या नहीं किया मैंने। मेरे मन में तुम्हें नीचा दिखाने का भाव हमेशा ही दबे हुये रूप में रहा, जो कभी-कभी अपने होने का अहसास कराता हुआ बाहर आता रहा । तुम्हारे लिये अपने मन में उठने वाले अच्छे भावांे को मैंने हमेशा ही दबाये रखा । आज ये भाव फूट पडे़ हैं । ये नोट्स उसी का परिणाम है ।
सुहास मैं आज अपनी स्थिति पर गौर करता हूँ तो पाता हूँ कि मैं आज भी वहीं हूँ, जहाँ से चला था, और तुम बहुत आगे निकल चुके हो । मैंने आज तक के अपने जीवन में जो जाना उसका निचोड़ यह है, कि व्यावहारिक ज्ञान ही वस्तुतः ज्ञान है, बाक़ी सब दिलबहलाव के साधन ही हैं। इस बात पर मुझे किसी शायर का एक शेर याद आ रहा है ।
कभी-कभी यूँ ही हमने अपने जी को बहलाया है ।
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है ।
और क्या लिखूं, बस यहीं खत्म करता हूँ।
राकेश
नेमत जी,
सश्रद्धाभिवादन,
आपके माता-पिता ने आपका यह नाम चाहे जो सोचकर रखा हो, मेरेे लिये तो आप नेमत ही हैं । हाँ खुदा की नेमत मानता रहा हूँ मैं आपको । मैं पिछले कई सालों से अपने मन-मंदिर में आपकी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कर पूजता रहा हूँ आपको। मंैने आपको अपने साथ घटित बेवफ़ाई की दास्तां सुनाई तो आपने स्वाभाविक रूप से मुझसे हमदर्दी जताई, जिसे मंैने आपका प्रेम समझ लिया । अपने साथ घटित बेवफ़ाई की घटना ने मुझे नारी जाति से नफ़रत करने के लिये मज़बूर किया । यकीं मानों आपको देखकर मेरे दिल में प्रेम का संचार होने लगा । मुझे बिलकुल भी गुमां नही था कि एक और सदमे के लिये जमीन तैयार हो रही है । इसके लिये आप क़तई दोषी नही हैं, मै ही अपनी औकात से कुछ ज्यादह आगे बढ़ गया था । ख़ैर मुझे आज इस बात का अहसास हो गया है, कि मैं किसी की मुहब्बत के क़ाबिल ही नहीं हूँ । जब अपना ही चेहरा ख़राब हो तो आईने को दोष देना ठीक नहीं है। आज मैं किसी शायर की इन पंक्तियों से पूरी तरह सहमत हो गया हूँ कि-
इश्क़ ग़र एक तरफ़ हो तो सजा देता है ।
और ग़र दोनो तरफ़ हो तो मज़ा देता है ।
अब यहीं ख़त और ज़िन्दगी दोनो खत्म करता हूॅ ।
अगले जन्म में तुम्हारे साथ का ख़्वाहिशमन्द
राकेश
पश्चाताप
जी भरकर रो चुकने के बाद संगति खुद को कुछ हल्का महसूस करने लगी । आज उसकी भाभी ने फिर उसे बोझ कहा था, जबकि वह अच्छी ख़ासी नौक़री कर रही है। भाभी ने न जाने और क्या-क्या कहा था । भाभी के कहे कुछ वाक्य तो उसे अपने कान में डलते पिघले सीसे जैसे लगे थे । कितनी नफ़रत के साथ भाभी ने कहा था- कुतिया तू तो हमारी छाती में मूंग दल रही है, मरती भी नहीं, जा सरजू के पास जा, मुँह काला कर यहाँ से और न जाने कितनी देर तक बड़बड़ाती रही थी भाभी । कितनी शर्म सी महसूस हुई थी उसे खुद पर, साथ ही एक लिजलिजी सी अनुभूति भी हुई थी । भाभी तो भाभी है, उसका सगा भाई भी, जिसके लिये उसने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, वही कान में तेल डालकर बैठा रहा । संगति को उसका दुःख सालता रहा । वह अपने दुःख के कारणांे पर दृष्टिपात करने लगी। उसे महसूस होने लगा कि, अपनी वर्तमान स्थिति के लिये वह खुद ही ज़िम्मेदार है। उसे भला क्या ज़रूरत थी, सरजू के प्रेमपाश में बंधकर अपना अलग वज़ूद खोने की? सरजू से प्रेम करने से पहले कितनी इज़्ज़त थी उसकी घर में । यही भाभी उस समय कहा करती थी कि, संगी, तुम तो मेरी अंतरंग सहेली हो । सच तुम्हारे साथ रहने पर मुझे अपने मायके की सहेलियों की याद नही आती है । घर मे छोटी से छोटी बातों में भी उसकी सलाह ली जाती थी । भाई पूछा करता था-दीदी, दीपावली पर घर को किस रंग से पोतना अच्छा रहेगा ? वाक़ई आपकी पसंद सबसे अलग हटकर होती है आदि । और आज आज उसे शक़ की नजरों से देखा जाता है, मानो वह कोई अपराधी हो । सरजू उसका कलीग़ था। वह अच्छे संपन्न घर से था । रोज नये-नये कपड़े पहनने और मोटर सायकल बदल-बदलकर चलाने का शौक़ था उसे । न जाने उसे सरजू में ऐसा क्या नज़र आया कि, उसके प्रेमनिवेदन पर वह अपना दिल दे बैठी । वह उसकी भोगवादी संस्कृति पर फ़िदा हो गई थी, जैसे आज के दौर की अधिकांश लडकियाँ होती है । उसका ये मानना था कि, व्यक्तित्व की पहचान उसके कपड़ो से होती हैं । कितनी गलत थी वह । आज वह सोचने लगी है कि, भला कपड़ो से व्यक्तित्व की पहचान कैसे हो सकती है । किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में केवल उसके तन को ही तो शामिल नहीं किया जा सकता । मन भी शामिल होता है व्यक्तित्व में । वह अपने अतीत में खो गई । मदमाता सा यौवन था उसका । एक ग़ज़ब सी आशा थी चेहरे पर उसके । सरजू के अतिरिक्त न जाने कितने दीवाने थे उसके । उनमें सरजू के दो नजदीकी मित्र आभास और अशोक भी थे । यूँ तो आभास सरजू से ज्यादा हैण्डसम था पर चूँकि वह सायकल में घूमा करता, इसलिये वह उसे हिक़ारत की नजरों से देखा करती, और अशोक के विषय में कुछ कहना और सोचना उसे फ़िजूल लगता था, लेकिन सरजू के नज़दीकी मित्र होने के कारण उसे इन लोगो के अभिवादन का जवाब देना पडता था । वह अहसान करने के अंदाज़ में जवाब देती । वह सोचने लगी कितनी स्तरहीन सोच थी उसकी। बडे शहर की काॅन्वेन्ट शिक्षा-दीक्षा ने उसका दिमाग ख़राब कर रखा था । कितनी नेरो माइण्डेड हो गई थी वह, छीः !
उसे याद पडता है, सरजू के साथ हुई ग़लतफ़हमियों का खामियाजा बेचारे आभास और अशोक को भुगतना पड़ा था। कितनी खरी-खोटी सुनायी थी उसने उन्हें-तुम लोग अपने आपको क्या समझते हो बदतमीज़ कहीं के...। बेचारे सरजू का लिहाज़ कर चुप रह गये । अशोक की तो आँखें भर आयी थी,ं उसकी फटकार सुनकर । कितना सम्मान करता था उसका । उसका ही क्या वह तो सभी महिलाओं के साथ बडी श्रद्धा से पेश आता । भावनाओं का सम्मान करना तो कोई उससे सीखे । उसकी सोच का दायरा बढ़ता गया । वह सोचने लगी, व्यक्ति को परखने में न जाने उससे कैसी भूल हो गयी । सरजू के साथ वह तीन सालो तक बदनाम रही । इस दौरान वह उसका भरपूर दोहन करता रहा । वह जब-जब उससे शादी का ज़िक्र करती, वह बडे़ ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में टाल जाता । उस समय उसे उसकी वह धूर्तता भी बड़ी प्यारी लगती थी । उसे अपनी दादी की बात याद आने लगी कि, आदमी की जात भँवरे के समान होती हैं । उसे यकीं नहीं होता था कि, उसका सरजू ऐसा हो सकता है । उसे तो वह कोई दिव्य पुरूष जान पडता । कोई देवदूत जो उसका उद्धार करने आया है ।
मनुष्य तो हमेशा ही चाहता है, कि उसके साथ सब कुछ अच्छा-अच्छा ही हो, पर होता वही है, जो नियति को मंजूर हो । हुआ वही जो प्रायः होता है, उनके स्टाॅफ मे स्तुति नाम की एक नई लडकी आयी, और सरजू महाशय अब उस पर डोरे डालने लगे । संगति को अपनी स्थिति भँवरे द्वारा चूषित पराग रहित फूल की भाँति जान पड़ रही थी । अभी कल ही तो लड़के वाले उसे देखने आये थे, और आज ही रिश्ते में मध्यस्थता करने वाले ने उनकी इनक़ार से भैया-भाभी को अवगत कराया था । उसकी प्रेम-कीर्ति उन तक भी पहुँच गई थी, और वे इज़्ज़तदार लोग ऐसी दिलफेंक लडकी को अपनी बहू बनाने के पक्ष में क़तई नहीं थे, और उनकी इस इनक़ार से खिन्न होकर ही उसकी भाभी ने उसे भला-बुरा कहना शुरू किया था।
गाईड
हेमा का दिल आज बड़ा उदास है । उसे राकेशजी की कही बातें बार-बार याद आ रही हैं । न जाने क्यों राकेशजी की कड़वी बातें भी उसे आजकल अच्छी लगने लगी हैं। यों तो उन दोनों की जान-पहचान पाँच वर्षों से है, लेकिन इन दिनों एक ही शहर में रहने के कारण राकेशजी के घर पर उसका आना-जाना कुछ ज्यादह ही है। राकेश जी भी अविवाहित है । एक बड़े से घर में नितांत अकेले रहते है वे । इस कांक्रीट के जग़ल में अपना कोई पूर्व परिचित मिल जाये, तो आत्मीयता का बढ़ना निश्चित तौर पर स्वाभाविक है । आत्मीयता के चलते ही उसके क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद राकेशजी के घर की ओर बढने लगते हैं । राकेशजी के मुहल्ले के शोहदे किस्म के लडकों के व्यंग्यबाणों से बचती हुई बमुश्किल पहुँच पाती है वह उनके पास । उसे उन शोहदों पर तरस आता है, सोचती है बेचारों को क्या पता कि सहानुभूति, संवेदनाएॅ, और प्रेम जैसे भावों की क्या महत्ता है। उनके लिये तो प्रेम महज वासना ही है ।
राकेश जी लिखते भी हैं । वे जब किसी बात को समझााना चाहते हैं, तो साहित्य में दर्शन का पुट डालकर समझाते है । वह उनकी बातों में खो सी जाती है। एक अजीब सा नशा होता है उनकी बातों में ज़रा भी कपट या बनावट नहीं । सत्य को स्वीकार करने का ग़ज़ब का साहस है उनमें । बडे ही गंभीर किस्म के और बातों को गहराई से समझने वाले व्यक्ति हैं वे । वाक़ई वे विश्वास के योग्य हैं। वह जब कभी किसी दूसरे पुरूष से उनकी तुलना करती है, तो पाती है कि राकेशजी बिल्कुल ही हटकर हैं । एक अलहदा सा वजूद । वह अपने पिता के विषय में सोचती है । माँ की मृत्यु को चार माह ही हुए थे, और उन्होने दूसरी शादी के बारे में सोचना शुरू कर दिया था । छीः... कितनी घटिया सोच थी उनकी । छप्पन बरस की उम्र में नये सिरे से घर बसाने की कल्पना करना, कितनी अव्यवहारिक बात थी । ठीक है, पुरूष को अकेलापन काटने को दौडता है, लेकिन सामाजिक मार्यादा भी तो कोई चीज़ है, और ऐसे में जबकि एक जवान लडकी कुंआॅरी हो, उसकी शादी के बारे में न सोचकर अपनी शादी के बारे में सोचना तो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं था ।
हेमा को उस दिन की घटना याद आती है, जब उसे घर बुलाया गया था । घर पर चहल-पहल नज़र आ रही थी, और कुछ देखने-दिखाने की बात चल रही थी। उसे ऐसा लगा शायद उसे ही लड़केवाले देखने आये हैं । एक तरूणी में शादी को लेकर जो उमंगे और तरंगे उठनी चाहिये, उसमें भी उठी थी । बाद में पता चला कि, पिताजी ने अपनी शादी की बात करने के लिये लडकीवालो को घर पर बुलाया था । यह जानकार कितना बुरा लगा था उसे, कितनी ठेस पहुँची थी उसकी भावनाअेां को । उसे उस दिन अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया था । बहुत फूट-फूट कर रोई थी वह उस दिन । भावी सौतेली माँ के भाई ने उसे रोते हुए देख लिया था । उसने उसके आँसू पोछे और सीने से लगाकर कहा था-बेटा तुम जो चाहती हो वह तो मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन मैं यह तो कम से कम कर सकता हूँ कि, तुम जो नहीं चाहती वह नहीं होगा । उनकी बातों से उसे कितना ढांढस बंधा था । लड़की वाले की तरफ से अब इस बारे में चर्चा ही बंद हो गई ।
हेमा के पिता का अपनी शादी के बारे में सोचना महज अपनी काम-वासना की पूर्ति के लिये ही था । यह बात उस दिन की घटना से पूरी तरह सिद्ध होती थी, जब उसके पिता ने शराब के नशे में घर में काम करने वाली बाई का हाथ पकड़ लिया था । वह सोचती है, कितना अंतर है उसके पिता, और राकेशजी में । कहाँ एक छप्पन वर्ष का कामी पुरूष, और कहाँ सत्ताईस वर्ष के जवान राकेश जी जो नितांत तन्हाई के आलम में भी जब वह साथ हो, नहीं बहकते हैं । कितने उच्च विचार हैं उनके । आज तक उन्होने उसे काम भाव से छुआ तक नहीं था । उसे याद पडता है, दो या तीन बार मात्र उन्होने उसके सिर पर हाथ फेरा था, और लगभग इतनी ही बार आँसू भी पोंछा था। कितना सम्मान करते हैं वे उसकी भवनाओं का। कितना साधा है उन्होंने खुद को ।
आज जब उसने उनसे विजय नाम के अपने ब्वाॅयफ्रेण्ड से विवाह पर चर्चा करनी चाही थी, जो उसे कूट-कूट कर चाहता था तो उनकी आँखों में रिक्तता के भाव उभर आये थे । उनकी आँखें कुछ कहती हुई सी प्रतीत हो रही थीं, माने कह रही हों कि मैं चाहे कितना भी बडा विद्धान या साधक रहूँ, पर उससे पहले एक पुरूष हूँ । मेरी भी कुछ कामनाएँ हो सकती हैं । हेमा उनसे कभी भी नजर मिलाकर बात नहीं कर पाती थी, पर आज उनकी आँखों में आँखे डालकर देखा था उसने । एक बेबस से पुरूष जान पड़ रहे थे वे। उन्होने उसे अपने चेहरे के भाव पढते हुये पाया, तो चेहरे पर कठोरता के भाव लाने की नाक़ाम सी कोशिश करते हुये गंभीरतापूर्वक कहने लगे -‘‘हेमा तुम मेरे साथ रहकर प्रेम के परमार्थ के विषय में जितना कुछ जान गई हो, मेरा ख्याल है कि, वह तुम्हारे निर्णय लेने के लिये पर्याप्त है। पुरूष जाति के बारे में अब तक तुम्हें हुए अनुभवों के आधार पर निश्चित तौर पर तुम्हारा मापदण्ड ठीक ही होगा । मुझें विजयजी से मिलने का सौभाग्य तो आज तक प्राप्त नहीं हुआ है, लेकिन जव वह तुमसे प्रेम करते हैं, तो निश्चित जानो कि वह एक अच्छे व्यक्ति ही होंगे । ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूँ कि, वे तुमसे प्रेम करते है, बल्कि मैं हर उस प्रेम करने वालों के बारे में कह सकता हूँ, क्योंकि मेरा अपना यह मानना है कि, व्यक्ति के विचार तभी तक शुद्ध रहते है। जब तक वह प्रेम करता हैं।’’ इस पर हेमा ने कहा था-मुझे अपने पिता के एकाकीपन की अधिक चिंता है । यों तो मेरा घर विखण्डन की कगार पर पहँुच ही चुका है, लेकिन उसकी अंतिम परिणीति का कारण मैं क्यों बनूं। तब उन्होने कहा था-तुम्हारी ये बातें सैद्धांतिक तौर पर तो सही हो सकती है, किन्तु व्यावहारिक तौर पर कडवा सच यह है कि, जब तुम्हारे पिता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये तुम्हारी आवश्यकताओं की उपेक्षा कर सकते हैं, तो तुम्हें भी उनके विषय में सोच-सोचकर परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, और वैसे भी यदि किसी दंपति की एक ही पूत्री हो तो भी वे उसका विवाह करते ही हैं, और आवश्यक नहीं कि हर ऐसे दंपति को घर जंवाई मिल ही जाये, ऐसे में तुम्हारा अपने पिता की अल्प ज़िन्दगी के लिये अपनी सारी जिन्दगी क़ुर्बान करना क़तई उचित नहीं है ।
सारी बातों पर गंभीरतापूर्वक मनन करने के बाद एक निर्णय पर पहँुचकर हेमा विजय से शादी के लिये अपनी सहमति देने के उद्देश्य से टेलीफ़ोन बूथ की ओर क़दम बढाने लगी ।
धरातल
आज मौसम बडा ही सुहावना है । बाहर हल्की धूप खिली हुई है, और ठण्डी-ठण्डी हवाएँ चल रही हैं । कुछ लिखने का मूड बन रहा है । मैं लाॅन में कुरसी-टेबल मंगवाता हूँ और कुरसी के आ जाने पर बैठकर अपने अतीत के बारे में सोचने लगता हूँ ।
मुझे अपना एक ऩजदीकी मित्र सुभाष याद आ रहा है । एक प्यारा सा इंसान। उसे लिये ज़िन्दगी महज एक मज़ाक ही थी । जिस सच को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था, उसे हँसी में उड़ाकर संतुष्ट हो लेता था । कैसी विचित्र जीवन पद्धति थी उसकी । उसकी बातों में विरोधाभास स्पष्ट झलकता था । वह परिस्थितियों के अनुसार विचार बदल लेने में भी माहिर था । लड़कियों के मुआमले में एकदम छिछोरा था वह । लड़कियों की भावनाओं से खिलवाड़ करना उसका प्रिय शौक़ था । इस शौक के लिये वह किसी भी हद तक जाने के लिये तैयार रहता था । वह अपनी बातों में एक अज़ीब सा ज़ादू पैदा करता था। उसकी गहरी भूरी आँखों में हमेशा ही वासना के डोरे तैरते थे । यदि किसी गाँव की लड़की को वश में करना हो, तो ठेठ बोली का, और शहरी क्षेत्र की किसी लडकी पर इंप्रेशन जमाना हो, तो अँगरेजी मिश्रित हिन्दी का प्रयोग करना उसकी एक और विशेषता थी ।
मेरा क़रीबी मित्र होने पर भी हमारी सोच उत्तर-दक्षिण थी । लड़कियों की भावनाओं केे साथ खिलवाड़ करने को मैं गंभीर अपराध की श्रेणी में रखता था। सुभाष के छिछोरेपन पर मैने उसे कई बार टोका भी था, पर उसे हमेशा यही लगता था कि, मैं उससे जलता हूँ । बाद में मैने उसे टोकना छोड़ दिया । मैंने आज तक बमुश्किल चार-पाँच मित्र ही बनाये हैं । मित्रों पर मै किसी विद्वान की उस उक्ति से पूरी तरह सहमत हूँ कि, जिसके बहुत से मित्र होते हैं, यकीनन उसका एक भी मित्र नहीं होता है । इसी कारण मैं मित्रों की भीड़ इकट्ठी करने में विश्वास नहीं करता रहा ।
हाँ तो मैंने सुभाष को चेताने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन मैं इसमें असफल रहा । इस तरह वह अपनी ज़िन्दगी जिये जा रहा था, और मैं अपनी, लेकिन इस बीच एक ऐसी घटना घटी, जिसने मुझे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया । मेरे पड़ोस में एक मेरी सजातीय लड़की रहती थी, नीलू । हाँ नीलू ही तो नाम था उसका । मुझे वह बहुत अच्छी लगती । सजातीय होने के कारण मैं उससे शादी के बारे में भी सोचने लगा था । सुभाष का मेरे घर पर आना-जाना लगा रहता था । न जाने कब उसने नीलू को फाँस लिया। नीलू के परिवार में कठोर अनुशासन था, सो सुभाष को मध्यस्थता करने के लिये ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जो उनके प्रेमसंचार का माध्यम बन सके । वह इसमे भी सफल हो गया, और नीलू की सबसे क़रीबी सहेली शीला को अपने प्रेम की दुहाई देकर मध्यस्थता करने के लिये राज़ी कर लिया । अब उनका ये नाटक निर्बाध गति से चलता रहा । मैने इस ओर से अपनी आँखे मूंद ली थी । इस बीच नीलू के माता-पिता की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में एक साथ हो गई । अपनी मृत्यु के बाद नीलू के परिवार में विखण्डन का ऐसा दौर चला कि, सारा परिवार ही छिन्न-भिन्न हो गया । कोई आधार ही नहीं रह गया नीलू के जीवन का । समय खराब देखकर सुभाष ने भी उससे पल्ला झाड़ लिया ।
वक़्त रेंगता रहा । मैं इस घटना को लगभग भूल ही गया था कि, एक दिन शीला मेरे घर पर आई, और नीलू की दयनीय स्थिति का बखान करने लगी, जबकि मुझे सब कुछ मालूम था । मुझे यह क़तई पता नहीं था कि, कोई धमाका करने के लिये भूमिका बाँधी जा रही है । अचानक वह मुझसे कहने लगी कि आप नीलू से शादी कर लीजिये । साथ ही वह मुझे जातिगत समानता की दुहाई देने लगी, और कहने लगी कि-जो हो चुका सो हो चुका, अब भी आप नीलू के साथ नये सिरे से जिन्दगी शुरू कर सकते है।
शीला का एक-एक शब्द मुझे शूल की तरह चुभता गया, तो भी मैंनें उसे अपनी बात ख़त्म करने दी, और जब उसने अपनी बात खत्म कर ली, तो मैंने कहना शुरू किया-देखो शीला ये खूंटी पर जो कपड़े टँगे हुये है न, वह पूरी तरह से मेरे अपने ही हैं । पहले की बात और थी, जब मैं अपने भाई की उतरनें पहना करता था। आजकल मैंने उतरनें पहना छोड़ दिया है, और जहाँ तक सजातीय होने का प्रश्न है, तो नीलू को सुभाष से प्रेम करने के पहले ही सामाजिक विषमता का ध्यान रखना था। मैं तुम्हे अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दूं कि, मंैने समाज सुधार का कोई ठेका नहीं ले रखा है। मैं जानते बूझते मक्खी नहीं निगल सकता । मैं अपने गले में ऐसी घण्टी नहीं बांध सकता, जो मुझे बार-बार दोयम दर्जे का साबित करती रहे । शीला, किसी भी व्यक्ति के दिल से किसी के प्रति चाहत को निकाल फेंकना आसां नहीं है। और नीलू के दिल में सुभाष के प्रति जो चाहत है, उसे तो मंै निकाल ही नहीं सकता । मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम जानते-बूझते ये सब कैसे कह रही हो । खैर जो भी हो, मैं नीलू से शादी नहीं कर पाऊँगा ।
इतनी सब बातें सोचने के बाद मैं लिखने बैठता हँू । इतनी सब बातें लिख लेने के बाद मैं अपनी कहानी को पढ़ता हूँ, और फिर सोचने लगता हूँ कि इस कहानी में तो मैंने समाज को कोई संदेश दिया ही नहीं । फिर यह सोचकर संतुष्ट हो लेता हँू कि, भई लेखक भी तो आख़िर मनुष्य है । वह क्यों अपने थोथे आदर्शो के लिये ऐसी लड़की से शादी करेगा, या कहानी में ज़बरदस्ती कहानी के हीरो से ऐसी लड़की की शादी करायेगा ।
ये सब सोचते-सोचते मेरा सर भारी होने लगता है । मैं नौक़र से चाय बनाने को कहता हूँ, और चाय पीकर कहानी को अंतिम रूप देने लगता हँू।
मरीचिका
मैं कई बरसों तक सोशल मीडिया से दूर ही रहा। मुझे हमेशा ही लगता रहा कि सोशल मीडिया में सिर्फ़ और सिर्फ़ अगंभीर किस्म के लोग ही पाये जाते हैं। विश्व-स्तर पर हुए चुनावों के परिणामों में सोशल मीडिया के प्रभाव ने मेरी इस धारणा को और पुख्ता कर दिया था कि यह मीडिया संजी़दा लोगों के लिये नहीं है। मैंने इस माध्यम से होने वाली धोखाधड़ी के बारे में भी काफी पढ़-सुन रखा था। रूपयों-पैसों की धोखा-धड़ी से लेकर भावनाओं की प्रेम की धोखाधड़ी तक। इस बीच मुझे अचानक उर्दू सीखने की इच्छा हुई और मैंने उर्दू लिखना-पढ़ना सीख लिया। हालांकि मैंने अपना फेसबुक अकाऊण्ट बना रखा था, पर मैं उसे एक्सेस नहीं करता था। एक दिन मेरा मूड हुआ कि उर्दू में कुछ लिखकर पोस्ट किया जाये। और मैंने पोस्ट कर दिया। मैंने उसे पब्लिक मोड में पब्लिश किया था, सो न सिर्फ़ भारत, बल्कि पाकिस्तान के अलावा यूरोप में बसे कई उर्दू-भाषी लोगों के लाईक्स और कमेण्ट्स ने मुझमें बे-इन्तेहा जोश भर दिया। अब तो फेसबुक में पोस्ट करना और लाइक-कमेण्ट्स के मजे लेना मेरी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा हो गया था। धीरे-धीरे मुझे फेसबुक की लत सी लगने लगी। आत्ममुग्धता दुनिया का सबसे बड़ा नशा है। मेरी पोस्ट पर मिलने वाले लाईक्स और कमेन्ट्स मेरे अन्दर के छपासु की आग़ को, हवा पे हवा दिये जा रहे थे। मेरी आत्ममुग्घता दिनांे-दिन बढ़ती जा रही थी, साथ ही बढ़ते जा रहे थे फेसबुक फ्रेण्ड्स। मैं अपने हर लाईक और कमेण्ट्स करने वालों को फ्रेण्ड रिक्वेस्ट भेजने लगा था। मुझे अब ऊंचा और ऊंचा उड़ने के लिये आसमान मिल गया था। मैं अपनी वर्चुअल दुनिया में खोया हुआ था। मुझे कभी नहीं लगा कि मै मरीचिका जैसी आभासी दुनिया का निवासी बन चुका हूं।
एक दिन मुझे अचानक एक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट प्राप्त हुई। ये किसी ग्रेन्एण्टोनी नाम की महिला की थी। एक महिला फे्रण्ड की रिक्वेस्ट देख कर मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। अब तक मैं ही दूसरों को रिक्वेस्ट भेजा करता था। अब पहली बार एक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट आई थी, वह भी विदेशी गोरी मेम की। उसने कव्हर पिक्चर में अपने बच्चे के साथ अपनी बेहद खूबसूरत फोटो लगा रखी थी और प्रोफाईल पिक्चर में सिर्फ उसकी खूबसूरत सी फोटो थी। उस फोटों में वह बार्बी डाॅल जैसी लग रही थी। मैंने उसकी फोटो को बड़ा करके देखा तो उसकी झील सी गहरी नीली आंखें स्पष्ट दिखी। मैंने उसकी डिटेल देखी, जिसमें उसने अपने विधवा होने का जिक्र विशेष तौर पर हाईलाईटेड किया था। इतनी कम उम्र की विधवा के फे्रण्डशिप के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इसके पीछे दो कारण थे सबसे पहला तो मेरा पुरूष सुलभ कमीनापन मुझे इतनी खूबसूरत महिला के साथ जुड़ने को बाध्य कर रहा था तो दूसरा एक विधवा महिला को माॅरल सपोर्ट देकर उसे अच्छा महसूस कराने की लालसा भी काम कर रही थी।
आज हर आदमी अपने-आपको सबसे बड़ा ज्ञाता मानने लगा है और एक दूसरे को अपने सांचे में ढालकर उसे वैचारिक रूप से पंगु बनाना चाह रहा है। संक्षेप में कहा जाये तो हर आदमी एक दूसरे के बे्रनवाॅश में लगा हुआ है। वह दूसरों के दिमाग़ पर वैचारिक कब्जा़ करके ‘गुरूडम‘ वाली स्थिति में रहना चाहता है। किसी में मन में यह दबी-छुपी इच्छा रहती है कि वह ‘गुरू‘ के स्थान पर रहे, बाकी सारे उसकी अधीनता स्वीकार करते हुए उसके चेले बन जायंे। निर्मल बाबा जैसे बाबाओं के आसन फार्मूले ने एक साधारण इंसान में भी बाबा बनने की महत्वकांक्षा को जगा दिया है। मैं भी इसका अपवाद नहीं था। मैं भी चाह रहा कि उसका ब्रेनवाॅश करके मैं उसे अपनी शिष्या बना लूं। खै़र मेरे रिक्वेस्ट स्वीकार करते है, मैसेन्जर पे उसके पहले से टाईप किये हुए संदेश धड़ाधड़ आने लगे, जिसमें वह अपनी सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए परोक्ष रूप से विवाह का प्रस्ताव देती हुई नज़र आती थी। कुछ संदेशों में उसने अपनी हाॅबीज के बारे बताया था कि उसे रेड-वाईन पसंद है और वह प्रकृति से बहुत प्रेम करती है। इसके अलावा बहुत सारी पसंद-नापसंद का विवरण था। ये सारे मैसेज़ पहले से ही टाईप किये हुए थे, सो मुझे झटका सा लगा कि यह बहुत से लोगों के पास अपनी शादी के लिये प्रस्ताव भेजती होगी। ये झटका उसके बहुतो को प्रस्ताव भेजने से ज्यादह इस बात का था कि अब मुझे पता चल चुका था कि मैं कोई खास आदमी नहीं हूं, जिसे उसने रिक्वेस्ट भेजी है। यह बात मुझे खास आदमी से आम आदमी बनाने के लिये पर्याप्त थी। मैं तो पहले ही एक अदद बीबी का पति और एक तेरह साल के लड़के का बाप हूं। इस वजह से उसका प्रस्ताव तो किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं कर सकता था। पर मैं उससे मित्रता बनाये रखना चाहता था......लंबे समय तक। मैंने उसे सब कुछ बताते हुए कह दिया कि मैं आपसे शादी तो नहीं कर सकता लेकिन आप चाहें तो हम मित्रवत रह सकते हैं। उसने भी उधर हामी भर दी। अब हमारे बीच वार्तालाप शुरू हो गया। मैं उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए बेहद संतुलित तरीके से बात करता था, लेकिन उसे प्रभावित करने की मेरी दबी-छुपी इच्छा की चिन्गारी को हवा मिलने लगी और मैं अपनी अंगरेजी भाषा को और लचकदार बनाते हुए उसे लुभाने की कोशिश करने लगा। मैं उसके सामने अपने-आपको एक संत जैसा प्रकट करता रहा और उसे माॅरल सपोर्ट देते हुए धीरे-धीरे उसको अपनी शिष्या बनाने की कोशिश में जुट गया उससे बातें करते हुए मेरी मृतप्रायः अंगरेजी भी जीवित हो उठी थी। मैं उसे और जादुई बना-बनाकर उससे आध्यात्मिक बातें करने लगा। बातों ही बातों में उसने बताया कि वह मूल रूप से अमेरिका की ही है, लेकिन उसकी शिक्षा-दीक्षा थाईलैण्ड में हुई है, सो वह बुध्दिज़्म से बेहद प्रभावित रही है। यह जानकारी मेरे लिये बेहद अच्छी थी, क्योंकि मैंने बुध्द धर्म पर काफी कुछ पढ़ रखा था। अब मैं उसे बुध्द के उपदेशों के संदर्भों में बाते करने लगा और वह भी डूबकर और सुनकर-समझकर जवाब देती। इधर मैं खुद पर बड़ा आत्ममुगध था कि मैंने एक अमेरिकन महिला को अपने सांचे में ढाल लिया है।
और आज वह पूरी तरह मेरी मुट्ठी में है। मैंने गर्व से यह बात अपने मित्रों को बता दी। उसकी फोटो देखकर वे भी रश्क करने लगे कि क्या ज़बर्दस्त लड़की पटाया है। अब तक हमारी दोस्ती को छः महीने, हो चुके थे और मैं यह बात पूरी तरह मान चुका था कि मैंने उस का बे्रनवाॅश करके उसे पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया है। मैंने उसे सम्मोहित कर लिया है। बातों के दौरान उसने भारत आने की इच्छा जताई साथ ही मुझे अमेरिका आने का भी न्यौता दिया। उसकी बातों से ऐसा लगता कि यदि उसके पास पंख होते तो वह तुरंत उड़कर मेरे पास आ जाती। एक दिन उसने मुझसे मेरे शर्ट के नाप के अलावा कमर की नाप भी पूछी। मेरे पूछने पर उसने कहा कि वह मुझे शर्ट-पैण्ट गिफ्ट करना चाहती है। मेरे लगातार मना करने के वाबजूद वह नहीं मानी और अपनी कसम देकर उसने मुझसे मेरे    शर्ट-पैण्ट और फिर जूते का नाप भी मांग लिया मैं उपर से तो ना-ना करता रहा, पर मेरी दिली इच्छा थी कि मैं उसके द्वारा दी गई गिफ्ट ले लूं। मैं उस गिफ्ट को लोगों को दिखाकर हीरो बन जाने के मोह को रोक नहीं पा रहा था। खै़र उसने अगले ही दिन बताया कि वह शिपिंग कम्पनी के माध्यम से मेरा पार्सल बुक करने वाली है। उस पार्सल में कपड़ों और जूतों के अलावा वो आईफोन का सबसे लेटेस्ट माॅडल भी गिफ्ट-स्वरूप मुझे भिजवा रही है। मेरा बेटा आई-फोन को लेकर हमेशा बेहद उत्साहित रहता था। वह टीवी और अख़बारों में आई-फोन से संबंधित तमाम खबरें़ पढ़ता-देखता रहता उसे और मुझे बताता रहता था। उसके बताने के पीछे एक मूक सा निवेदन होता था कि पापा उसे आईफोन लेकर देे लेकिन आईफोन लेने की मेरी हैसियत नहीं होने की वजह से मैं टाल जाता था। आईफोन भी साथ में आने की बात जानकर मैं तो पागल हुआ जा रहा था। प्रत्यक्ष में तो मैंने ग्रे से कहा कि मैं एक संत प्रवृत्ति का आदमी हूं और विलासिता की तमाम चीजों से बेहद दूर रहता हूं, इसलिये कपड़ों तक तो ठीक है, लेकिन आई-फोन वह न भेजे।
खै़र उसने एक शिपिंग कम्पनी में मेरा पार्सल बुक करा दिया था और उसकी रसीद भी मुझे मैसेंजर के माध्यम से भिजवा दी थी। शिपिंग कंपनी के द्वारा मुझे अपने पार्सल की सूचना मिली कि मेरा पार्सल मुम्बई पहंुच जायेगा। तीसरे दिन मेरे पास शिपिंग कम्पनी का मैसेज आया कि आपका पार्सल साधारण पार्सल न होकर व्हीआइपी पार्सल है इसलिये आपकी आइडेटिंटी वेरिफिकेशन के लिये आपका आधारकार्ड या पेन नं चाहियें मैंने अपने आधार कार्ड की फोटो भेज दी अब तक मुझे खुद पुरी तरह यकीन हो चला था कि मैं एक बेहतरीन इंसान हूं और मैं लोगो को मोरल सपोर्ट देने में सक्षम हो चला हूं मैं आध्यात्मिक बाबाओं की तरह अपना आश्रम खोल सकता हूं और कई विदेशियो को अपने चंगुल में फंसाकर मालामाल हो सकता हूं। मेरे अंदर का शैतान मुझे अति आत्म विश्वासी बना रहा था। उसी दिन रात को ग्रे का मैसेज आया कि उसने उस पार्सल में दस हज़ार डाॅलर का चैक भी डाल रखा है। बस उसका इतना कहना था कि मेरा विवेक जाग गया। मैंने बेटे से कहा कि जरा नेट पर देखकर बताये कि एक डाॅलर में कितने रूपये होते है। बेटे ने कहा कि तकरीबन सत्तर रूपये। अब मेरा विवेक मुझसे कहने लगा कि यह धोखा-धडी का मामला हो सकता है क्योकिं कोई मुझसे कितना भी प्रभावित हो, एक झटके में तकरीबन सात लाख रूपये और दो लाख रूपये के करीब का उपहार भला क्यों देने लगा। मैंने मैसेंजर में गे्र से पूछा कि वह मुझे इतने रूपये क्यों दे रही है, इस पर उसने बताया कि आपसे दोस्ती होने के बाद उसे साउथ आफ्रीका की किसी कम्पनी का 20 लाख डाॅलर का काम मिला है। अब मेरे विवेक ने मुझे जगा दिया था और मुझे समझ में आ गया था कि मुझे ये उपहार बहुत महंगा पड़ने वाला है निश्चित रूप से किसी अकाउण्ट में रूपये डालने की बात कही जायेगी। मैंने अपनी पत्नी और बेटे के सामने शंका जाहिर की। साथ ही यह भी चेतावनी दी कि यदि कोई डिलवरी-बाॅय आता है और पार्सल छुड़ाने के लिये 500रूपये से ज्यादा मांगे तो डिलवरी मत लेना। हम अधिकतम पांच सौ रूपये का जुआ खेल सकते हैं। इस बीच मेरे पास शिपिंग कम्पनी का फोन आया कि आपको मुम्बई के फलां आकाउण्ट में 50 हज़ार रूपये जमा करने होंगे, तभी आपका पार्सल डिलवर होगा। मैंने यह बात अपनी पत्नी को और बच्चे को बताते हुए कहा कि ये टोटल फ्राॅड है मुझे कल ही पता चल चुका था, लेकिन आईफोन का दीवाना बेटा कहने लगा कि यदि हम इतना देकर छुड़ा भी लेते है तो भी हमें लगभग 8 लाख का फ़ायदा ही होगा। आईफोन की दीवानगी उसके सर चढ़कर बोलने लगी थी। इधर अब मेरे अन्दर कुछ टूट रहा था। मुझे लगा मानों एक प्रेमिका ने अपने प्रेमी के साथ धोखा किया हो। मुझे अचानक महसूस हुआ कि में तो ग्रे से प्रेम करने लगा था। थोड़ी ही देर बाद ग्रे का भी रूपये संबंधी मैसेज आ गया। मैंने उससे कहा कि तुम अपने पार्सल बुकिंग कैंसल कर दो, मुझे तुम्हारे गिफ्ट नहीं चाहिये। तुम फ्राड हो जानकर मैं बेहद दुःखी हो गया हूं। तुमने मेरे जज्बातों के साथ खेला है ईश्वर तुम्हें कभी मुआफ़ नहीं करेगा। मैं उस फ्राॅड औरत को बहुत कुछ कहना चाहता था। मैं शिपिंग कंपनी के साथ उसकी मिलीभगत के बारे में धमकाना चाहता था। मैं यू.एस अथाॅरटी को उसके फ्राॅड के बारे में अवगत कराना चाहता था, ताकि भविष्य में वह किसी दूसरे के साथ ऐसा न कर पाये। मैं उहापोह की स्थिति में ही था कि अचानक ग्रे फेसबुक से गायब हो गई। मैसेंजर पर हमारी बातचीत भी पूरी तरह गायब हो चुकी थी। वह एक बेहद शातिर ठग थी। मैं ठगा सा रह गया। यह तो गनीमत थी कि एन वक्त पर मेरा विवेक जाग्रत हो गया था वरना वह तो पूरी तरह फुल प्रुफ मरीचिका थी।
मैं इसे एक दुःखद घटना समझकर भूल जाना चाहता था। मेरे सर से बाबागिरी का भूत उतर चुका था। सोशल मीडिया से मेरा मोह भंग हो गया था। मैंने फेसबुक एक्सेस करना लगभग बंद सा कर दिया था। बहुत जरूरी होने पर सिर्फ़ काम करने तक ही एक्सेस करता। मैंने चैटिंग से तौबा कर ली थी। इस घटना को लगभग साल भर हो चुके थे। एक दिन मैं रविवार को मरामदे पर, बैठा अख़बार पढ़ रहा था कि अचानक एक महंगी वाली विदेशी गाड़ी मेरे दरवाजे़ पर आकर रूकी। उसमें से एक बेहद ख़ूबसूरत विदेशी महिला अपने बच्चे के साथ उतरी। उसके हाथ में एक बड़ा सा पैकेट था। उसे गिफ्ट पैक की तरह सजाया गया था। उसने बड़े ही सलीके से अभिवादन किया फिर उसने कहा कि आपके बेटे को जरा बुला दंे। मैं अकबकाया सा उस परी जैसी महिला को देखता रहा। संयोग से उत्सुकतावश मेरा बेटा उसी समय वहीं आ गया। उस महिला ने पैकेट खोला और चमचमाता हुआ आईफोन का लेटेस्ट माॅडल मेरे बेटे के हाथों में थमा दिया, फिर उसने पैकेट में से मेरे लिये तीन जोड़ी जींस और टी शर्ट निकाला। मेरी पत्नी भी तब तक वहां आ चुकी थी। उसने उस पैकेट से एक बेहद खूबसूरत सी साड़ी निकाल कर मेरी पत्नी को थमा दी। हम सभी मंत्रमुग्ध से उस महिला को निहारते रहें। हम उसकी आत्मीयता से बंध से गये थे। हमें हैरान देखकर उसने बताया कि मैं ही ग्रे एण्टोनी हूं। हम लोगों का एक गिरोह था, जो लोगों को फांसता था, लेकिन आपसे बात करने के बाद मुझे बेहद आत्मगलानि हुई और मैंने उस गिरोह का साथ छोड़कर अपना एक छोटा सा बिजनेस शुरू किया और सालभर में केबल का मेरा वह बिजनैस चमक गया। आपके द्वारा दिये गये माॅरल सर्पोट ने मेरा बहुत साथ दिया और मैं इमानदारी से अपना काम करने लगी। मेरे मन में अपराध-बोध था जो आपसे मिलकर ही दूर हो सकता था। मैंने टूरिस्ट वीजा पर यहां आने का निश्चय किया। ऐसा कहते-कहते उसकी आंखें भर आई थी। उसके वीजा खत्म होने में एक दिन का समय था, सो हमने उसे अपने ही घर में रोक लिया। हम जब उसे विदा करने एयरपोर्ट तक गये तो वह बेहद भाव-विभोर हो रही थी। हमें भी ऐसा लग रहा था कि रेगिस्तान में मरीचिका के पीछे प्यासे भटकते हुए हम लोगों को वास्तव में एक रेगिस्तानी साफ़ पानी की एक रेगिस्तानी झील मिल गई हो।